BSEB 10th Economics Exercise 5 Solution in Hindi

BSEB 10th History Exercise 5 Solution in Hindi : अर्थव्यवस्था और आजीविका के सभी प्रश्नों के समाधान pdf | अभी डाउनलोड करें!

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वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objcetive Questions)

Q1: स्पिनिंग जेनी का आविष्कार कब हुआ ?
[क] 1769
[ख] 1770
[ग] 1773
[घ] 1775
Q2: सेफ्टी लैम्प का आविष्कार किसने किया ?
[क] जेम्स हारग्रीब्ज
[ख] जॉन के
[ग] क्राम्पटन
[घ] हम्फ्री डेवी
Q3: बम्बई में सर्वप्रथम सूती कपड़ों के मिलों की स्थापना कब हुई ?
[क] 1851
[ख] 1885
[ग] 1907
[घ] 1914
Q4: 1917 ई० में भारत में पहला जूट मिल किस शहर में स्थापित हुआ ?
[क] कलकत्ता
[ख] दिल्ली
[ग] बम्बई
[घ] पटना
Q5: भारत में कोयला उद्योग का प्रारम्भ कब हुआ ?
[क] 1907
[ख] 1914
[ग] 1916
[घ] 1919
Q6: जमशेद जी टाटा ने टाटा आयरन एण्ड स्टील कम्पनी की स्थापना कब की ?
[क] 1854
[ख] 1907
[ग] 1915
[घ] 1923
Q7: भारत में टाटा हाइड्रो-इलेक्ट्रीक पावर स्टेशन की स्थापना कब हुई ?
[क] 1910
[ख] 1951
[ग] 1955
[घ] 1962
Q8: इंग्लैंड में सभी स्त्री एवं पुरुषों को वयस्क मताधिकार कब प्राप्त हुआ ?
[क] 1838
[ख] 1881
[ग] 1918
[घ] 1932
Q9: ‘अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस’ की स्थापना कब हुई ?
[क] 1848
[ख] 1881
[ग] 1885
[घ] 1920
Q10: भारत के लिए पहला फैक्ट्री ऐक्ट कब पारित हुआ ?
[क] 1838
[ख] 1858
[ग] 1881
[घ] 1911

रिक्त स्थानों की पूर्ति करें :

1. सन् 1838 ई० में इंग्लैंड में चार्टिस्ट आन्दोलन की शुरुआत हुई।
2. सन् 1926 में मजदूर संघ अधिनियम पारित हुआ।
3. ‘न्यूनतम मजदूरी कानून सन् 1948 ई० मे हुई।
4. अन्तर्राष्ट्रीय श्रमिक संघ की स्थापना 1864 ई० में हुई।
5. प्रथम फैक्ट्री ऐक्ट में महिलाओं एवं बच्चों की कार्य घंटा एवं आयु सीमा को निश्चित किया गया।

सुमेलित करें

मिलन करने वाले प्रश्नों में उसका सही उत्तर उस प्रश्न के सामने ही दिया गया है।
समूह ‘अ’ समूह ‘ब’
1. स्पिनिंग जेनी (ङ) जेम्स हरग्रिब्ज
2. प्लाइंग शट्ल (घ) जॉन के
3. पवार लूम (ख) एडमण्ड कार्टराइट
4. वाष्प इंजन (ग) जेम्स वॉट
5. स्पिनिंग म्यूल (क) सैम्युल क्राम्पटन

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (20 शब्दों में उत्तर दें)

Q1: फैक्ट्री प्रणाली के विकास के किन्ही दो कारणों को बतायें ।
उत्तर : फैक्ट्री प्रणाली के विकास के दो मुख्य कारण नई मशीनों का आविष्कार और पूंजी एवं सस्ते श्रम की उपलब्धता थे।
Q2: बुर्जुआ वर्ग की उत्पत्ति कैसे हुई ?
उत्तर : औद्योगिकीकरण के परिणामस्वरूप समाज में एक नए मध्यम वर्ग का उदय हुआ, जिसे बुर्जुआ वर्ग कहा गया। इसमें मुख्य रूप से व्यापारी और उद्योगपति शामिल थे।
Q3: अठारहवीं शताब्दी में भारत के मुख्य उद्योग कौन-कौन से थे ?
उत्तर : अठारहवीं शताब्दी में भारत के मुख्य उद्योगों में सूती वस्त्र, रेशम, नील, चीनी तथा हस्तशिल्प उद्योग प्रमुख रूप से शामिल थे।
Q4: निरुद्योगीकरण से आपका क्या तात्पर्य है ?
उत्तर : ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय कुटीर एवं हस्तशिल्प उद्योगों के पतन और विनाश की प्रक्रिया को निरुद्योगीकरण कहा जाता है।
Q5: औद्योगिक आयोग की नियुक्ति कब हुई ? इसके क्या उद्देश्य थे ?
उत्तर : भारतीय औद्योगिक आयोग की नियुक्ति 1916 में हुई, जिसका मुख्य उद्देश्य भारतीय उद्योगों के विकास हेतु क्षेत्रों की पहचान करना था।

