Bihar Board 10th Polity Ex-2 Solution and Free PDF

Bihar Board 10th Polity Ex-2 Solution and Free PDF : राजनीति विज्ञान अध्याय 2 'सत्ता में साझेदारी की कार्यप्रणाली' का विस्तृत Solution

क्या आप बिहार बोर्ड कक्षा 10वीं की राजनीति विज्ञान की तैयारी कर रहे हैं? अगर दूसरा अध्याय, ‘सत्ता में साझेदारी की कार्यप्रणाली’, आपको थोड़ा मुश्किल लग रहा है, तो चिंता की कोई बात नहीं है।
हम बिहार बोर्ड कक्षा 10 राजनीति विज्ञान अध्याय 2 ‘सत्ता में साझेदारी की कार्यप्रणाली’ के समाधान को वस्तुनिष्ठ प्रश्नों (Objective Questions) और विषयनिष्ठ प्रश्नों (Subjective Questions) के साथ आसान, स्पष्ट और बिहार बोर्ड के नवीनतम पाठ्यक्रम पर आधारित लेकर आए हैं। यदि आप सभी छात्रों को किसी भी प्रश्न या किसी भी concept को लेकर संदेह है तो उनका सबका उत्तर नीचे दिया गया है।
मैं निकेत कुमार, आपके लिए Bihar Board (BSEB) Class 10 के राजनीति विज्ञान सहित अन्य सभी विषयों के Exercise Solution और Notes सरल, स्पष्ट एवं बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के नवीनतम पाठ्यक्रम पर आधारित आसान भाषा में अपनी वेबसाइट BSEBsolution पर निःशुल्क उपलब्ध कराता हूँ। यदि आप बिहार बोर्ड के छात्र हैं या बिहार बोर्ड के छात्रों को पढ़ाने वाले शिक्षक/शिक्षिका हैं, तो हमारी वेबसाइट को नियमित रूप से विज़िट करते रहें। नीचे आपको बिहार बोर्ड कक्षा 10 राजनीति विज्ञान अध्याय 1 ‘लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी’ के Free Exercise Solution and PDF दिए गया है।
[ NOTE ] : कोई भी छात्र/छात्रा या शिक्षक/शिक्षिका जो हमारे Free Ultimate Notes को देख रहे है। यदि इसके लिए आपके पास कोई सुझवा है, तो बेझिझक Comment में या What’sApp : 8579987011 पर अपना सुझाव दें। आपके सुझावों का हम हमेशा स्वागत करते हैं। Thank You!

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Question)
I. सही विकल्प चुनें ।

Q1: संघ राज्य की विशेषता नहीं है –
[क] लिखित संविधान
[ख] शक्तियों का विभाजन
[ग] इकहरी शासन-व्यवस्था
[घ] सर्वोच्च न्यायपालिका
Q2: संघ सरकार का उदाहरण है –
[क] अमेरिका
[ख] चीन
[ग] ब्रिटेन
[घ] इनमें से कोई नहीं
Q3: भारत में संघ एवं राज्यों के बीच अधिकारों का विभाजन कितनी सूचियों में हुआ है?
[क] संघीय सूची, राज्य सूची
[ख] संघीय सूची, राज्य सूची, समवर्ती सूची

II. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है।

Q1: सत्ता में साझेदारी सही है क्योंकि –
[क] यह विविधता को अपने में समेट लेती है
[ख] देश की एकता को कमजोर करती है
[ग] फैसले लेने में देरी कराती है
[घ] विभिन्न समुदायों के बीच टकराव कम करती है
Q2: संघवाद लोकतंत्र के अनुकूल है, क्योंकि –
[क] संघीय व्यवस्था केन्द्र सरकार की शक्ति को सीमित करती है।
[ख] यह व्यवस्था आपसी सौहार्द, विश्वास को बढ़ाती है और किसी एक की भाषा, संस्कृति या धर्म को दूसरे पर थोपे जाने का भय नहीं रहता।

III. नीचे स्थानीय स्वशासन के पक्ष में कुछ तर्क दिये गये हैं, इन्हें आप वरीयता के क्रम से सजाएँ।

1. सरकार स्थानीय लोगों को शामिल कर अपनी योजनाएँ कम खर्च में पूरी कर सकती है?

