10th BSEB History Ex-4 Ultimate Free Notes PDF । भारत में राष्ट्रवाद सम्पूर्ण Notes
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इस नोट्स की मदद से विद्यार्थी न केवल परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त कर सकेंगे, बल्कि भारत में राष्ट्रवाद के विकास, स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख चरणों, और देश की आज़ादी के लिए किए गए संघर्षों की गहरी समझ भी विकसित कर पाएंगे।
BSEB कक्षा 10 इतिहास अध्याय 4 नोट्स PDF | भारत में राष्ट्रवाद - फ्री डाउनलोड करें
परिचय
भारत में राष्ट्रवाद का उदय एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना थी जिसने देश को स्वतंत्रता की ओर अग्रसर किया। 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में भारतीय लोगों में अपने राष्ट्र के प्रति प्रेम, एकता और स्वतंत्रता की भावना तीव्र होने लगी। यह भावना ब्रिटिश उपनिवेशवादी शासन के शोषण, भेदभाव और भारतीयों पर थोपी गई नीतियों की प्रतिक्रिया के रूप में उभरी। इस अध्याय में हम भारत में राष्ट्रवाद के विभिन्न चरणों, प्रमुख आंदोलनों, नेताओं और उनके योगदानों का अध्ययन करेंगे। यह केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि एक जन-आंदोलन था जिसने भारत के भविष्य की नींव रखी।
1. राष्ट्रवाद का अर्थ और उद्भव
राष्ट्रवाद: राष्ट्रवाद एक ऐसी भावना है जिसमें व्यक्ति अपने राष्ट्र के प्रति गहरी निष्ठा, प्रेम और समर्पण रखता है, और उसकी एकता, अखंडता तथा उन्नति के लिए कार्य करता है। इसमें अपनी संस्कृति, भाषा, इतिहास और पहचान पर गर्व करना शामिल है।
भारत में राष्ट्रवाद के उद्भव के कारण:
- ब्रिटिश साम्राज्यवाद का प्रभाव: अंग्रेजों की दमनकारी नीतियां, आर्थिक शोषण, भेदभावपूर्ण कानून और प्रशासनिक एकरूपता ने भारतीयों को एकजुट होने पर विवश किया।
- आर्थिक शोषण: अंग्रेजों ने भारतीय उद्योगों को नष्ट किया, किसानों और कारीगरों का शोषण किया, जिससे गरीबी और असंतोष बढ़ा।
- पश्चिमी शिक्षा और विचारों का प्रभाव: पश्चिमी शिक्षा के प्रसार से भारतीयों ने स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे आधुनिक विचारों को जाना, जिससे उनमें राजनीतिक चेतना आई।
- सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन: राजा राम मोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती, विवेकानंद जैसे सुधारकों ने समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर किया और भारतीयों में आत्म-सम्मान तथा राष्ट्रीय गौरव की भावना जगाई।
- प्रेस और साहित्य की भूमिका: समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और साहित्य ने राष्ट्रीय विचारों का प्रचार किया, लोगों को अंग्रेजों की नीतियों से अवगत कराया और एकजुट किया।
- यातायात और संचार के साधनों का विकास: रेलवे, डाक और तार जैसी सुविधाओं ने विभिन्न क्षेत्रों के लोगों को एक-दूसरे के करीब लाया और राष्ट्रीय भावना के प्रसार में मदद की।
2. प्रमुख राष्ट्रवादी आंदोलन और घटनाएँ
भारत में राष्ट्रवाद का विकास कई चरणों और आंदोलनों से होकर गुजरा।
2.1. 1857 का सिपाही विद्रोह
- कारण: यह विद्रोह ब्रिटिश नीतियों, जैसे- गोद निषेध प्रथा, चर्बी वाले कारतूसों का उपयोग, आर्थिक शोषण और धार्मिक हस्तक्षेप के कारण हुआ था।
- परिणाम: यद्यपि यह विद्रोह विफल रहा, लेकिन इसने भारतीयों में एकता और राष्ट्रवाद की भावना को मजबूत किया। इसने ब्रिटिश शासन को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करने पर मजबूर किया और कंपनी शासन समाप्त होकर ब्रिटिश ताज के हाथों में चला गया।
2.2. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना
- स्थापना: ए.ओ. ह्यूम द्वारा 1885 में की गई, इसका उद्देश्य भारतीयों को एक मंच पर लाना और उनकी राजनीतिक मांगों को ब्रिटिश सरकार के सामने रखना था।
