10th BSEB History Ex-1 Ultimate Free Notes PDF । यूरोप में राष्ट्रवाद सम्पूर्ण नोट्स PDF
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इस नोट्स की मदद से विद्यार्थी न केवल परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त कर सकेंगे, बल्कि राष्ट्रवाद के विकास, स्वतंत्रता आंदोलनों और यूरोप के राजनीतिक इतिहास की गहरी समझ भी विकसित कर पाएंगे।
BSEB कक्षा 10 इतिहास अध्याय 1 नोट्स PDF | यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय - फ्री डाउनलोड करें
परिचय
यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना थी जिसने आधुनिक विश्व को आकार दिया. 18वीं और 19वीं सदी में यूरोप में कई बड़े बदलाव हुए, जिसने लोगों को अपनी पहचान को एक साझा संस्कृति, भाषा और क्षेत्र से जोड़कर देखने के लिए प्रेरित किया. राष्ट्रवाद की इस भावना ने कई साम्राज्यों को तोड़ा और नए राष्ट्र-राज्यों के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया. इस अध्याय में, हम समझेंगे कि राष्ट्रवाद क्या है, इसका उदय कैसे हुआ और इसने यूरोप तथा विश्व को कैसे प्रभावित किया.
1. राष्ट्रवाद का अर्थ
राष्ट्रवाद एक ऐसी भावना है जो किसी विशेष भौगोलिक, सांस्कृतिक या सामाजिक परिवेश में रहने वाले लोगों में एकता और अपनेपन का संचार करती है. यह भावना लोगों को एक साझा इतिहास, संस्कृति, भाषा, परंपरा और हितों के आधार पर एक राष्ट्र के रूप में संगठित होने के लिए प्रेरित करती है. राष्ट्रवाद की भावना लोगों को अपने राष्ट्र के प्रति प्रेम, भक्ति और निष्ठावान बनाती है.
सरल शब्दों में: राष्ट्रवाद का अर्थ है अपने राष्ट्र के प्रति प्रेम की भावना.
2. यूरोप में राष्ट्रवाद के उदय के कारण
यूरोप में राष्ट्रवाद के उदय के कई कारण थे, जिनमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं:
- पुनर्जागरण का प्रभाव: पुनर्जागरण काल में कला, साहित्य और विज्ञान के क्षेत्र में हुए परिवर्तनों ने लोगों के दृष्टिकोण को बदला और राष्ट्रवाद की भावना का बीजारोपण किया.
- फ्रांसीसी क्रांति (1789): यह राष्ट्रवाद के उदय में सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक थी. इसने ‘स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व’ के आदर्शों का प्रचार किया और ‘राष्ट्र’ को राजा के बजाय लोगों से जोड़कर देखा.
- नेपोलियन का आक्रमण और प्रशासनिक सुधार: नेपोलियन ने जर्मनी और इटली जैसे क्षेत्रों में प्रशासनिक सुधार किए, जिससे इन क्षेत्रों में एकीकरण का मार्ग प्रशस्त हुआ. हालाँकि, उसकी नीतियों के कारण फ्रांसीसी प्रभुत्व के खिलाफ भी देशभक्तिपूर्ण भावनाएँ उभरीं.
- उदारवादी विचारों का प्रसार: उदारवादी विचारों ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता, कानून के समक्ष समानता और संवैधानिक सरकार का समर्थन किया, जिसने राष्ट्रवाद को एक राजनीतिक विचारधारा के रूप में मजबूत किया.
- औद्योगिक क्रांति: औद्योगिक विकास ने एक नए मध्यम वर्ग को मजबूत किया, जिसने राष्ट्रीय एकता और राजनीतिक अधिकारों की मांग की.
- सामाजिक और राजनीतिक असंतोष: सामंती व्यवस्था, राजशाही और विदेशी शासन के खिलाफ असंतोष ने भी राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया.
3. फ्रांसीसी क्रांति और राष्ट्रवाद (1789)
1789 की फ्रांसीसी क्रांति राष्ट्रवाद की पहली स्पष्ट अभिव्यक्ति थी. इसने फ्रांस में राजतंत्र को समाप्त कर प्रभुसत्ता फ्रांसीसी नागरिकों को सौंपी. क्रांति से पहले फ्रांस एक ऐसा राज्य था जिसके संपूर्ण भू-भाग पर एक निरंकुश राजा का शासन था.