लघु उत्तरीय प्रश्न (60 शब्दों में उत्तर दें)

Q1: औद्योगीकरण से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर : औद्योगीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें वस्तुओं का उत्पादन हस्तशिल्प के स्थान पर मशीनों द्वारा बड़े पैमाने पर कारखानों में होने लगता है। इसमें नई तकनीक, वाष्प शक्ति और भारी पूंजी निवेश के माध्यम से उत्पादन की गति तीव्र हो जाती है। इसकी शुरुआत सबसे पहले ब्रिटेन में हुई थी, जिससे समाज में शहरीकरण और नई आर्थिक व्यवस्था का जन्म हुआ।
Q2: औद्योगीकरण ने मजदूरों की आजीविका को किस तरह प्रभावित किया ?
उत्तर : औद्योगीकरण ने मजदूरों की आजीविका पर गहरा प्रभाव डाला। मशीनों के आगमन से कुटीर उद्योग नष्ट हो गए, जिससे ग्रामीण मजदूर शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर हुए। फैक्ट्रियों में उन्हें कम वेतन, असुरक्षित वातावरण और कठिन परिस्थितियों में काम करना पड़ा। मशीनों (जैसे स्पिनिंग जेनी) के कारण बेरोजगारी बढ़ने से मजदूरों में भारी असुरक्षा और असंतोष पैदा हुआ।
Q3: स्लम पद्धति की शुरूआत कैसे हुई ?
उत्तर : औद्योगिकीकरण के परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर कारखानों की स्थापना हुई, जहाँ काम करने के लिए भारी संख्या में ग्रामीण मजदूर शहरों की ओर पलायन करने लगे। शहर के धनी मिल-मालिकों द्वारा इन मजदूरों के आवास की कोई समुचित व्यवस्था नहीं की गई थी। विवश होकर मजदूर कारखानों के निकट अत्यंत छोटे, तंग और अस्वास्थ्यकर स्थानों पर रहने लगे, जिससे स्लम पद्धति की शुरूआत हुई।
Q4: न्यूनतम मजदूरी कानून कब पारित हुआ और इसके क्या उद्देश्य थे?
उत्तर : भारत में न्यूनतम मजदूरी कानून सन् 1948 में पारित हुआ। इसके प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित थे:

शोषण को रोकना : नियोक्ताओं द्वारा मजदूरों के आर्थिक शोषण पर अंकुश लगाना।

बुनियादी आवश्यकताएं : श्रमिकों को इतनी मजदूरी दिलाना जिससे वे अपनी बुनियादी जरूरतें जैसे भोजन, कपड़ा और मकान पूरी कर सकें।

जीवन स्तर में सुधार : मजदूरों के जीवन स्तर को ऊँचा उठाना और उनकी कार्यक्षमता को सुरक्षित करना।
Q5: कोयला एवं लौह उद्योग ने औद्योगीकरण को गति प्रदान की, कैसे ?
उत्तर : कोयला और लौह उद्योग औद्योगीकरण की आधारशिला थे। कोयले ने भाप इंजनों और कारखानों को चलाने के लिए आवश्यक ऊर्जा प्रदान की, जिससे उत्पादन में तेजी आई। वहीं, लोहे का उपयोग मजबूत मशीनों, रेल पटरियों और कारखानों के ढांचे बनाने में किया गया। इन दोनों उद्योगों के समन्वय ने परिवहन और विनिर्माण के क्षेत्र में क्रांति ला दी, जिससे बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव हुआ।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (150 शब्दों में उत्तर दें)