- प्रारंभिक चरण (उदारवादी): शुरुआती नेताओं जैसे दादाभाई नौरोजी, फिरोजशाह मेहता, गोपाल कृष्ण गोखले ने शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीकों से सुधारों की मांग की।
- गरम दल का उदय: लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और विपिन चंद्र पाल (लाल-बाल-पाल) जैसे नेताओं ने ‘स्वराज’ (स्वशासन) की मांग की और अंग्रेजों के खिलाफ अधिक आक्रामक रुख अपनाया।
2.3. बंगाल का विभाजन
- कारण: लॉर्ड कर्जन द्वारा प्रशासनिक सुविधा का हवाला देते हुए बंगाल का विभाजन किया गया, लेकिन वास्तविक उद्देश्य ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति के तहत हिंदू-मुस्लिम एकता को तोड़ना था।
- परिणाम: इसके विरोध में स्वदेशी आंदोलन और बहिष्कार आंदोलन चलाए गए। लोगों ने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया और स्वदेशी उद्योगों को बढ़ावा दिया। यह आंदोलन पूरे देश में फैल गया और राष्ट्रवाद की भावना को तीव्र किया।
2.4. मुस्लिम लीग की स्थापना
- स्थापना: ढाका में आगा खान और नवाब सलीमुल्लाह द्वारा मुस्लिम हितों की रक्षा के लिए की गई।
- उद्देश्य: यह अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति का परिणाम था, जिसने बाद में भारत के विभाजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
2.5. साइमन कमीशन
- पृष्ठभूमि: ब्रिटिश सरकार ने राष्ट्रवाद के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए भारत में संवैधानिक सुधारों की समीक्षा हेतु एक आयोग गठित किया।
- गठन: 1927 में ब्रिटिश सरकार ने सर जॉन साइमन की अध्यक्षता में एक सात सदस्यीय वैधानिक आयोग का गठन किया।
- विवाद: इस आयोग में एक भी भारतीय सदस्य शामिल नहीं किया गया, जिससे भारतीयों में गहरा असंतोष फैल गया।
- विरोध: 1928 में जब साइमन कमीशन भारत आया, तो उसका स्वागत “साइमन वापस जाओ” के नारों और काले झंडों से किया गया। कांग्रेस, मुस्लिम लीग और अन्य संगठनों ने मिलकर इसका व्यापक विरोध किया।
- महत्व: इस विरोध ने भारतीयों की एकता को और मजबूत किया तथा स्वतंत्रता की मांग को गति दी।
2.6. पूर्ण स्वराज की मांग
- पृष्ठभूमि: साइमन कमीशन के विरोध के बाद लॉर्ड इरविन ने 1929 में भारत के लिए “डोमिनियन स्टेटस” (औपनिवेशिक स्वशासन) का प्रस्ताव रखा, लेकिन यह भारतीयों की आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सका।
- लाहौर अधिवेशन (1929): कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में, जिसकी अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू ने की, “पूर्ण स्वराज” (पूर्ण स्वतंत्रता) का प्रस्ताव पारित किया गया।
- स्वतंत्रता दिवस: 26 जनवरी 1930 को पूरे भारत में ‘स्वतंत्रता दिवस’ मनाया गया। लोगों से यह प्रतिज्ञा लेने का आह्वान किया गया कि वे पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे।
- महत्व: इस प्रस्ताव ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नया लक्ष्य दिया — पूर्ण स्वतंत्रता। यही लक्ष्य आगे चलकर भारत की आज़ादी का आधार बना।
3. गांधीवादी युग और जन आंदोलन
मोहनदास करमचंद गांधी (महात्मा गांधी) के भारत आगमन (1915) के बाद भारतीय स्वतंत्रता संग्राम ने एक नई दिशा ली।
3.1. गांधीजी के प्रारंभिक आंदोलन
- चंपारण सत्याग्रह (1917): बिहार के चंपारण में किसानों पर नील की खेती के लिए अत्याचार के खिलाफ पहला सफल सविनय अवज्ञा आंदोलन।
- खेड़ा सत्याग्रह (1918): गुजरात के खेड़ा जिले में फसल खराब होने के बावजूद लगान वसूलने के खिलाफ किसानों का आंदोलन।
- अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन (1918): मजदूरों की मजदूरी बढ़ाने की मांग को लेकर गांधीजी का पहला भूख हड़ताल।
3.2. रॉलेट एक्ट और जलियांवाला बाग हत्याकांड
