BSEB 10th Hindi Godhuli Exercise-4 Solution

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BSEB 10th Hindi Godhuli Exercise-4 Solution "नाखून क्यों बढ़ते हैं" with Notes

इस पोस्ट में हम बिहार बोर्ड कक्षा 10 हिंदी की पुस्तक “गोधूली” के चौथे अध्याय “नाखून क्यों बढ़ते हैं” के कहानी का सारांश, कवि परिचय, सभी प्रश्नों के समाधान, महत्त्वपूर्ण एवं संभावित प्रश्न और वस्तुनिष्ठ प्रश्नों ( Objective Questions) को विस्तार से देखने वाले हैं।
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"नाखून क्यों बढ़ते हैं" की मुख्य बातें

यह कहानी एक सरल प्रश्न — “नाखून क्यों बढ़ते हैं?” — से शुरू होकर मानव सभ्यता, इतिहास और स्वभाव की गहराई तक पहुँचता है। लेखक बताते हैं कि आदिम मनुष्य के लिए नाखून अस्त्र थे। जीवन रक्षा और संघर्ष के समय वे दाँतों के बाद सबसे बड़ा हथियार थे। समय के साथ मनुष्य ने पत्थर, हड्डी, फिर लोहे और अंततः आधुनिक विनाशकारी अस्त्र बना लिए, लेकिन प्रकृति ने नाखून बढ़ाने की शक्ति नहीं छीनी। यह इस बात का संकेत है कि मनुष्य के भीतर आज भी उसकी पशु प्रवृत्तियों के अवशेष मौजूद हैं। नाखून काटना सभ्यता-संस्कृति और सौंदर्यबोध का प्रतीक है, जबकि उनका बढ़ना आदिम प्रवृत्ति का। लेखक बताते हैं कि ये सहजात वृत्तियाँ केवल शरीर की नहीं, बल्कि मन की स्मृतियों का परिणाम हैं। बाल, दाँत, पलक या नाखून—ये सब हमें हमारे विकासक्रम का ज्ञान कराते हैं। नाखून केवल जैविक नहीं, मनुष्य की बर्बरता और संघर्ष चेतना के प्रतीक हैं, जो कटने के बाद भी लौट आती है।

लेखक बताते हैं कि सभ्यता का विकास केवल बाह्य साधनों या हथियारों के विस्तार से नहीं, बल्कि आत्म-संयम और मानवीय मूल्यों से मापा जाना चाहिए। ‘स्वाधीनता’ शब्द का उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि भारत ने ‘इंडिपेंडेंस’ की जगह ‘स्व’ को केंद्र में रखकर स्वतंत्रता की अवधारणा गढ़ी, जो आत्म-नियंत्रण का भाव है। मनुष्य की असली पहचान संयम, करुणा, त्याग, सत्य और अहिंसा में है। हथियारों, बमों और आधुनिक हिंसा को लेखक बढ़ते नाखूनों से जोड़ते हैं और संकेत देते हैं कि यह पशुता का नया रूप है। वे मानते हैं कि नाखून काटना केवल शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि मनुष्यता की घोषणा है—यह बताता है कि हम पशुत्व को स्वीकार नहीं करते। लेखक का निष्कर्ष है कि सफलता अधिक हथियारों या साधनों से नहीं, बल्कि प्रेम, मैत्री, सह-अस्तित्व और आत्म-बंधन से मिलती है। नाखून बढ़ना हमारी अंध सहजात वृत्ति का प्रतीक है और उन्हें काटना मनुष्य के चरित्र, चेतना और सांस्कृतिक उत्कर्ष का संकेत।

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हजारी प्रसाद द्विवेदी का संक्षिप्त परिचय