Q1: औद्योगीकरण के कारणों का उल्लेख करें ।
उत्तर : औद्योगीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें वस्तुओं का उत्पादन हाथ की तुलना में बड़ी मशीनों द्वारा कारखानों में बड़े पैमाने पर किया जाता है। इसकी शुरुआत 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में सबसे पहले इंग्लैंड में हुई और धीरे-धीरे यह पूरे विश्व में फैल गई। औद्योगीकरण के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:

नए आविष्कारों का योगदान : औद्योगीकरण की नींव तकनीक और मशीनों पर टिकी थी। 18वीं शताब्दी में हुए अनेक आविष्कारों ने उत्पादन की प्रक्रिया को बदल दिया। उदाहरण के लिए, जेम्स वाट का वाष्प इंजन , जॉन के का फ्लाइंग शटल, जेम्स हारग्रीव्स की स्पिनिंग जेनी और रिचर्ड आर्कराइट का वॉटर फ्रेम। इन मशीनों ने सूती वस्त्र उद्योग में क्रांति ला दी।

कोयले और लोहे की प्रचुरता : मशीनों के निर्माण के लिए लोहे की और उन्हें चलाने के लिए ईंधन के रूप में कोयले की आवश्यकता थी। इंग्लैंड में ये दोनों खनिज प्रचुर मात्रा में और एक-दूसरे के निकट उपलब्ध थे, जिसने भारी उद्योगों के विकास को गति दी।

पूँजी की उपलब्धता : किसी भी बड़े उद्योग की स्थापना के लिए भारी निवेश की आवश्यकता होती है। इंग्लैंड के पास अपने व्यापारिक लाभ और उपनिवेशों के शोषण के माध्यम से संचित की गई पर्याप्त पूँजी थी, जिसे उद्यमियों ने नए कारखानों और मशीनों में लगाया।

सस्ते श्रम की उपलब्धता : बाड़ाबंदी के कारण गाँव के छोटे किसान भूमिहीन हो गए थे। वे काम की तलाश में शहरों की ओर पलायन करने लगे। इन विस्थापित किसानों ने कारखानों में बहुत ही कम मजदूरी पर काम करना स्वीकार कर लिया, जिससे उत्पादन लागत कम रही।

विशाल औपनिवेशिक बाज़ार : इंग्लैंड का दुनिया के कई देशों (जैसे भारत) पर अधिकार था। ये उपनिवेश कच्चे माल के स्रोत के रूप में और तैयार माल की खपत के लिए एक विशाल बाज़ार के रूप में कार्य करते थे। इससे उद्योगों को निरंतर उत्पादन की प्रेरणा मिली।

परिवहन और संचार का विकास : रेलवे, पक्की सड़कों और नहरों के निर्माण ने परिवहन को तीव्र और सस्ता बना दिया। इससे कच्चा माल कारखानों तक लाना और तैयार माल को दूर-दराज के बाज़ारों तक पहुँचाना आसान हो गया।

कृषि क्रांति : औद्योगिक क्रांति से पहले ब्रिटेन में कृषि क्रांति हुई थी, जिसके कारण खाद्यान्न की आपूर्ति सुलभ हुई और अतिरिक्त जनसंख्या शहरों में जाकर औद्योगिक कार्यों में संलग्न हो सकी।

अनुकूल राजनीतिक और सामाजिक स्थिति : इंग्लैंड में स्थिर शासन व्यवस्था और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने वाला समाज था। सरकार ने भी उद्योगों के अनुकूल नीतियाँ अपनाईं, जिससे व्यापारिक और औद्योगिक गतिविधियों को प्रोत्साहन मिला।
Q2: औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप होने वाले परिवर्तनों पर प्रकाश डालें ।
उत्तर : औद्योगीकरण के आर्थिक और उत्पादन प्रणाली में परिवर्तन : औद्योगीकरण की प्रक्रिया ने उत्पादन के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी परिवर्तन पेश किया। इसने पारंपरिक कुटीर उद्योगों और हस्तशिल्प व्यवस्था को पूरी तरह से प्रतिस्थापित कर दिया और उनके स्थान पर विशाल फैक्ट्री प्रणाली की स्थापना की। मशीनों के उपयोग से वस्तुओं का उत्पादन बहुत कम समय में और बहुत बड़े पैमाने पर होने लगा। इसके परिणामस्वरूप वैश्विक व्यापार का विस्तार हुआ और पूंजीवाद का उदय हुआ। आर्थिक शक्ति कुछ गिने-चुने पूंजीपतियों के हाथों में केंद्रित हो गई, जिससे समाज में आर्थिक विषमता की खाई गहरी होती चली गई। इस प्रणाली ने न केवल घरेलू अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर नियंत्रण पाने की होड़ भी शुरू कर दी।