2. स्थानीय लोग अपने इलाके की जरूरत, समस्याओं और प्राथमिकताओं को जानते हैं।

3. आम जनता के लिए अपने प्रदेश के अथवा राष्ट्रीय विधायिका के जनप्रतिनिधियों से संपर्क कर पाना मुश्किल होता है।

4. स्थानीय जनता द्वारा बनायी योजना सरकारी अधिकारियों द्वारा बतायी योजना में जयादा स्वीकृत होती है।


उत्तर : उपयुक्त कथनों की वरीयता का क्रम निम्न है:
1. स्थानीय लोग अपने इलाके की जरूरत, समस्याओं और प्राथमिकताओं को जानते हैं।

2. स्थानीय जनता द्वारा बनायी योजना सरकारी अधिकारियों द्वारा बतायी योजना से ज्यादा स्वीकार्य होती है।

3. सरकार स्थानीय लोगों को शामिल कर अपनी योजनाएँ कम खर्च में पूरी कर सकती है।

4. आम जनता के लिए प्रदेश या राष्ट्रीय विधायिका के जनप्रतिनिधियों से संपर्क कर पाना मुश्किल होता है।

बिहार बोर्ड कक्षा 10 राजनीति विज्ञान अध्याय 2 'सत्ता में साझेदारी की कार्यप्रणाली' ।
अति लघु उत्तीय प्रश्न (Very-Short Answer Questions)

Q1: संघ राज्य का अर्थ बताएँ ।
उत्तर : संघ राज्य एक ऐसी शासन व्यवस्था है जिसमें देश की सर्वोच्च सत्ता केंद्र सरकार और उसकी विभिन्न प्रांतीय इकाइयों के बीच स्पष्ट रूप से विभाजित होती है।
Q2: संघीय शासन की दो विशेषताएँ बताएँ ।
उत्तर : संघीय शासन की दो प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—
(1) केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन।
(2) लिखित एवं सर्वोच्च संविधान, जिसके अंतर्गत केंद्र और राज्य दोनों कार्य करते हैं।

बिहार बोर्ड कक्षा 10 राजनीति विज्ञान अध्याय 2 'सत्ता में साझेदारी की कार्यप्रणाली' ।
लघु उत्तरीय प्रश्न (Short & Answer Question)

Q1: सत्ता की साझेदारी से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर : सत्ता की साझेदारी का अर्थ है सरकार के विभिन्न अंगों और स्तरों के बीच शक्ति का न्यायपूर्ण विभाजन करना है। यह लोकतंत्र का एक अनिवार्य सिद्धांत है जिसमें समाज के विभिन्न वर्गों और समूहों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल किया जाता है। सत्ता की साझेदारी से सामाजिक संघर्षों की संभावना कम होती है और राजनीतिक व्यवस्था में स्थिरता बनी रहती है। यह शासन की कार्यकुशलता को बढ़ाकर लोकतांत्रिक मूल्यों को सुदृढ़ करता है और अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा सुनिश्चित करता है।
Q2: सत्ता की साझेदारी लोकतंत्र में क्या महत्त्व रखती है ?
उत्तर : सत्ता की साझेदारी लोकतंत्र की मूल आत्मा है, जो समाज के विभिन्न समूहों के बीच होने वाले सामाजिक टकराव और संघर्ष की संभावना को कम करती है। यह न केवल राजनीतिक व्यवस्था को स्थिरता प्रदान करती है, बल्कि शासन की प्रक्रिया में नागरिकों की सक्रिय भागीदारी भी सुनिश्चित करती है। लोकतंत्र में शक्ति का वितरण इस सिद्धांत पर आधारित है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में उन सभी वर्गों का प्रभाव हो जो शासन व्यवस्था से प्रभावित होते हैं, जिससे एक समावेशी और न्यायसंगत समाज की स्थापना होती है।
Q3: सत्ता की साझेदारी के अलग-अलग तरीके क्या है ?
उत्तर : लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी के मुख्य रूप से चार तरीके होते हैं। पहला, शासन के विभिन्न अंगों जैसे विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच सत्ता का क्षैतिज वितरण होता है। दूसरा, सरकार के विभिन्न स्तरों जैसे केंद्र, राज्य और स्थानीय सरकारों के बीच सत्ता का ऊर्ध्वाधर विभाजन किया जाता है। इसके अतिरिक्त, सत्ता का बँटवारा विभिन्न सामाजिक समूहों, जैसे धार्मिक और भाषाई समूहों के बीच भी होता है। अंत में, राजनीतिक दलों, दबाव समूहों और आंदोलनों के माध्यम से भी सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित की जाती है ताकि सत्ता किसी एक हाथ में केंद्रित न रहे।