अध्याय – 4 नाखून क्यों बढ़ते हैं
पूरा नाम आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
जन्म 19 अगस्त 1907 ई०
जन्म स्थान आरत दुबे का छपरा, बलिया (उत्तर प्रदेश)
मृत्यु 19 मई 1979 ई०, दिल्ली
शिक्षा संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, बाँग्ला, संस्कृति, इतिहास व दर्शन का गहन अध्ययन
भूमिका / कार्यक्षेत्र निबंधकार, उपन्यासकार, आलोचक, इतिहासकार, संस्कृतज्ञ, शिक्षाविद्
प्रमुख रचनाएँ अशोक के फूल, कल्पलता, कुटज, विचार और वितर्क, पुनर्नवा, बाणभट्ट की आत्मकथा, अनामदास का पोथा, सूर साहित्य, कबीर, कालिदास की लालित्य योजना आदि
सम्मान साहित्य अकादमी पुरस्कार (आलोक पर्व), पद्मभूषण, डी०लिट्० की उपाधि

बोध और अभ्यास प्रश्न

पाठ के साथ

Q1: नाखून क्यों बढ़ते हैं ? यह प्रश्न लेखक के आगे कैसे उपस्थित हुआ ?
उत्तर : लेखक के अनुसार “नाखून क्यों बढ़ते हैं?” यह प्रश्न उन्हें स्वयं सोचकर नहीं आया था, बल्कि उनकी छोटी बेटी ने एक दिन अचानक उनसे यह सवाल पूछ लिया। बच्ची के इस सरल किन्तु उलझाने वाले प्रश्न ने लेखक को असमंजस में डाल दिया, क्योंकि वे तुरंत इसका संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाए।
Q2: बढ़ते नाखूनों द्वारा प्रकृति मनुष्य को क्या याद दिलाती है ?
उत्तर : प्राचीन काल में मनुष्य जंगली और वनमानुष जैसा था। उस समय वह अपनी रक्षा के लिए मुख्य रूप से नाखूनों का ही उपयोग करता था। दाँत होते हुए भी नख ही उसके प्रमुख अस्त्र माने जाते थे। प्रतिद्वंद्वियों से जूझने में नाखून उसके लिए अत्यंत आवश्यक अंग थे। समय के साथ उसने पत्थर, लकड़ी, हड्डी और फिर लोहे के हथियार बनाए, जो आगे चलकर बंदूक, तोप, कारतूस, बम और एटम बम में बदल गए।
आज मनुष्य अत्याधुनिक हथियारों पर निर्भर हो चुका है, फिर भी उसके नाखून बढ़ते रहते हैं। यह प्रकृति की ओर से यह संकेत है कि मनुष्य अपनी आदिम प्रवृत्ति और मूल स्वभाव से पूरी तरह मुक्त नहीं हुआ है। नाखूनों का बढ़ना मनुष्य को यह याद दिलाता है कि उसके भीतर पुरानी पशुता अब भी कहीं न कहीं जीवित है। वह आज भी वही नख-दंत वाला प्राणी है, जिसके अवशेष उसके शरीर में बचे हुए हैं।
Q3: लेखक द्वारा नाखूनों को अस्त्र के रूप देखना कहाँ तक संगत है ?
उत्तर : लाख वर्ष पूर्व जब मनुष्य जंगली अवस्था में था, तब नाखून उसके लिए प्रमुख अस्त्र थे। वह वनमानुष की तरह जीवन व्यतीत करता था और आत्मरक्षा तथा शिकार के लिए नख ही उसका स्वाभाविक हथियार थे। दाँत होते हुए भी नाखूनों की उपयोगिता अधिक थी, इसलिए प्रतिद्वंद्वियों को पछाड़ने में वे अत्यंत सहायक सिद्ध होते थे। उस समय नाखूनों को अस्त्र मानना पूर्णतः तर्कसंगत था।
परंतु सभ्यता और विज्ञान के विकास के साथ समय बदल गया। मनुष्य ने पत्थर, लकड़ी, हड्डी, लोहा और आधुनिक तकनीक से हथियार बनाए, जिनमें बंदूक, बम, कारतूस और तोप जैसे अस्त्र शामिल हैं। परिणामस्वरूप आज नाखून आत्मरक्षा का साधन नहीं रहे। आधुनिक युग में नख को अस्त्र कहना व्यवहारतः उचित नहीं लगता, लेकिन ऐतिहासिक और जैविक दृष्टि से यह विचार पूर्णतः संगत है, क्योंकि यह मनुष्य की आदिम सहजात प्रवृत्तियों का प्रतीक है।