फ्रांसीसी क्रांति ने कई ऐसे कदम उठाए जिनसे फ्रांस के लोगों में एक सामूहिक पहचान की भावना पैदा हुई:
- पितृभूमि (La Patrie) और नागरिक (Le Citoyen) का विचार: लोगों को एक संयुक्त समुदाय के रूप में देखने पर जोर दिया गया, जिसके समान अधिकार थे.
- नया फ्रांसीसी झंडा: शाही झंडे के स्थान पर तिरंगा झंडा अपनाया गया.
- एस्टेट जनरल का नाम बदलना: एस्टेट जनरल को नेशनल असेंबली में बदल दिया गया, जिसके सदस्य सक्रिय नागरिकों द्वारा चुने जाते थे.
- नए राष्ट्रगान और शपथें: राष्ट्र के नाम पर नए राष्ट्रगान रचे गए और शपथें ली गईं.
- केंद्रीय प्रशासनिक व्यवस्था: एक केंद्रीय प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित की गई जिसने सभी नागरिकों के लिए समान कानून बनाए.
- आंतरिक आयात-निर्यात शुल्क समाप्त: वस्तुओं के आवागमन पर लगे शुल्क समाप्त कर दिए गए और एक समान माप-तौल प्रणाली अपनाई गई.
- फ्रांसीसी भाषा को बढ़ावा: पेरिस में बोली जाने वाली फ्रांसीसी भाषा को राष्ट्र की साझा भाषा बनाया गया.
फ्रांसीसी क्रांतिकारियों ने घोषणा की कि उनका लक्ष्य यूरोप के लोगों को निरंकुश शासकों से मुक्त कराना है. जब फ्रांस की सेनाएँ यूरोप के अन्य शहरों में पहुँचीं, तो उन्होंने राष्ट्रवादी विचारों का प्रसार किया.
4. नेपोलियन का युग और राष्ट्रवाद (1799-1815)
नेपोलियन बोनापार्ट का जन्म 15 अगस्त 1769 को हुआ था. वह एक महान सम्राट था जिसने अपने व्यक्तित्व और कार्यों से पूरे यूरोप के इतिहास को प्रभावित किया. नेपोलियन ने फ्रांस में लोकतंत्र को समाप्त कर दिया, लेकिन उसने कई प्रशासनिक सुधार किए जिन्हें नेपोलियन कोड (1804) / नागरिक संहिता के नाम से जाना जाता है.
इस कोड ने निम्नलिखित सुधार किए:
- जन्म के आधार पर विशेषाधिकारों को समाप्त किया.
- कानून के समक्ष समानता स्थापित की.
- संपत्ति के अधिकार को सुरक्षित किया.
- सामंती व्यवस्था समाप्त कर किसानों को भू-दासत्व और जागीरदारी शुल्कों से मुक्ति दिलाई.
- शहरों में गिल्ड प्रतिबंधों को हटाया गया.
- परिवहन और संचार प्रणालियों में सुधार किया गया.
- एक समान शुल्क, समान माप-तौल प्रणाली और एक मुद्रा द्वारा राष्ट्र को संगठित करने का प्रयास किया.
नेपोलियन के इन सुधारों ने विभिन्न क्षेत्रों में राष्ट्रवाद की भावना को बढ़ावा दिया. हालाँकि, बढ़ी हुई कराधान, सेंसरशिप और फ्रांसीसी सेना में जबरन भर्ती जैसी उसकी नीतियों ने लोगों में फ्रांसीसी शासन के प्रति विरोध और राष्ट्रवादी भावनाओं को भी जन्म दिया.
18 जून 1815 को वाटरलू के युद्ध में नेपोलियन की हार हुई और उसे सेंट हेलेना द्वीप पर कैदी बनाकर भेज दिया गया, जहाँ 1821 में उसकी मृत्यु हो गई.
5. वियना कांग्रेस (1815) और रूढ़िवाद
1815 में नेपोलियन की हार के बाद, यूरोपीय शक्तियों (ब्रिटेन, रूस, प्रशिया और ऑस्ट्रिया) के प्रतिनिधियों ने ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में एक सम्मेलन आयोजित किया, जिसे वियना कांग्रेस कहा जाता है. इसकी मेजबानी ऑस्ट्रिया के चांसलर ड्यूक मेटरनिक ने की थी, जो एक घोर प्रतिक्रियावादी शासक था.