बिहार बोर्ड कक्षा 10 राजनीति विज्ञान अध्याय 2 'सत्ता में साझेदारी की कार्यप्रणाली' ।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long-Answer Questions)

Q1: राजनैतिक दल किस तरह से सत्ता में साझेदारी करते हैं ?
उत्तर : लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी का सबसे जीवंत और प्रत्यक्ष रूप राजनैतिक दलों के माध्यम से ही दिखाई देता है। राजनैतिक दल सत्ता के बंटवारे के प्रमुख माध्यम हैं क्योंकि वे जनता की इच्छाओं को संगठित करते हैं और उन्हें सरकार के गलियारों तक पहुँचाते हैं। लोकतंत्र में विभिन्न राजनैतिक दल सत्ता प्राप्त करने के लिए आपस में प्रतिस्पर्धा करते हैं। यह प्रतिस्पर्धा इस बात को सुनिश्चित करती है कि सत्ता किसी एक व्यक्ति या समूह के हाथ में न रहे, बल्कि वह बारी-बारी से अलग-अलग विचारधाराओं और सामाजिक समूहों का प्रतिनिधित्व करने वाले दलों के पास जाती रहे।

चुनाव और प्रत्यक्ष साझेदारी : राजनैतिक दल चुनाव के माध्यम से सत्ता में सीधे तौर पर साझेदारी करते हैं। चुनाव के दौरान विभिन्न दल अपने उम्मीदवारों को मैदान में उतारते हैं और अपनी नीतियों एवं कार्यक्रमों को जनता के सामने रखते हैं। जिस दल को बहुमत प्राप्त होता है, वह सरकार बनाता है और शासन की बागडोर संभालता है। इस प्रकार, राजनैतिक दल सत्ता का प्रत्यक्ष उपयोग करते हैं। जब कोई दल सत्ता में होता है, तो वह समाज के विभिन्न वर्गों की आकांक्षाओं को नीतियों में बदलने का प्रयास करता है, जिससे सत्ता में विभिन्न हितों की भागीदारी सुनिश्चित होती है।

गठबंधन सरकारों के माध्यम से साझेदारी : आज के युग में गठबंधन सरकारें (Coalition Governments) सत्ता में साझेदारी का एक उत्कृष्ट उदाहरण हैं। जब किसी एक राजनैतिक दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं होता है, तब दो या दो से अधिक दल मिलकर सरकार बनाते हैं। इस प्रक्रिया में सत्ता का बंटवारा विभिन्न दलों के बीच उनकी विचारधारा और प्रभाव के आधार पर होता है। गठबंधन में शामिल प्रत्येक दल की अपनी अलग सामाजिक पृष्ठभूमि और नीतियां होती हैं, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि सरकार में एक विस्तृत दृष्टिकोण बना रहे और किसी एक दल का एकाधिकार न हो। साझा न्यूनतम कार्यक्रम के माध्यम से ये दल सामूहिक रूप से निर्णय लेते हैं और शासन का संचालन करते हैं।

