10th BSEB History Ex-8 Ultimate Free Notes PDF । प्रेस संस्कृति और राष्ट्रवाद सम्पूर्ण Notes
Bihar Board Class 10 History Ultimate Free Notes PDF in Hindi की इस श्रृंखला में, हम आपको नवीनतम BSEB सिलेबस के अनुसार तैयार किए गए आसान और विस्तृत नोट्स प्रदान कर रहे हैं, ताकि आप परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त कर सकें और कॉन्सेप्ट्स को गहराई से समझ सकें।
इस पोस्ट में आप बिहार बोर्ड 10 इतिहास का अध्याय 8 — “प्रेस संस्कृति और राष्ट्रवाद” के नोट्स को देखने वाले हैं। यह नोट्स विशेष रूप से बिहार बोर्ड कक्षा 10 के छात्रों की जरूरतों को ध्यान में रखकर सरल, सहज भाषा में और नवीनतम सिलेबस के अनुसार तैयार किया गया है। इसमें अध्याय के सभी महत्वपूर्ण टॉपिक्स — जैसे भारत में मुद्रण कला का विकास, प्रारंभिक मुद्रण केंद्रों की स्थापना, अख़बारों और पत्रिकाओं की शुरुआत, औपनिवेशिक शासन द्वारा प्रेस पर लगाए गए नियंत्रण, भारतीय संपादकों और लेखकों का योगदान, प्रेस की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष, तथा राष्ट्रवादी आंदोलन में प्रेस की भूमिका — को बहुत ही आसान और स्पष्ट भाषा में समझाया गया है, ताकि विद्यार्थी इन्हें आसानी से याद कर सकें।
इस नोट्स की मदद से विद्यार्थी न केवल परीक्षा में उत्कृष्ट अंक प्राप्त कर सकेंगे, बल्कि वे यह भी समझ पाएंगे कि प्रेस ने भारत में जनजागरण फैलाने, राष्ट्रीय चेतना को प्रबल करने और स्वतंत्रता संग्राम को संगठित करने में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
BSEB कक्षा 10 इतिहास अध्याय 8 नोट्स PDF | प्रेस संस्कृति और राष्ट्रवाद - फ्री डाउनलोड करें
1. परिचय (Introduction)
“प्रेस संस्कृति और राष्ट्रवाद” अध्याय हमें मुद्रण (प्रिंट) के आगमन और उसके प्रसार की कहानी बताता है, जिसने भारतीय समाज और राजनीति में क्रांति ला दी। इसने न केवल सूचनाओं के आदान-प्रदान को आसान बनाया बल्कि राष्ट्रवाद की भावना को जगाने और उसे मजबूत करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह अध्याय दर्शाता है कि कैसे मुद्रण संस्कृति ने लोगों के विचारों को प्रभावित किया, उन्हें जागरूक किया और स्वतंत्रता संग्राम को गति प्रदान की।
2. मुद्रण संस्कृति का प्रारंभिक विकास (शुरुआती दौर)
चीन में मुद्रण की शुरुआत:
- हाथ से छापने की तकनीक सबसे पहले चीन में विकसित हुई।
- छपाई की सबसे पुरानी तकनीक वुडब्लॉक (लकड़ी के ब्लॉक) से होती थी, जहाँ लकड़ी के ब्लॉक पर अक्षर उकेर कर उन्हें स्याही लगाकर कागज़ पर छापा जाता था।
- लगभग 594 ईस्वी से चीन में किताबें वुडब्लॉक तकनीक से छपने लगीं।
- चीन लंबे समय तक मुद्रित सामग्री का सबसे बड़ा उत्पादक था।
- कुलीन वर्ग के अधिकारी, व्यापारी और शहरी नागरिक इस छपी हुई सामग्री का उपयोग करते थे।
- शंघाई जैसे शहरों में, पश्चिमी शैली के स्कूलों की स्थापना के बाद, हाथ से छपी हुई सामग्री की जगह यांत्रिक प्रेस से छपी किताबों ने ले ली।
जापान और कोरिया में मुद्रण:
- बौद्ध धर्म प्रचारक 768-770 ईस्वी के आसपास हाथ से छपाई की तकनीक को चीन से जापान ले गए।