सामाजिक संरचना और नए वर्गों का उदय : औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप समाज की संरचना में व्यापक बदलाव आए और समाज स्पष्ट रूप से तीन प्रमुख वर्गों में विभाजित हो गया। पहला पूंजीपति वर्ग, जो उत्पादन के साधनों का स्वामी था। दूसरा बुर्जुआ वर्ग या मध्यम वर्ग, जिसमें डॉक्टर, वकील, शिक्षक और तकनीकी विशेषज्ञ शामिल थे, जिन्होंने आधुनिक समाज के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण श्रमिक वर्ग (सर्वहारा वर्ग) था, जो अपनी आजीविका के लिए पूरी तरह से शारीरिक श्रम पर निर्भर था। इस वर्ग के उदय ने सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों की नींव रखी, क्योंकि उनके अधिकारों और हितों की रक्षा के लिए नए संघर्षों की आवश्यकता महसूस होने लगी।

नगरीकरण और स्लम पद्धति का विकास : औद्योगिक केंद्रों की स्थापना ने नगरीकरण की प्रक्रिया को तेज कर दिया। रोजगार की तलाश में ग्रामीण आबादी का भारी संख्या में शहरों की ओर पलायन हुआ। इसके परिणामस्वरूप मैनचेस्टर, लंकाशायर और भारत में मुंबई जैसे बड़े औद्योगिक शहरों का विकास हुआ। हालांकि, अनियंत्रित नगरीकरण ने आवास की गंभीर समस्या पैदा कर दी, जिससे स्लम पद्धति (गंदी बस्तियों) का जन्म हुआ। इन बस्तियों में मजदूर अमानवीय परिस्थितियों में रहने को मजबूर थे, जहाँ साफ-सफाई, प्रकाश और शुद्ध पेयजल का पूर्ण अभाव था। इन परिस्थितियों ने मजदूरों के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डाला और समाज में स्वास्थ्य संबंधी नई चुनौतियां उत्पन्न कीं।

उपनिवेशवाद और वैश्विक राजनीति पर प्रभाव : औद्योगीकरण ने न केवल आर्थिक और सामाजिक बल्कि राजनीतिक परिवर्तन भी लाए। औद्योगिक देशों को अपने कारखानों के लिए कच्चे माल की निरंतर आपूर्ति और तैयार माल को बेचने के लिए नए बाजारों की आवश्यकता थी। इसी आवश्यकता ने उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद को जन्म दिया। इंग्लैंड, फ्रांस और अन्य यूरोपीय देशों ने एशिया और अफ्रीका के देशों को अपना गुलाम बनाना शुरू किया। भारत जैसे देशों पर इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ा, जहाँ के समृद्ध कुटीर उद्योग मशीनों से बने सस्ते कपड़ों और सामानों की प्रतिस्पर्धा में पूरी तरह नष्ट हो गए। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था का ढांचा चरमरा गया और भारत ब्रिटेन के लिए केवल एक कच्चे माल का निर्यातक बनकर रह गया।
Q3: उपनिवेशवाद से आप क्या समझते हैं ? औद्योगीकरण ने उपनिवेशवाद को जन्म दिया कैसे?
उत्तर : उपनिवेशवाद एक ऐसी राजनैतिक और आर्थिक व्यवस्था है जिसमें एक शक्तिशाली और विकसित राष्ट्र किसी कमजोर या अविकसित राष्ट्र पर अपनी सत्ता स्थापित कर उसका पूर्णतः आर्थिक शोषण करता है। इस प्रक्रिया में शक्तिशाली राष्ट्र, जिसे ‘मातृ देश’ कहा जाता है, अधीनस्थ देश के प्राकृतिक और मानवीय संसाधनों का उपयोग अपनी समृद्धि के लिए करता है। उपनिवेशवाद का मुख्य उद्देश्य राजनीतिक विस्तार के साथ-साथ आर्थिक लाभ कमाना होता है। भारत लंबे समय तक ब्रिटेन का एक उपनिवेश रहा, जहाँ अंग्रेजों ने भारतीय संसाधनों का उपयोग अपनी औद्योगिक प्रगति के लिए किया।