Q4: मनुष्य बार-बार नाखूनों को क्यों काटता है ?
उत्तर : मनुष्य निरंतर सभ्यता और संस्कृति की ओर बढ़ता रहा है। प्रारंभिक काल में वह पशुओं के समान जीवन जीता था और नाखून उसके लिए अस्त्र का कार्य करते थे। परंतु समय के साथ उसके आहार-विहार, अस्त्र-शस्त्र और रहन-सहन में बदलाव आया। जैसे-जैसे मानवीय विकास आगे बढ़ा, उसने आदिम जीवन-शैली को त्याग दिया और स्वयं को अधिक सुसंस्कृत रूप में ढालना शुरू किया। अब नाखून आत्मरक्षा का साधन नहीं, बल्कि स्वच्छता और सौंदर्य का प्रतीक माने जाते हैं। मनुष्य बार-बार नाखून इसलिए काटता है कि वह अपने भीतर के पशुवत् अतीत को पीछे छोड़कर स्वयं को सभ्य, सुसज्जित और सुंदर दिखा सके। बढ़े हुए नाखून अब असभ्यता माने जाते हैं, इसलिए उन्हें काटकर मनुष्य अपने सांस्कृतिक विकास और सौंदर्यबोध को प्रकट करता है।
Q5: सुकुमार विनोदों के लिए नाखून को उपयोग में लाना मनुष्य ने कैसे शुरू किया ? लेखक ने इस संबंध में क्या बताया है ?
उत्तर : लेखक के अनुसार जब मानव धीरे-धीरे पशुता से ऊपर उठकर सभ्यता की ओर बढ़ने लगा, तब नाखूनों को काटने और सँवारने की प्रवृत्ति उत्पन्न हुई। प्रारंभ में नाखून आत्मरक्षा का अस्त्र थे, लेकिन सभ्य होते ही मनुष्य ने इन्हें सौंदर्य और मनोरंजन का साधन बना लिया। लेखक बताता है कि वात्स्यायन के ‘कामसूत्र’ से यह प्रमाण मिलता है कि भारत में लगभग दो हजार वर्ष पूर्व नाखूनों को सजाने-सँवारने की परिपाटी विकसित हो चुकी थी। नाखून काटना केवल स्वच्छता का कार्य नहीं था, बल्कि एक मनोरंजक कला माना जाता था। त्रिकोण, दंतुल, चंद्राकार, वर्तुलाकार आदि कई प्रकार की आकृतियों में नाखूनों को सजाया जाता था। उस समय के विलासी नागरिक इन्हें अपनी रुचि के अनुसार बढ़ाते या कलात्मक ढंग से काटते थे।
लेखक यह भी स्पष्ट करता है कि यद्यपि यह प्रवृत्ति कभी-कभी अधोगामी या विलासी प्रतीत होती है, लेकिन भारतीय संस्कृति ने ऐसी सब प्रवृत्तियों को मानवीय और सांस्कृतिक रूप देकर उन्हें एक मर्यादा प्रदान की है।
Q6: नख बढ़ाना और उन्हें काटना कैसे मनुष्य की सहजात वृत्तियाँ हैं ? इनका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर : मनुष्य के शरीर में अनेक सहजात (जन्मजात) वृत्तियाँ अंतर्निहित होती हैं, जो दीर्घकालीन अनुभव और अनजानी स्मृतियों से विकसित हुई हैं। नाखून का बढ़ना भी ऐसी ही सहज और अनायास क्रिया है, जो मनुष्य के भीतर अब भी विद्यमान आदिम पशुत्व की स्मृति को संजोए हुए है। यह वृद्धि दर्शाती है कि मनुष्य कभी नख-दंत पर आश्रित जीव था। इसके विपरीत, नाखूनों को बार-बार काटने की प्रवृत्ति उसकी सभ्यता, सौंदर्यबोध और सांस्कृतिक चेतना की प्रतीक है। मनुष्य अपने भीतर उपस्थित पशुत्व को स्वीकार तो करता है, पर उसे बढ़ावा नहीं देना चाहता। इसलिए नाखून बढ़ना उसकी प्राचीन प्रवृत्ति का संकेत है, जबकि उन्हें काटना उसके विकसित और संस्कारित व्यक्तित्व का प्रमाण है।
Q7: लेखक क्यों पूछता है कि मनुष्य किस ओर बढ़ रहा है, पशुता की ओर या मनुष्यता की ओर ? स्पष्ट करें ।