वियना कांग्रेस का मुख्य उद्देश्य यूरोप में उस व्यवस्था को पुनः स्थापित करना था, जिसे नेपोलियन के युद्धों और विजयों ने अस्त-व्यस्त कर दिया था. इसका उद्देश्य नेपोलियन युग का अंत कर मेटरनिक युग की शुरुआत करना था.
इसके प्रमुख प्रावधान थे:
- बोर्बोन राजवंश की पुनर्स्थापना: फ्रांस में बोर्बोन राजवंश को सत्ता में बहाल किया गया और लुई 18वाँ फ्रांस का राजा बना.
- फ्रांस की सीमाओं पर राज्यों की स्थापना: फ्रांस के चारों ओर नए राज्य स्थापित किए गए ताकि भविष्य में फ्रांस विस्तार न कर सके. उदाहरण के लिए, नीदरलैंड का राज्य स्थापित किया गया, जिसमें बेल्जियम शामिल था.
- जर्मन महासंघ को बरकरार रखना: 39 राज्यों के जर्मन महासंघ में कोई बदलाव नहीं किया गया, जिसे नेपोलियन ने स्थापित किया था.
- रूढ़िवादी शासन की स्थापना: इसका उद्देश्य यूरोप में राजतंत्र, चर्च, सामाजिक पदानुक्रम, संपत्ति और परिवार जैसे पारंपरिक संस्थानों को बनाए रखना था.
- क्रांतिकारी विचारों का दमन: रूढ़िवादी शासनों ने सेंसरशिप लागू की और उन गतिविधियों को नियंत्रित करने का प्रयास किया जिनसे स्वतंत्रता और मुक्ति के विचार फैल सकते थे.
6. क्रांतियों का युग (1830-1848)
वियना कांग्रेस द्वारा स्थापित रूढ़िवादी व्यवस्थाओं के कारण उदारवादी राष्ट्रवादियों को भूमिगत होकर काम करना पड़ा. यूरोप में 1830 और 1848 के बीच कई क्रांतियाँ हुईं, जिन्हें क्रांतियों का युग कहा जाता है.
उदारवादी राष्ट्रवादियों की भूमिका: इन क्रांतियों का नेतृत्व उदारवादी राष्ट्रवादियों ने किया, जो आमतौर पर शिक्षित मध्यम वर्ग (जैसे प्रोफेसर, स्कूली शिक्षक, क्लर्क और व्यावसायिक व्यक्ति) के थे.
- जुलाई क्रांति (1830, फ्रांस): फ्रांस में चार्ल्स दशम् एक निरंकुश शासक था. 25 जुलाई 1830 को चार्ल्स दशम् द्वारा जारी किए गए चार अध्यादेशों के विरोध में विद्रोह शुरू हुआ, जिसे जुलाई क्रांति कहा जाता है. इस क्रांति में बोर्बोन राजाओं को उखाड़ फेंका गया और उनकी जगह एक संवैधानिक राजतंत्र स्थापित किया गया, जिसका मुखिया लुई फिलिप था.
- बेल्जियम की स्वतंत्रता (1830): जुलाई क्रांति के प्रभाव से ब्रुसेल्स में विद्रोह हुआ और बेल्जियम नीदरलैंड के यूनाइटेड किंगडम से अलग हो गया.
- यूनानी स्वतंत्रता संग्राम (1821-1832): यूनान में भी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष हुआ, जो ऑटोमन साम्राज्य का हिस्सा था. 1832 की कुस्तुनतुनिया की संधि ने यूनान को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दी.
1848 की क्रांतियाँ: पूरे यूरोप में भुखमरी, बेरोजगारी और गरीबी से परेशान किसानों और श्रमिकों ने विद्रोह किया. इन विद्रोहों के साथ-साथ शिक्षित मध्यम वर्गों की क्रांतियाँ भी हुईं जिन्होंने संवैधानिक सरकार और राष्ट्रीय एकीकरण की मांग की.