दबाव समूहों और सामाजिक हितों का प्रतिनिधित्व : राजनैतिक दल केवल सरकार बनाकर ही सत्ता में साझेदारी नहीं करते, बल्कि वे समाज के विभिन्न दबाव समूहों और हितों के बीच एक कड़ी का कार्य करते हैं। कई बार राजनैतिक दल किसी विशेष सामाजिक समूह जैसे किसान, मजदूर, व्यापारी या छात्रों के हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये समूह अपनी मांगों को राजनैतिक दलों के माध्यम से उठाते हैं, जिससे सरकारी निर्णयों और नीतियों में इन समूहों की अप्रत्यक्ष भागीदारी संभव हो पाती है। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था को अधिक समावेशी बनाता है क्योंकि इसके माध्यम से सत्ता में हाशिए पर खड़े समूहों की आवाज भी पहुँचती है।

विपक्ष के रूप में : सत्ता में साझेदारी केवल सरकार में शामिल होकर ही नहीं की जाती, बल्कि विपक्ष (Opposition) के रूप में भी राजनैतिक दल सत्ता के प्रयोग को प्रभावित करते हैं। जो दल चुनाव हार जाते हैं, वे सदन में सशक्त विपक्ष की भूमिका निभाते हैं। वे सरकार की गलत नीतियों की आलोचना करते हैं, जनहित के मुद्दों को उठाते हैं और सरकार को जवाबदेह बनाए रखते हैं। इस प्रकार, विपक्ष सत्ता पर नियंत्रण रखने के साथ-साथ नीतियों के निर्माण में रचनात्मक हस्तक्षेप करता है।
Q2: गठबंधन की सरकारों में सत्ता में साझेदारी कौन-कौन होते हैं ?
उत्तर : लोकतंत्र में जब किसी एक राजनीतिक दल को चुनाव में स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं होता है, तब दो या दो से अधिक राजनीतिक दल मिलकर सरकार का गठन करते हैं, जिसे गठबंधन सरकार कहा जाता है। इस व्यवस्था में सत्ता की साझेदारी का रूप अत्यंत व्यापक और विविधतापूर्ण होता है। इसमें मुख्य रूप से विभिन्न राजनीतिक दल, उनकी विचारधाराएँ और विभिन्न सामाजिक एवं क्षेत्रीय समूह प्रमुख भागीदार होते हैं। सत्ता की यह साझेदारी केवल मंत्री पदों के बँटवारे तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह देश के नीति-निर्माण और महत्वपूर्ण निर्णय लेने की प्रक्रिया में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। गठबंधन में शामिल प्रत्येक दल अपनी विशिष्ट पहचान और अपने जनाधार के साथ शासन का हिस्सा बनता है, जिससे शासन व्यवस्था में अधिक समावेशिता आती है।

विभिन्न राजनीतिक दलों और विचारधाराओं का मेल : गठबंधन सरकार में सत्ता के सबसे प्रमुख भागीदार वे राजनीतिक दल होते हैं जो एक साझा उद्देश्य या सत्ता प्राप्ति के लिए एक साथ आते हैं। ये दल अक्सर अलग-अलग और कभी-कभी विपरीत विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। सत्ता की साझेदारी के माध्यम से ये दल अपनी वैचारिक भिन्नताओं के बावजूद देश के विकास के लिए एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम (Common Minimum Programme) तैयार करते हैं। इस प्रक्रिया में सत्ता का केंद्र किसी एक दल के पास न होकर कई दलों में विभाजित रहता है। इससे किसी भी एक दल की तानाशाही या मनमानी पर अंकुश लगता है और सरकार में सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित होती है, क्योंकि सरकार का अस्तित्व सभी साझेदार दलों के समर्थन पर टिका होता है।

क्षेत्रीय और सामाजिक समूहों का प्रतिनिधित्व : भारतीय लोकतंत्र के संदर्भ में गठबंधन सरकारों में क्षेत्रीय दलों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। ये दल विशिष्ट राज्यों या भौगोलिक क्षेत्रों की स्थानीय समस्याओं, संस्कृति और आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। जब ये क्षेत्रीय दल केंद्र स्तर पर या बड़े गठबंधन का हिस्सा बनते हैं, तो सत्ता में उन विशिष्ट क्षेत्रों और सामाजिक समूहों की सीधी भागीदारी सुनिश्चित होती है जिन्हें अक्सर मुख्यधारा की राजनीति में पर्याप्त स्थान नहीं मिल पाता। इससे सत्ता का स्वरूप अधिक लोकतांत्रिक और विकेंद्रीकृत हो जाता है। विभिन्न जातियों, धर्मों और भाषाई समूहों के हितों को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय नीतियाँ बनाई जाती हैं, जिससे देश की एकता और अखंडता को मजबूती मिलती है और सामाजिक असंतोष की संभावना कम हो जाती है।