उत्तर : लेखक यह प्रश्न इसलिए उठाता है कि आधुनिक मानव के व्यवहार और प्रवृत्तियों में विरोधाभास दिखाई देता है। एक ओर वह विज्ञान, संस्कृति, कला और मानवता की ओर बढ़ता प्रतीत होता है, तो दूसरी ओर वह हथियारों, युद्ध और विनाशकारी साधनों की ओर भी तेजी से अग्रसर है। लेखक के मन में यही द्वंद्व है कि क्या यह विकास वास्तव में मनुष्यता को आगे बढ़ा रहा है या फिर मनुष्य को पशु प्रवृत्तियों की ओर ढकेल रहा है। बंदूक, बम और महाविनाशक हथियारों के निर्माण और संचय की प्रवृत्ति यह संकेत देती है कि मनुष्य फिर से उसी संघर्षमय पशुता की ओर लौट रहा है, जहाँ विनाश और प्रतिद्वंद्विता ही प्रमुख थीं। इसलिए लेखक यह प्रश्न करता है ताकि पाठक सोचें कि आधुनिकता के नाम पर मनुष्य कहीं अपनी मूल मानवीयता को खोकर फिर आदिम क्रूरता की ओर तो नहीं जा रहा।
Q8: देश की आजादी के लिए प्रयुक्त किन शब्दों की अर्थ मीमांसा लेखक करता है और लेखक के निष्कर्ष क्या है ?
उत्तर : लेखक देश की स्वतंत्रता के संदर्भ में ‘इंडिपेन्डेन्स’ शब्द की अर्थमीमांसा करते हुए बताते हैं कि इसका सामान्य अर्थ है––किसी की अधीनता का अभाव या पराधीनता से मुक्ति। किंतु हिंदी का शब्द ‘स्वाधीनता’ इससे भिन्न और अधिक सार्थक है। ‘स्वाधीनता’ का अर्थ है––अपने ही अधीन रहना, यानी आत्मनियंत्रित और आत्मनिर्धारित होना। लेखक के अनुसार यदि अंग्रेजी में इसे व्यक्त करना हो तो ‘सेल्फ-डिपेन्डेन्स’ कहना अधिक उपयुक्त होगा। उनका निष्कर्ष है कि स्वाधीनता केवल बाहरी बंधन-मुक्ति नहीं, बल्कि आत्मसंयम और आत्मबोध से उपजी वह स्थिति है जो मनुष्य को चरितार्थता की ओर ले जाती है। असली स्वतंत्रता प्रेम, त्याग और सबके कल्याण के लिए स्वयं को अर्पित करने की मानवीय भावना में निहित है।
Q9: लेखक ने किस प्रसंग में कहा है कि बंदरिया मनुष्य का आदर्श नहीं बन सकती ? लेखक का अभिप्राय स्पष्ट करें ।
उत्तर : लेखक यह बात उस प्रसंग में कहते हैं जब वह पुरानेपन के अंधानुकरण और बदलाव के विरोध की प्रवृत्ति पर प्रश्न उठाते हैं। वे बताते हैं कि केवल इसलिए किसी बात को पकड़े रहना उचित नहीं कि वह प्राचीन है। इसी संदर्भ में वे उदाहरण देते हैं कि जैसे बंदरिया अपने बच्चे को हर समय पेट से चिपकाए रखती है, वैसे ही मनुष्य यदि पुरानी परंपराओं और विचारों से बिना विचार किए चिपका रहेगा तो वह प्रगति नहीं कर सकेगा। इसलिए बंदरिया का व्यवहार मनुष्य का आदर्श नहीं बन सकता।
लेखक का अभिप्राय यह है कि सब पुराने विचार या परंपराएँ सार्थक नहीं होतीं और न ही सब नया बुरा होता है। समझदार व्यक्ति वही होता है जो पुराने और नए दोनों की परख करके जो हितकारी हो उसे अपनाए और जो अनुपयोगी हो उसे त्याग दे। अंधानुकरण या जड़ता को मनुष्यत्व के विकास में स्थान नहीं मिलना चाहिए।
Q10: ‘स्वाधीनता’ शब्द की सार्थकता लेखक क्या बताता है ?