- रॉलेट एक्ट: इस कानून ने ब्रिटिश सरकार को बिना मुकदमे के किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करने और जेल में डालने का अधिकार दिया। इसे “काला कानून” कहा गया।
- जलियांवाला बाग हत्याकांड: रॉलेट एक्ट के विरोध में अमृतसर के जलियांवाला बाग में शांतिपूर्ण सभा कर रहे लोगों पर जनरल डायर ने गोलियां चलवा दीं, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया और राष्ट्रवाद की भावना को और मजबूत किया।
3.3. खिलाफत आंदोलन और असहयोग आंदोलन
- खिलाफत आंदोलन: तुर्की के खलीफा के समर्थन में भारतीय मुसलमानों द्वारा चलाया गया आंदोलन।
- असहयोग आंदोलन: गांधीजी ने खिलाफत आंदोलन को असहयोग आंदोलन से जोड़कर हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा दिया। इस आंदोलन में सरकारी स्कूलों, कॉलेजों, अदालतों, उपाधियों और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया।
- चौरी-चौरा कांड (1922): गोरखपुर के चौरी-चौरा में भीड़ ने एक पुलिस थाने में आग लगा दी, जिससे कई पुलिसकर्मी मारे गए। इस हिंसा से आहत होकर गांधीजी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया।
3.4. सविनय अवज्ञा आंदोलन
- दांडी मार्च (नमक सत्याग्रह): गांधीजी ने नमक कानून तोड़ने के लिए साबरमती आश्रम से दांडी तक मार्च किया। नमक पर कर ब्रिटिश शासन के सबसे दमनकारी कृत्यों में से एक था।
- उद्देश्य: ब्रिटिश कानूनों की शांतिपूर्ण अवज्ञा करना और पूर्ण स्वराज्य की मांग करना।
- परिणाम: इस आंदोलन ने ब्रिटिश सरकार पर भारी दबाव डाला और गांधी-इरविन समझौता हुआ।
3.5. भारत छोड़ो आंदोलन
- कारण: द्वितीय विश्व युद्ध में भारत को बिना उसकी सहमति के शामिल करना, क्रिप्स मिशन की विफलता और ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियां।
- नारा: गांधीजी ने “करो या मरो” का नारा दिया।
- परिणाम: यह आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का अंतिम बड़ा जन आंदोलन था जिसने ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी और उन्हें यह महसूस कराया कि अब भारत पर शासन करना संभव नहीं है।
4. क्रांतिकारियों का योगदान
गांधीवादी आंदोलनों के साथ-साथ कई क्रांतिकारी नेताओं ने भी स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर किया।
- प्रमुख क्रांतिकारी: भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, चंद्रशेखर आजाद, खुदीराम बोस, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, रानी लक्ष्मीबाई आदि।
- संगठन: हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) जैसे संगठनों ने ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष किया।
- योगदान: इन क्रांतिकारियों ने अपने बलिदान से युवाओं को प्रेरित किया और अंग्रेजों के मन में डर पैदा किया।
5. राष्ट्रवाद के उदय में बिहार की भूमिका
बिहार ने भारत में राष्ट्रवाद के उदय और स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- 1857 का विद्रोह: बाबू कुंवर सिंह ने जगदीशपुर से इस विद्रोह का नेतृत्व किया और अंग्रेजों को कड़ी चुनौती दी।
- चंपारण सत्याग्रह (1917): गांधीजी का भारत में पहला सफल सत्याग्रह बिहार के चंपारण में हुआ, जिसने उन्हें राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित किया।
- असहयोग आंदोलन: डॉ. राजेंद्र प्रसाद, मजहरुल हक, ब्रजकिशोर प्रसाद जैसे नेताओं ने बिहार में इस आंदोलन का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया।
- भारत छोड़ो आंदोलन (1942): जयप्रकाश नारायण जैसे नेताओं ने इस आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई।
- किसान आंदोलन: स्वामी सहजानंद सरस्वती जैसे नेताओं ने बिहार में किसान सभाओं का गठन कर किसानों के हितों की रक्षा की और उन्हें राष्ट्रवादी धारा से जोड़ा।
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