- फ्रांस में: 1848 में फिर से क्रांति हुई, लुई फिलिप को भागना पड़ा और फ्रांस को एक गणतंत्र घोषित किया गया. सभी वयस्क पुरुषों को मताधिकार दिया गया.
- जर्मनी में: मध्यम वर्ग के राजनीतिक संगठनों ने फ्रैंकफर्ट संसद का आयोजन किया, जिसने एक जर्मन राष्ट्र के लिए संविधान का मसौदा तैयार किया. हालाँकि, यह प्रयास असफल रहा क्योंकि राजा ने संसद को भंग कर दिया.
7. इटली का एकीकरण (1859-1870)
19वीं सदी के मध्य में इटली सात राज्यों में बंटा हुआ था, जिनमें से केवल सार्डिनिया-पीडमोंट पर एक इतालवी राजघराने का शासन था. उत्तरी भाग ऑस्ट्रिया के हैब्सबर्ग साम्राज्य के नियंत्रण में था, मध्य भाग पोप के शासन में और दक्षिणी भाग स्पेन के बोर्बोन राजाओं के नियंत्रण में था.
इटली के एकीकरण की प्रक्रिया का आरंभ नेपोलियन बोनापार्ट ने किया, इसलिए उसे इटली में राष्ट्रवाद का जन्मदाता भी कहा जाता है.
इटली के एकीकरण में तीन प्रमुख नेताओं की भूमिका थी:
- जोसेफ मेजिनी (Giuseppe Mazzini): उसे इटली के एकीकरण का मसीहा कहा जाता है. वह एक साहित्यकार और क्रांतिकारी था जो गणतंत्र में विश्वास रखता था. मेजिनी ने ‘यंग इटली’ (1831 में) और ‘यंग यूरोप’ (1834 में) नामक गुप्त संगठनों की स्थापना की. उसका सपना था कि इटली एक गणराज्य बने.
- काउंट कावूर (Count Cavour): वह सार्डिनिया-पीडमोंट का मुख्यमंत्री था और उसे इटली के एकीकरण का राजनीतिज्ञ कहा जाता है. उसने फ्रांस के साथ एक चतुर कूटनीतिक गठबंधन किया और 1859 में ऑस्ट्रियाई सेनाओं को हराया. इस तरह उसने उत्तरी इटली के राज्यों को एकीकृत किया.
- जोसेफ गैरीबाल्डी (Giuseppe Garibaldi): उसे इटली के एकीकरण की तलवार कहा जाता है. वह एक प्रसिद्ध क्रांतिकारी था जिसने ‘लाल कुर्ती’ नामक स्वयंसेवकों की सेना बनाई. उसने 1860 में दक्षिण इटली और सिसिली को स्पेनिश बोर्बोन शासकों से मुक्त कराया. गैरीबाल्डी ने अपने व्यक्तिगत स्वार्थ को दरकिनार कर जीते हुए क्षेत्रों को विक्टर इमैनुएल II को सौंप दिया.
1861 में, विक्टर इमैनुएल II को एकीकृत इटली का राजा घोषित किया गया. 1870 तक, रोम को भी इटली में शामिल कर लिया गया और इस तरह इटली का एकीकरण पूरा हुआ.
8. जर्मनी का एकीकरण (1866-1871)
जर्मनी 300 से अधिक छोटे-बड़े राज्यों में बंटा हुआ था. नेपोलियन ने 1806 में जर्मन राइन राज्य संघ का निर्माण कर 300 से अधिक राज्यों को 39 राज्यों में बदल दिया, जिससे जर्मनी में एकीकरण की शुरुआत हुई. प्रशिया ने जर्मन एकीकरण के आंदोलन का नेतृत्व किया.
ओटो वॉन बिस्मार्क (Otto von Bismarck): वह प्रशिया का मुख्यमंत्री था और जर्मनी के एकीकरण का मुख्य वास्तुकार था. उसे “आयरन चांसलर” भी कहा जाता है. उसने “रक्त और लौह” (Blood and Iron) की नीति अपनाई.
सात वर्ष का संघर्ष (1864-1871): बिस्मार्क ने सात वर्षों में तीन युद्ध लड़े, जिससे जर्मनी का एकीकरण हुआ:
- डेनमार्क के खिलाफ (1864): बिस्मार्क ने ऑस्ट्रिया के साथ मिलकर डेनमार्क के खिलाफ युद्ध लड़ा और श्लेस्विग और होल्स्टीन प्रांतों को जीता.