औद्योगीकरण द्वारा उपनिवेशवाद को जन्म देने की प्रक्रिया : औद्योगीकरण ने उपनिवेशवाद की नींव को अत्यंत सुदृढ़ किया क्योंकि 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुई औद्योगिक क्रांति ने उत्पादन के साधनों को पूरी तरह बदल दिया था। मशीनों के आगमन से कारखानों में उत्पादन बड़े पैमाने पर होने लगा, जिससे यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन आए। इस अत्यधिक उत्पादन ने दो प्रमुख समस्याओं को जन्म दिया, जिनके समाधान के लिए उपनिवेशवाद का सहारा लेना अनिवार्य हो गया। पहली समस्या कारखानों के लिए निरंतर कच्चे माल की आपूर्ति सुनिश्चित करना थी और दूसरी समस्या उत्पादित माल को बेचने के लिए सुरक्षित बाजारों की खोज करना थी।

कच्चे माल की आवश्यकता और वैश्विक विस्तार: औद्योगिक क्रांति के दौरान कपड़ा मिलों के लिए कपास, मशीनों के लिए लोहे और अन्य उद्योगों के लिए रबर, नील तथा कोयले जैसे कच्चे माल की भारी मांग उत्पन्न हुई। यूरोपीय देशों में इन संसाधनों की सीमित उपलब्धता के कारण उन्होंने एशिया और अफ्रीका के प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न देशों की ओर रुख किया। इन देशों पर राजनीतिक नियंत्रण स्थापित करना इसलिए आवश्यक हो गया ताकि कच्चे माल को न्यूनतम कीमत पर प्राप्त किया जा सके और आपूर्ति में किसी भी प्रकार की बाधा न आए। इस आर्थिक आवश्यकता ने ही शक्तिशाली राष्ट्रों को दूसरे देशों पर आक्रमण करने और उन्हें अपना गुलाम बनाने के लिए प्रेरित किया।

निर्मित माल के लिए बाजार की खोज और प्रतिस्पर्धा: मशीनों द्वारा निर्मित माल की मात्रा इतनी अधिक थी कि यूरोपीय देशों के स्थानीय बाजार बहुत जल्दी भर गए। लाभ को बनाए रखने और उत्पादन की गति को जारी रखने के लिए नए और बड़े बाजारों की आवश्यकता महसूस की गई। इसके लिए यूरोपीय शक्तियों ने अपने उपनिवेशों को एक संरक्षित बाजार के रूप में इस्तेमाल किया। उन्होंने इन उपनिवेशों के स्वदेशी उद्योगों को नष्ट कर दिया ताकि उनके द्वारा निर्मित सामान की कोई प्रतिस्पर्धा न रहे। इसके साथ ही, इंग्लैंड, फ्रांस, हॉलैंड और पुर्तगाल जैसे देशों के बीच अधिक से अधिक क्षेत्रों को कब्जाने की एक साम्राज्यवादी होड़ शुरू हो गई। इस प्रतिस्पर्धा ने दुनिया भर में उपनिवेशों के जाल को फैला दिया, जिससे औद्योगीकरण और उपनिवेशवाद एक-दूसरे के पूरक बन गए।
Q4: कुटीर उद्योग के महत्व एवं उसकी उपयोगिता पर प्रकाश डालें।
उत्तर : कुटीर उद्योग का अर्थ कुटीर उद्योग से तात्पर्य उन उद्योगों से है जो मुख्य रूप से परिवार के सदस्यों की सहायता से एक छत के नीचे संचालित किए जाते हैं। इन उद्योगों में बहुत ही कम पूंजी निवेश की आवश्यकता होती है और उत्पादन की प्रक्रिया प्रायः स्थानीय कच्चे माल और साधारण औजारों या हस्तशिल्प पर आधारित होती है। भारतीय सामाजिक और आर्थिक परिवेश में कुटीर उद्योग केवल आय का साधन नहीं हैं बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक कौशल को जीवित रखने का एक सशक्त माध्यम भी हैं। महात्मा गांधी के अनुसार भारत की आत्मा गाँवों में बसती है और कुटीर उद्योग ही वह माध्यम हैं जो ग्रामीण भारत को स्वावलंबी और आर्थिक रूप से सुदृढ़ बना सकते हैं।