- जापान में छपी सबसे पुरानी पुस्तक ‘डायमंड सूत्र’ है, जिसे 868 ईस्वी में छापा गया था। इसमें पाठ के साथ-साथ चित्र भी हैं।
- कोरिया में भी 13वीं शताब्दी में धातुओं के अक्षरों का उपयोग करके मुद्रण की शुरुआत हुई।
यूरोप में मुद्रण का आगमन:
- मार्को पोलो नामक इतालवी यात्री 1295 में चीन से वुडब्लॉक मुद्रण की तकनीक को यूरोप लेकर आया।
- यूरोप में, विशेषकर इटली में, किताबों की बढ़ती माँग के कारण वुडब्लॉक मुद्रण तेज़ी से लोकप्रिय हुआ।
- धीरे-धीरे, किताबों की बढ़ती माँग को पूरा करने के लिए एक तेज़ और अधिक कुशल मुद्रण तकनीक की आवश्यकता महसूस हुई।
3. गुटेनबर्ग और मुद्रण क्रांति
योहान गुटेनबर्ग:
- जर्मनी के योहान गुटेनबर्ग ने 1430 के दशक में मुद्रण के लिए एक यांत्रिक प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार किया।
- गुटेनबर्ग का जन्म स्ट्रासबर्ग में हुआ था और वे बचपन से ही तेल और जैतून प्रेस से परिचित थे। उन्होंने अपनी जानकारी का उपयोग प्रिंटिंग प्रेस बनाने में किया।
- उनके प्रेस में जैतून प्रेस का ढाँचा, साँचे का उपयोग करके बनाए गए धातु के अक्षर और अक्षरों को सही जगह पर व्यवस्थित करने की प्रणाली थी।
- उन्होंने अपनी प्रिंटिंग प्रेस का उपयोग करके बाइबिल की लगभग 180 प्रतियाँ छापीं, जिन्हें ‘गुटेनबर्ग बाइबिल’ के नाम से जाना जाता है। इसे पूरा करने में लगभग 3 साल लगे।
मुद्रण क्रांति के प्रभाव:
- गुटेनबर्ग की प्रिंटिंग प्रेस ने किताबों के उत्पादन की लागत को कम किया और उनकी पहुँच को बढ़ाया।
- यह सिर्फ किताबों के उत्पादन में वृद्धि नहीं थी, बल्कि इसने लोगों के जीवन, सोचने के तरीके और दुनिया के साथ संबंध को भी बदल दिया।
- साक्षरता दर में वृद्धि हुई, जिससे नए पाठक वर्ग का उदय हुआ।
- धार्मिक सुधार आंदोलनों को भी मुद्रण के माध्यम से गति मिली।
4. भारत में मुद्रण का आगमन
पुर्तगालियों का योगदान:
- भारत में प्रिंटिंग प्रेस सबसे पहले पुर्तगाली मिशनरियों द्वारा गोवा में 16वीं शताब्दी के मध्य में लाया गया।
- पहला प्रिंटिंग प्रेस 1556 ईस्वी में गोवा में स्थापित किया गया था।
- पुर्तगाली पादरियों ने कोंकणी और कन्नड़ भाषाओं में कई किताबें छापीं।
- 1674 तक, लगभग 50 किताबें कोंकणी और कन्नड़ भाषाओं में छप चुकी थीं।
तमिल और मलयालम में मुद्रण:
- डच प्रोटेस्टेंट मिशनरियों ने 32 तमिल ग्रंथ छापे, जिनमें से कुछ सबसे पुरानी तमिल पुस्तकें थीं।
- केरल में 1713 में पहली मलयालम पुस्तक छपी, जिसे कैथोलिक पादरियों ने छापा था।
अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी और प्रेस:
- ईस्ट इंडिया कंपनी ने 18वीं शताब्दी के अंत तक प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना की।
- जेम्स ऑगस्टस हिक्की ने 1780 में ‘बंगाल गजट’ नामक भारत का पहला साप्ताहिक अंग्रेजी अखबार निकालना शुरू किया।
- हिक्की एक ऐसे अखबार की कल्पना कर रहे थे जो सभी के लिए खुला हो, स्वतंत्र हो, और किसी से प्रभावित न हो।
5. वर्नाक्युलर प्रेस और भारतीय राष्ट्रवाद
भारतीय भाषाओं में पत्रकारिता का उदय:
- 19वीं शताब्दी के प्रारंभ से भारतीय भाषाओं में भी अखबार और पत्रिकाएँ निकलने लगीं।
- बंगाली, हिंदी, मराठी, गुजराती, उर्दू जैसी भाषाओं में समाचार पत्रों ने लोगों तक खबरें और विचार पहुँचाना शुरू किया।
- राजा राममोहन राय ने ‘संवाद कौमुदी’ और ‘मिरात-उल-अखबार’ जैसे समाचार पत्र प्रकाशित किए, जिनसे सामाजिक सुधार और राष्ट्रवाद का प्रचार हुआ।
- ईश्वर चंद्र विद्यासागर का ‘सोमप्रकाश’, हरिश्चंद्र मुखर्जी का ‘हिंदू पैट्रियट’, अमृत बाज़ार पत्रिका, केसरी, मराठा जैसे पत्रों ने राष्ट्रवादी विचारों को फैलाने में भूमिका निभाई।
राष्ट्रवाद के विकास में प्रेस की भूमिका:
- प्रेस ने राष्ट्रवादी नेताओं के विचारों, लेखों और भाषणों को जन-जन तक पहुँचाया।
- विभिन्न क्षेत्रों के लोगों को एक साझा पहचान से जोड़ने में मदद की, जिससे अखिल भारतीय राष्ट्रवाद की भावना मजबूत हुई।
- अखबारों ने ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों और अन्याय को उजागर किया।
- जनता को राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर शिक्षित किया और उन्हें स्वतंत्रता संग्राम के लिए प्रेरित किया।
6. वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट (देशी प्रेस अधिनियम)
पृष्ठभूमि:
- भारतीय भाषाओं में छपने वाले अखबारों की संख्या बढ़ने लगी और वे ब्रिटिश सरकार की आलोचना करने लगे।
- इससे सरकार ने उन्हें नियंत्रित करने के लिए कदम उठाए।
अधिनियम का लागू होना:
- 1878 में लॉर्ड लिटन ने ‘वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट’ पारित किया।
- इस अधिनियम ने सरकार को भारतीय भाषाओं के समाचार पत्रों पर सेंसरशिप लगाने का अधिकार दिया।
- किसी भी आपत्तिजनक खबर या संपादकीय को प्रकाशित होने से रोका जा सकता था।
अधिनियम के प्रभाव:
- सरकार के खिलाफ लिखने वाले समाचार पत्रों पर जुर्माना और जब्ती की कार्रवाई की गई।
- ‘अमृत बाज़ार पत्रिका’ जैसे अखबारों ने अंग्रेजी भाषा अपनाकर इस कानून से बचने की कोशिश की।
- राष्ट्रवादियों ने इसे प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला माना और विरोध किया।
7. राष्ट्रवादी आंदोलनों पर प्रेस का प्रभाव
बाल गंगाधर तिलक:
- उन्होंने ‘केसरी’ और ‘मराठा’ जैसे अखबारों के माध्यम से राष्ट्रवाद का प्रचार किया।
- उनकी पत्रकारिता के कारण उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा, जिससे प्रेस स्वतंत्रता के लिए जनसमर्थन बढ़ा।
महात्मा गांधी:
- उन्होंने ‘यंग इंडिया’ और ‘हरिजन’ जैसे अखबारों से सत्याग्रह और स्वराज के विचार फैलाए।
- प्रेस का उपयोग लोगों को एकजुट करने के लिए किया।
8. उपन्यास, किताबें और आम जनता
उपन्यासों की भूमिका:
- उपन्यासों ने समाज और राजनीति के मुद्दों पर लोगों को जागरूक किया।
- ‘आनंदमठ’ जैसे उपन्यासों ने देशभक्ति और राष्ट्रवाद को प्रोत्साहित किया।
किताबों और पुस्तकालयों का प्रसार:
- छोटी लाइब्रेरियों और किताबों के माध्यम से ज्ञान गाँवों तक पहुँचा।
- महिलाओं, श्रमिकों और किसानों को भी पढ़ने का अवसर मिला।
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Notes क्या होते हैं और क्यों आवश्यक होते हैं?