- ऑस्ट्रिया के खिलाफ (1866) (सेडोवा का युद्ध): ऑस्ट्रिया को हराकर, बिस्मार्क ने जर्मन महासंघ से ऑस्ट्रिया का प्रभाव समाप्त कर दिया और उत्तरी जर्मन महासंघ की स्थापना की.
- फ्रांस के खिलाफ (1870-1871) (सेडान का युद्ध): बिस्मार्क ने फ्रांस को उकसाकर युद्ध छेड़ा और फ्रांस को हराया. इस जीत ने दक्षिणी जर्मन राज्यों को भी प्रशिया के नेतृत्व में एकजुट किया.
सेडान के युद्ध में ही एक महाशक्ति के पतन पर दूसरी यूरोपीय महाशक्ति जर्मनी का जन्म हुआ था.
1871 में, प्रशिया के राजा विलियम प्रथम को वर्साय में एक समारोह में जर्मन सम्राट (कैसर) घोषित किया गया. इस तरह जर्मनी का एकीकरण पूरा हुआ और जर्मनी यूरोप में एक महाशक्ति के रूप में स्थापित हुआ.
9. बाल्कन समस्या
बाल्कन क्षेत्र (आधुनिक रोमानिया, बुल्गारिया, अल्बानिया, यूनान, मैसेडोनिया, क्रोएशिया, बोस्निया-हर्जेगोविना, स्लोवेनिया, सर्बिया और मोंटेनेग्रो) में 19वीं सदी के अंत तक राष्ट्रवादी तनाव का एक महत्वपूर्ण स्रोत बन गया था. यह क्षेत्र ऑटोमन साम्राज्य के नियंत्रण में था.
- स्वतंत्रता और राष्ट्रवाद: ऑटोमन साम्राज्य के कमजोर पड़ने के साथ, बाल्कन के स्लाव लोग अपनी स्वतंत्रता और राष्ट्रीय पहचान के लिए संघर्ष करने लगे. उन्होंने इतिहास का हवाला देते हुए दावा किया कि वे पहले स्वतंत्र थे लेकिन बाद में विदेशी शक्तियों के अधीन हो गए.
- आपसी प्रतिद्वंद्विता: बाल्कन के विभिन्न जातीय समूह एक-दूसरे से ईर्ष्या करते थे और अपने लिए अधिक क्षेत्र प्राप्त करना चाहते थे.
- बड़ी शक्तियों की हस्तक्षेप: यूरोप की बड़ी शक्तियों (रूस, जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी, इंग्लैंड) ने बाल्कन क्षेत्र में अपने प्रभाव को बढ़ाने की कोशिश की, जिससे स्थिति और बिगड़ गई. प्रत्येक बड़ी शक्ति इस क्षेत्र पर अपना नियंत्रण स्थापित करना चाहती थी ताकि अन्य शक्तियों का प्रभाव न बढ़ सके.
परिणाम: बाल्कन क्षेत्र में राष्ट्रवादी तनाव और बड़ी शक्तियों की प्रतिद्वंद्विता अंततः प्रथम विश्व युद्ध का एक प्रमुख कारण बनी.
10. राष्ट्रवाद और साम्राज्यवाद
19वीं सदी के अंतिम चौथाई तक, राष्ट्रवाद की भावना में एक बड़ा बदलाव आया. अब इसे संकीर्ण उद्देश्यों के लिए देखा जाने लगा और इसने साम्राज्यवाद को जन्म दिया.
साम्राज्यवाद: जब एक शक्तिशाली राष्ट्र अपनी आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रभुत्व को दूसरे कमजोर राष्ट्रों पर थोपता है, तो उसे साम्राज्यवाद कहते हैं.
राष्ट्रवादी गौरव: यूरोपीय शक्तियों ने अपने राष्ट्रवादी गौरव को बढ़ाने और अपनी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए उपनिवेश स्थापित करना शुरू कर दिया.
तनाव में वृद्धि: इसने विभिन्न यूरोपीय शक्तियों के बीच तीव्र प्रतिस्पर्धा और तनाव को जन्म दिया, जिससे अंततः 1914 में प्रथम विश्व युद्ध छिड़ गया.
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