आर्थिक महत्व एवं रोजगार सृजन : कुटीर उद्योगों का सबसे बड़ा महत्व रोजगार के व्यापक अवसर प्रदान करने में निहित है। भारत जैसे घनी जनसंख्या वाले देश में जहाँ कृषि पर जनसंख्या का अत्यधिक बोझ है वहाँ कुटीर उद्योग एक वैकल्पिक आय का स्रोत बनकर उभरते हैं। ये उद्योग ग्रामीण क्षेत्रों में मौसमी बेरोजगारी और प्रच्छन्न बेरोजगारी की समस्या को हल करने में सहायक होते हैं। इसके साथ ही इन उद्योगों की स्थापना के लिए किसी बड़े बुनियादी ढांचे की आवश्यकता नहीं होती जिसके कारण समाज के निर्धन वर्ग के लोग भी छोटे स्तर पर अपना व्यवसाय शुरू कर सकते हैं। यह धन के समान वितरण में मदद करता है और समाज में व्याप्त आर्थिक असमानता को कम करने का कार्य करता है।

स्थानीय संसाधनों का कुशल उपयोग : कुटीर उद्योग स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कच्चे माल का सर्वोत्तम उपयोग सुनिश्चित करते हैं। उदाहरण के लिए बाँस के काम मिट्टी के बर्तन बनाने का कार्य या हस्तकला के कार्यों में स्थानीय संसाधनों का ही उपयोग किया जाता है। इससे परिवहन की लागत में कमी आती है और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को भी क्षति नहीं पहुँचती है। यह प्रक्रिया संतुलित क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देती है क्योंकि इससे उद्योगों का केंद्रीकरण केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहता बल्कि दूर-दराज के गाँवों तक पहुँच जाता है। इससे शहरों की ओर होने वाले पलायन में भी कमी आती है जिससे नगरीय क्षेत्रों पर जनसंख्या का दबाव कम होता है।

सामाजिक उपयोगिता और महिला सशक्तिकरण : कुटीर उद्योगों की सामाजिक उपयोगिता भी अत्यंत सराहनीय है। यह उद्योग महिलाओं को घर की चारदीवारी के भीतर रहते हुए भी आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाने का अवसर प्रदान करते हैं। पापड़ बनाना अचार तैयार करना सिलाई और कढ़ाई जैसे कार्यों में संलग्न होकर महिलाएँ परिवार की आय में योगदान देती हैं जिससे उनकी सामाजिक स्थिति में सुधार होता है। इसके अतिरिक्त यह उद्योग हमारी पारंपरिक कलाओं और शिल्पों जैसे मधुबनी पेंटिंग या सिल्क की बुनाई को पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित करने का कार्य करते हैं जिससे देश की गौरवशाली सांस्कृतिक पहचान बनी रहती है।

राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और निर्यात में योगदान : राष्ट्रीय स्तर पर कुटीर उद्योग भारतीय निर्यात में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भारतीय हस्तशिल्प और विशिष्ट उत्पादों की विदेशों में भारी मांग रहती है जिससे देश को बहुमूल्य विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है। ये उद्योग बड़े उद्योगों के पूरक के रूप में भी कार्य करते हैं और राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में अपना निरंतर योगदान देते हैं। कम ऊर्जा खपत और कम प्रदूषण फैलाने के कारण इन्हें पर्यावरण के अनुकूल भी माना जाता है जो वर्तमान समय के सतत विकास के लक्ष्यों के अनुरूप है। अतः निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि कुटीर उद्योग भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं और इनका संरक्षण व विकास देश की समग्र प्रगति के लिए अपरिहार्य है।
Q5: औद्योगीकरण ने सिर्फ आर्थिक ढाँचे को ही प्रभावित नहीं किया बल्कि राजनीतिक परिवर्तन का भी मार्ग प्रशस्त किया, कैसे?
उत्तर : औद्योगीकरण एक ऐसी व्यापक प्रक्रिया थी जिसने न केवल उत्पादन के साधनों और आर्थिक गतिविधियों को बदला, बल्कि समाज की राजनीतिक संरचना में भी मौलिक परिवर्तन किए। 18वीं और 19वीं शताब्दी के दौरान जब मशीनों द्वारा बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू हुआ, तो इसने पारंपरिक सामंती व्यवस्था को जड़ से हिला दिया। आर्थिक शक्ति का केंद्र अब कृषि और भूमि से स्थानांतरित होकर उद्योगों और पूँजी की ओर चला गया, जिसके परिणामस्वरूप सत्ता के पुराने समीकरणों का पतन होना अनिवार्य हो गया।