उत्तर : लेखक के अनुसार ‘स्वाधीनता’ शब्द की सार्थकता इसमें निहित है कि इसका अर्थ केवल बाहरी आज़ादी नहीं, बल्कि अपने ही अधीन रहना है। ‘स्व’ का बंधन यह दर्शाता है कि असली स्वतंत्रता आत्मसंयम, आत्मनियंत्रण और आत्मबोध से प्राप्त होती है। यह व्यक्ति को अपने भीतर के नियमों और आदर्शों के प्रति जिम्मेदार बनाती है। लेखक यह भी बताते हैं कि भारतीय परंपरा में यह भावना समय-समय पर अनजाने में भाषा और व्यवहार के माध्यम से व्यक्त होती रही है। इसलिए स्वाधीनता केवल बाह्य स्वतंत्रता का प्रतीक नहीं, बल्कि आत्मनियंत्रित, विवेकी और नैतिक जीवन जीने की क्षमता का परिचायक है।
Q11: निबंध में लेखक ने किस बूढ़े का जिक्र किया है ? लेखक की दृष्टि में बूढ़े के कथनों की सार्थकता क्या है ?
उत्तर : लेखक ने निबंध में एक ऐसे बूढ़े का जिक्र किया है जिसने अपने पूरे जीवन का अनुभव संक्षेप में व्यक्त करते हुए मनुष्य को सही मार्ग दिखाने का प्रयत्न किया। बूढ़ा कहता है कि बाहर नहीं, भीतर की ओर देखो; हिंसा, मिथ्या, क्रोध और द्वेष को मन से दूर करो; लोक के लिए कष्ट सहो; आराम की बात छोड़ो और प्रेम, आत्म-तोषण तथा कर्म की ओर ध्यान दो। लेखक की दृष्टि में बूढ़े के ये कथन अत्यंत सार्थक हैं क्योंकि ये मानव के आंतरिक विकास, चरितार्थता और नैतिक जीवन की दिशा निर्देशित करते हैं।
Q12: मनुष्य की पूँछ की तरह उसके नाखून भी एक दिन झड़ जाएँगे । से लेखक के मन में कैसी आशा जगती है ? प्राणिशास्त्रियों के इस अनुमान
उत्तर : प्राणिशास्त्रियों के अनुमान के अनुसार, एक दिन मनुष्य की पूँछ की तरह उसके नाखून भी झड़ जाएंगे। इस विचार से लेखक के मन में आशा जागती है कि भविष्य में मनुष्य अपने नाखूनों के बढ़ने की सहजात, पशुवत् प्रवृत्ति से मुक्त हो जाएगा और पूरी तरह से मानवता की ओर अग्रसर होगा। अर्थात् मनुष्य अपनी पशुता को त्यागकर नैतिक, सभ्य और सहिष्णु जीवन जीने में सक्षम होगा।
Q13: ‘सफलता’ और ‘चरितार्थता’ शब्दों में लेखक अर्थ की भिन्नता किस प्रकार प्रतिपादित करता है ?
उत्तर : लेखक के अनुसार ‘सफलता’ और ‘चरितार्थता’ में स्पष्ट अंतर है। सफलता वह है जिसे मनुष्य बाह्य साधनों, जैसे मारणास्त्रों या उपकरणों के संचयन से प्राप्त कर लेता है। यह दिखावे और आडंबर से जुड़ी होती है। जबकि चरितार्थता वास्तविक मूल्य और मानवता में निहित है—यह प्रेम, मैत्री और दूसरों के कल्याण के लिए अपने आप को निःस्वार्थ भाव से समर्पित करने में है। नाखूनों को काटने का अभ्यास इस ‘स्व’-निर्धारित आत्म-बंधन का प्रतीक है, जो मनुष्य को चरितार्थता की ओर अग्रसर करता है।
Q14: व्याख्या करें –
(क) काट दीजिए, वे चुपचाप दंड स्वीकार कर लेंगे; पर निर्लज्ज अपराधी की भाँति फिर छूटते ही सेंध पर हाजिर ।
(ख) मैं मनुष्य के नाखून की ओर देखता हूँ तो कभी-कभी निराश हो जाता हूँ ।
(ग) कमबख्त नाखून बढ़ते हैं तो बढ़ें, मनुष्य उन्हें बढ़ने नहीं देगा ।
उत्तर : (क) यह पंक्ति पाठ “नाखून क्यों बढ़ते हैं” से ली गई है। इसका आशय है कि नाखून ठीक उसी तरह बढ़ते हैं जैसे अपराधी दंड स्वीकार करने के बाद भी अपनी आदतों को छोड़ नहीं पाता। लेखक के अनुसार नाखून को काटने पर भी यह फिर से बढ़ जाते हैं, जिसमें किसी प्रकार की लाज-शर्म नहीं होती। इससे लेखक मनुष्य की सहज पाश्विक प्रवृत्ति की ओर ध्यान आकृष्ट करते हैं, जो बार-बार विध्वंसक प्रवृत्ति में लौटती है।