कई छात्रों के मन में यह सवाल आता है कि आखिर किसी विषय का Notes क्या होता है? चलिए इसे सरल शब्दों में समझते हैं।
Notes किसी भी विषय का संक्षिप्त और आसान सारांश होते हैं — यानी ऐसे पन्ने या कॉपी जिनमें किसी अध्याय की मुख्य बातें, महत्वपूर्ण परिभाषाएँ, सूत्र, उदाहरण और अवधारणाएँ छोटे-छोटे बिंदुओं में लिखी जाती हैं। Notes की आवश्यकता यह होती है कि छात्र कम समय में पूरे विषय को दोहरा सकें और कठिन टॉपिक को आसानी से समझ सकें।
अनेक शिक्षकों के अनुसार, Notes एक ऐसा संक्षिप्त लेखन होता है जो पढ़ाई और परीक्षा दोनों के लिए सहायक होता है। अच्छे Notes की मदद से छात्रों को बार-बार पूरी किताब पढ़ने की ज़रूरत नहीं पड़ती क्योंकि इनमें वही बातें शामिल होती हैं जो परीक्षा की दृष्टि से सबसे ज़्यादा जरूरी होती हैं।
जब छात्र स्वयं Notes तैयार करते हैं, तो वे केवल याद नहीं कर रहे होते बल्कि विषय को गहराई से समझ रहे होते हैं। इस प्रक्रिया से ज्ञान लंबे समय तक याद रहता है और आत्मविश्वास भी बढ़ता है।
Bihar Board Class 10 का हमारे Notes कैसे तैयार किए गए हैं?
- हमारे द्वारा तैयार किए गए सभी विषयों के नोट्स Bihar Board मैट्रिक के नवीनतम सिलेबस पर आधारित है।
- सभी विषयों के प्रत्येक अध्याय के Notes को सरल, स्पष्ट एवं आसान भाषा में तैयार किया गया है।
- सभी Concepts को Example के साथ समझाया गया है जिससे सभी छात्र आसानी से समझ पाए।
- प्रत्येक अध्याय के महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर (VVI Questions) और वस्तुनिष्ठ प्रश्न भी शामिल किए गए हैं।
- विषयवस्तु को स्पष्ट चित्रों और उदाहरण के साथ भी समझाया गया गया है।
FAQ's About BSEB Class10 Ultimate Notes
1: क्या ये नोट्स BSEB के नए सिलेबस 2025-26 पर आधारित हैं?
2: क्या केवल इन नोट्स को पढ़कर अच्छे अंक लाए जा सकते हैं?
3: क्या ये सभी नोट्स फ्री (Free) में उपलब्ध हैं?
4: मैं इन नोट्स का PDF कैसे डाउनलोड कर सकता हूँ?
5: क्या इन नोट्स में Objective और Subjective दोनों प्रकार के प्रश्न शामिल हैं?
सारांश :
हम आशा करते हैं कि हमारे द्वारा तैयार किए गए Bihar Board 10th History Ultimate Notes आपके अध्ययन में बहुत सहायक सिद्ध होंगे। यह Notes न केवल परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि इतिहास की अवधारणाओं (concepts), महत्वपूर्ण तिथियाँ और घटनाएँ को गहराई से समझने के लिए भी तैयार किए गए हैं।
इन Notes को हमने सरल भाषा, सटीक व्याख्या, चित्रों, उदाहरणों और महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर के साथ तैयार किया है ताकि प्रत्येक विद्यार्थी इतिहास के सभी टॉपिक को आसानी से समझ सके और पूर्ण आत्मविश्वास के साथ अपनी परीक्षा की तैयारी कर सके।
यदि पढ़ाई के दौरान आपके मन में कोई doubt या confusion आता है, तो BSEBsolution.in पर दिए गए अध्यायवार समाधान और व्याख्या आपके सभी संदेहों को दूर करने में मदद करेंगे।
इस Notes का उद्देश्य यही है कि Bihar Board Class 10 के हर छात्र को एक ही स्थान पर complete, free, और high-quality study material मिले — ताकि उन्हें अलग-अलग किताबों या वेबसाइटों की खोज में समय बर्बाद न करना पड़े।