मध्यम वर्ग का उदय और राजनीतिक अधिकार : औद्योगीकरण के सबसे प्रमुख राजनीतिक प्रभावों में से एक मध्यम वर्ग का उदय था। इस वर्ग में कारखानों के मालिक, व्यापारी, बैंकर्स और पेशेवर लोग शामिल थे। आर्थिक रूप से समृद्ध होने के बावजूद, उनके पास वह राजनीतिक शक्ति नहीं थी जो पुराने कुलीन वर्ग के पास थी। अपनी आर्थिक स्थिति को सुरक्षित करने और व्यापारिक हितों की रक्षा के लिए इस वर्ग ने राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग की। इसी संघर्ष ने यूरोप में उदारवाद और लोकतंत्र की नींव रखी। इंग्लैंड में 1832 का सुधार अधिनियम और फ्रांस की विभिन्न क्रांतियाँ इसी मध्यम वर्ग की राजनीतिक आकांक्षाओं का परिणाम थीं, जिन्होंने अंततः निरंकुश राजशाही को सीमित कर संवैधानिक शासन व्यवस्था की शुरुआत की।

श्रमिक वर्ग की चेतना और नए राजनीतिक दर्शन : औद्योगिक क्रांति ने समाज को दो स्पष्ट वर्गों में विभाजित कर दिया – पूँजीपति और श्रमिक वर्ग। शहरों में बड़ी संख्या में श्रमिकों के जमावड़े ने उनमें सामूहिक चेतना विकसित की। खराब कार्य परिस्थितियों, कम वेतन और लंबे कार्य घंटों के कारण श्रमिकों ने अपने अधिकारों के लिए संगठित होना शुरू किया। इससे ट्रेड यूनियन आंदोलनों का जन्म हुआ और राजनीतिक पटल पर समाजवाद तथा साम्यवाद जैसी विचारधाराएँ उभरीं। चार्टिस्ट आंदोलन जैसे संघर्षों ने वयस्क मताधिकार की मांग को मजबूती प्रदान की, जिससे राजनीति केवल उच्च वर्ग तक सीमित न रहकर आम जनता की भागीदारी का क्षेत्र बनने लगी।

उपनिवेशवाद और वैश्विक राजनीतिक प्रभाव : औद्योगीकरण ने राष्ट्रों की विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय राजनीति को भी गहराई से प्रभावित किया। औद्योगिक राष्ट्रों को अपने कारखानों के लिए कच्चे माल और तैयार माल बेचने के लिए नए बाजारों की आवश्यकता थी। इस आर्थिक आवश्यकता ने साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद को जन्म दिया। शक्तिशाली देशों ने एशिया और अफ्रीका के देशों पर अपना राजनीतिक नियंत्रण स्थापित करना शुरू कर दिया ताकि वे अपने आर्थिक हितों की पूर्ति कर सकें। इसने वैश्विक स्तर पर राष्ट्रों के बीच प्रतिस्पर्धा और संघर्ष को बढ़ाया, जिसने भविष्य में विश्व युद्धों की पृष्ठभूमि तैयार की। इस प्रकार, औद्योगीकरण ने आर्थिक परिवर्तन के माध्यम से आधुनिक विश्व की राजनीतिक सीमाओं और विचारधाराओं को एक नया स्वरूप प्रदान किया।
क्रमांक अध्याय
1 यूरोप में राष्ट्रवाद
2 समाजवाद एवं साम्यवाद
3 हिन्द-चीन में राष्ट्रवादी आन्दोलन
4 भारत में राष्ट्रवाद
6 शहरीकरण एवं शहरी जीवन
7 व्यापार और भूमंडलीकरण
8 प्रेस-संस्कृति एवं राष्ट्रवाद

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