(ख) यह पंक्ति लेखक की चिंतनशील भावनाओं को व्यक्त करती है। नाखून मनुष्य की भयंकर और पाशवी वृत्ति का प्रतीक हैं। लेखक नाखून को देखकर इस बात पर निराश होता है कि मनुष्य कितनी विध्वंसक प्रवृत्ति रखता है। हिरोशिमा जैसी घटनाओं के उदाहरण से लेखक यह बताता है कि मनुष्य की बर्बरता आज भी उसके भीतर विद्यमान है।

(ग) इस पंक्ति में लेखक यह बताना चाहते हैं कि भले ही नाखून अपनी प्राकृतिक प्रवृत्ति से बढ़ते रहें, लेकिन मनुष्य अब विवेकशील और संवेदनशील हो गया है। वह अपने भीतर की विध्वंसक और पाशवी प्रवृत्ति को नियंत्रित करने लगा है। इसलिए नाखून बढ़ें या न बढ़ें, मनुष्य उन्हें काटकर नियंत्रण में रखेगा और सृजनात्मकता व मानवीय मूल्यों की ओर अग्रसर रहेगा।
Q15: लेखक की दृष्टि में हमारी संस्कृति की बड़ी भारी विशेषता क्या है ? स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर : लेखक की दृष्टि में हमारी संस्कृति की बड़ी विशेषता यह है कि व्यक्ति अपने ऊपर स्वयं द्वारा लगाये गए बंधनों का पालन करता है। भारतीय चित्त आज भी केवल बाहरी अनधीनता नहीं, बल्कि स्वाधीनता की भावना में सोचता है। यह हमारी परंपरा और दीर्घकालीन संस्कारों का फल है। इन संस्कारों के कारण व्यक्ति अपने ‘स्व’ के बंधन को आसानी से नहीं छोड़ पाता। यानी हमारी संस्कृति हमें अनुशासित, संयमी और आत्म-नियंत्रित बनाती है।
Q16: ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ का सारांश प्रस्तुत करें ।
उत्तर : ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ में लेखक ने नाखूनों के बढ़ने के प्राकृतिक प्रक्रिया को मनुष्य की प्राचीन पशु प्रवृत्ति से जोड़कर देखा है। प्राचीन समय में मनुष्य जंगली था और नाखून उसके असली अस्त्र थे। वह इन्हीं के सहारे अपनी रक्षा और शिकार करता था। समय के साथ मानवीय विकास हुआ, मनुष्य ने हथियार, बंदूक, तोप, बम आदि का प्रयोग शुरू किया और नाखून अब उसकी रक्षा के लिए आवश्यक नहीं रहे। बावजूद इसके नाखून बढ़ते रहते हैं, जो प्रकृति द्वारा मनुष्य को उसके भीतर मौजूद अस्त्र की याद दिलाते हैं। लेखक बताता है कि नाखून बढ़ाना पशु प्रवृत्ति की निशानी है, जबकि उन्हें काटने की प्रवृत्ति मनुष्यता का प्रतीक है।