निर्णय प्रक्रिया में साझेदारी और संतुलन : गठबंधन की राजनीति में सत्ता की साझेदारी का एक अन्य अनिवार्य पहलू निर्णय लेने की शक्ति का संतुलित बँटवारा है। गठबंधन सरकार को सुचारू रूप से चलाने के लिए प्रायः एक समन्वय समिति का गठन किया जाता है, जिसमें सभी घटक दलों के प्रमुख नेता शामिल होते हैं। कोई भी बड़ा नीतिगत बदलाव या देशहित से जुड़ा निर्णय लेने से पहले सभी सहयोगियों के बीच आपसी सहमति बनाई जाती है। यह व्यवस्था शासन में नियंत्रण और संतुलन (Checks and Balances) का कार्य करती है। यद्यपि इसमें निर्णय लेने की गति कभी-कभी धीमी हो सकती है, लेकिन यह सुनिश्चित करता है कि सरकार का प्रत्येक कदम व्यापक विचार-विमर्श पर आधारित हो और समाज के विभिन्न वर्गों के हितों की रक्षा करता हो। इस प्रकार, गठबंधन सरकार में सत्ता की साझेदारी विविधतापूर्ण समाज में शासन को अधिक उत्तरदायी और प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाती है।
Q3: दबाव समूह किस तरह से सरकार को प्रभावित कर सत्ता में साझेदार बनते हैं ?
उत्तर : दबाव समूहों की अवधारणा और स्वरूप : दबाव समूह ऐसे व्यक्तियों का संगठित समूह होते हैं जिनके सामान्य हित और उद्देश्य एक समान होते हैं। ये समूह प्रत्यक्ष रूप से चुनाव लड़कर राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने या सरकार में शामिल होने का प्रयास नहीं करते हैं, बल्कि वे सरकारी नीतियों और निर्णयों को अपने सदस्यों के हितों में प्रभावित करने का प्रयास करते हैं। लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में, विशेष रूप से बिहार बोर्ड के पाठ्यक्रम के अनुसार, दबाव समूह सत्ता की साझेदारी का एक अप्रत्यक्ष लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण माध्यम माने जाते हैं। ये समूह विभिन्न व्यवसायों, धर्मों, जातियों या विशेष सामाजिक हितों के आधार पर गठित होते हैं, जैसे कि भारतीय किसान यूनियन, छात्र संगठन या विभिन्न श्रमिक संघ। ये संगठन समाज के विशिष्ट वर्गों की आवाज़ को शासन के उच्च स्तर तक पहुँचाने का कार्य करते हैं।

दबाव समूहों द्वारा सरकार को प्रभावित करने की कार्यविधि : दबाव समूह कई रणनीतिक तरीकों से सरकार पर दबाव बनाकर उसे अपनी मांगों को मानने के लिए विवश करते हैं। वे मुख्य रूप से लोकतांत्रिक प्रदर्शनों, हड़तालों, धरना प्रदर्शनों और घेराव जैसे माध्यमों का सहारा लेते हैं ताकि वे जनता और सरकार का ध्यान अपनी विशेष समस्याओं की ओर खींच सकें। इसके अतिरिक्त, ये समूह सूचना के प्रसार और मीडिया का व्यापक उपयोग करते हैं ताकि जनमत को अपने पक्ष में तैयार किया जा सके। जब जनमत किसी विशेष मुद्दे पर दबाव समूहों के समर्थन में लामबंद होता है, तो सरकार को अपनी नीतियों में संशोधन करना पड़ता है या नई नीतियां बनानी पड़ती हैं। यह प्रक्रिया दर्शाती है कि शासन के निर्णयों में इन समूहों का कितना गहरा प्रभाव होता है, जो अंततः उन्हें सत्ता का एक अदृश्य साझेदार बना देता है।

नीति निर्धारण में अप्रत्यक्ष साझेदारी और परामर्श दबाव समूह अक्सर विभिन्न सरकारी सलाहकार समितियों और नीति-निर्धारक निकायों में प्रतिनिधि के रूप में अपनी जगह सुनिश्चित करते हैं। वे नीति-निर्माताओं और नौकरशाहों को विशिष्ट तकनीकी जानकारी, आंकड़े और विशेषज्ञों की राय प्रदान करते हैं, जिससे कानून बनाने की प्रक्रिया प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होती है। उदाहरण के तौर पर, जब सरकार किसी औद्योगिक नीति या श्रम कानून पर विचार करती है, तो वह संबंधित व्यापारिक संगठनों या मजदूर संघों के प्रतिनिधियों से विचार-विमर्श करती है। इस प्रकार, ये समूह सीधे चुनाव जीते बिना भी शासन की निर्णय लेने वाली महत्वपूर्ण प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा बन जाते हैं, जिसे अप्रत्यक्ष सत्ता की साझेदारी के रूप में परिभाषित किया जाता है।

राजनीतिक दलों के साथ संबंध और हितों का संतुलन : दबाव समूहों का राजनीतिक दलों के साथ अत्यंत जटिल और गहरा संबंध होता है। कई बार ये समूह किसी विशेष राजनीतिक दल को वित्तीय सहायता या संगठित वोट बैंक का समर्थन प्रदान करते हैं, जिसके बदले में वे चुनाव के दौरान उस दल के चुनावी घोषणापत्र (Manifesto) को अपने पक्ष में प्रभावित करते हैं। राजनीतिक दल भी समाज के इन प्रभावशाली वर्गों की नाराजगी मोल लेना नहीं चाहते। लोकतंत्र में यह प्रक्रिया सत्ता के संतुलन में मदद करती है क्योंकि विभिन्न विरोधी हितों वाले दबाव समूह एक-दूसरे के प्रभाव को संतुलित करते हैं। यदि एक समूह सरकार पर अनुचित दबाव डालता है, तो दूसरा समूह उसके विरोध में उठ खड़ा होता है, जिससे सरकार को किसी एक वर्ग के पक्ष में झुकने के बजाय मध्य मार्ग अपनाने और सामूहिक हित में निर्णय लेने की प्रेरणा मिलती है।

Bihar Board 10th Polity Ex-2 Solution and Free PDF कैसे Download करें।

नीचे आप सभी को बिहार बोर्ड कक्षा 10 राजनीति विज्ञान अध्याय 2 ‘सत्ता में साझेदारी की कार्यप्रणाली’ के सभी प्रश्नों का PDF link दिया जा रहा है। जिसे आप सभी छात्र बिल्कुल मुफ्त में Download कर सकते हैं।
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क्रमांक अध्याय
1 लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी
3 लोकतंत्र में प्रतिस्पर्धा एवं संघर्ष
4 लोकतंत्र की उपलब्धियाँ
5 लोकतंत्र की चुनौतियाँ

Bihar Board Class 10 के हमारे Exercise Solution कैसे तैयार किए गए हैं?

सारांश :

हम आशा करते हैं कि हमारे द्वारा तैयार किए गए Bihar Board 10th Polity Ex-2 Solution and Free PDF की यह सामग्री आपकी परीक्षा तैयारी में अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी।

इस Exercise-2 के सभी प्रश्नों के समाधान को सरल भाषा, सटीक व्याख्या, महत्वपूर्ण बिंदुओं और परीक्षा-उपयोगी तथ्यों के साथ प्रस्तुत किया गया है, ताकि विद्यार्थी हर प्रश्न को आसानी से समझ सकें और बोर्ड परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन कर सकें।

यदि पढ़ाई के दौरान आपके मन में किसी भी प्रकार का doubt या confusion उत्पन्न होता है, तो BSEBsolution.in पर उपलब्ध अध्यायवार समाधान, प्रश्न-उत्तर और व्याख्या आपके सभी संदेहों को दूर करने में मदद करेंगे।
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