लेखक ने यह भी दिखाया है कि मनुष्य ने नाखूनों को कलात्मक और सौंदर्य के लिए सजाना शुरू किया। यह उसके संवेदनशील और सभ्य बनने की प्रक्रिया का हिस्सा है। निबंध में लेखक मनुष्य की बर्बरता और प्रेम, त्याग तथा चरितार्थता के बीच तुलना करता है। नाखून बढ़ते रहना और काटना उसकी सहजात वृत्तियाँ हैं। लेखक यह प्रश्न उठाता है कि मनुष्य किस ओर बढ़ रहा है—पशुता की ओर या मनुष्यता की ओर। अंततः लेखक यह संदेश देता है कि मानव अपने भीतर की पशु प्रवृत्ति को नियंत्रित कर सृजनात्मक और मानवीय मूल्यों की ओर बढ़ सकता है।

भाषा की बात

1. निम्नलिखित शब्दों के वचन बदलें
अल्पज्ञ, प्रतिद्वंद्वियों, हड्डी, मुनि, अवशेष त्तियों, उत्तराधिकार, बँदरिया
उत्तर: अल्पज्ञ – अल्पज्ञ (एकवचन)
प्रतिद्वंद्वियों – प्रतिद्वंदी (एकवचन)
हड्डी – हड्डियाँ (बहुवचन)
मुनि – मुनि (बहुवचन: मुनि / मुनिजन)
अवशेषत्तियों – अवशेष (एकवचन) या अवशेषत्तियाँ का शुद्ध रूप “अवशेषताएँ” होगा
उत्तराधिकार – उत्तराधिकार (एकवचन) – उत्तराधिकारी/उत्तराधिकारों (बहुवचन) (संदर्भानुसार)
बँदरिया – बँदरियाँ (बहुवचन)

2. वाक्य-प्रयोग द्वारा निम्नलिखित शब्दों के लिंग-निर्णय करें
बंदूक, घाट, सतह, अनुसंधित्सा, भंडार, खोज, अंग, वस्तु
उत्तर:
बंदूक (स्त्रीलिंग) – सैनिक ने बंदूक उठाई।
घाट (पुल्लिंग) – वह गंगा के घाट पर स्नान करने गया।
सतह (स्त्रीलिंग) – इस मेज़ की सतह बहुत चिकनी है।
अनुसंधित्सा (स्त्रीलिंग) – विज्ञान की अनुसंधित्सा ने मानव जीवन में नई राहें खोली हैं।
भंडार (पुल्लिंग) – इस पुस्तकालय में ज्ञान का विशाल भंडार है।
खोज (स्त्रीलिंग) – उस वैज्ञानिक की नई खोज की चर्चा हर तरफ हो रही है।
अंग (पुल्लिंग) – हाथ और पैर शरीर के मुख्य अंग हैं।
वस्तु (स्त्रीलिंग) – यह वस्तु बहुत कीमती है, ध्यान से संभालो।

3. निम्नलिखित वाक्यों में क्रिया की काल रचना स्पष्ट करें
(क) उन दिनों उसे जूझना पड़ता था ।
(ख) मनुष्य और आगे बढ़ा ।
(ग) यह सबको मालूम है ।
(घ) वह तो बढ़ती ही जा रही है ।
(ङ) मनुष्य उन्हें बढ़ने नहीं देगा ।
उत्तर: (क) उन दिनों उसे जूझना पड़ता था । – भूतकाल
(ख) मनुष्य और आगे बढ़ा । – भूतकाल
(ग) यह सबको मालूम है । – वर्तमान काल
(घ) वह तो बढ़ती ही जा रही है । – वर्तमान काल
(ङ) मनुष्य उन्हें बढ़ने नहीं देगा । – भविष्य काल

4. अस्त्र-शस्त्रों का बढ़ने देना मनुष्य की अपनी इच्छा की निशानी है और उनकी बाढ़ को रोकना मनुष्यत्व का तकाजा है ।’ इस वाक्य में आए विभक्ति चिह्नों के प्रकार बताएँ ।
उत्तर: 1. की – संबंधवाचक विभक्ति
2. को – संप्रेषण कारक
3. का – संबंधवाचक विभक्ति

5. स्वतंत्रता, स्वराज्य जैसे शब्दों की तरह ‘स्व’ लगाकर पाँच शब्द बनाइए ।
उत्तर: स्वधर्म
स्वसुख
स्वशक्ति
स्वभाव
स्वअध्ययन

6. निम्नलिखित के विलोम शब्द लिखें
पशुता, घृणा, अभ्यास, मारणास्त्र, ग्रहण, मूढ़, अनुवर्तिता, सत्याचरण
उत्तर: पशुता – मनुष्यता
घृणा – प्रेम / स्नेह
अभ्यास – अव्यवस्था / उपेक्षा
मारणास्त्र – रक्षकास्त्र / जीवनरक्षक
ग्रहण – त्याग / परित्याग

10th हिंदी गोधूली के अन्य अध्यायों के Solution भी देखें।

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क्रमांक अध्याय
1 श्रम विभाजन एवं जातिप्रथा
2 विष के दाँत
3 भारत से हम क्या सीखें
5 नगरी लिपि
6 बहादुर
7 परंपरा का मूल्यांकन
8 जित-जित मैं निरखत हूँ
9 आविन्यों
10 मछली
11 नैबतख़ाने में इबादत
12 शिक्षा और संस्कृति

शब्द निधि

अल्पज्ञ : कम जाननेवाला
दयनीय : दया करने योग्य
बेहया : बिना हया के, निर्लज्ज, बेशर्म
प्रतिद्वंद्वी : विरोधी
नखधर : नख को धारण करनेवाला, नाखून वाला
दंतावलंबी : दाँत का सहारा लेकर जीने वाला
विचरण : घूमना, भटकना
ततः किम् : फिर क्या, इसके बाद
असह्य : न सह सकने योग्य
पाशवी वृत्ति : पशु जैसा स्वभाव एवं आचरण
वर्तुलाकार : घुमावदार, गोलाकार
दंतुल : दाँत वाला, जिसके दाँत बाहर निकले हों
दाक्षिणात्य : दक्षिण का (दक्षिण भारतीय)
अधोगामिनी : नीचे की ओर जानेवाली
सहजात वृत्ति : जन्म के साथ पैदा होने वाली वृत्ति या स्वभाव
वाक् : वाणी, भाषा
निर्बोध नासमझ, नादान
अनुवर्तिता पीछे-पीछे चलना
अरक्षित : जो रक्षित न हो, खुला
अनुसंधित्सा : अनुसंधान की प्रबल इच्छा
सरबस : सर्वस्व, सबकुछ
पूर्वसंचित : पहले से इकट्ठा या जमा किया हुआ
समवेदना : दूसरे के दुख को महसूस करना
उद्भावित : प्रकट की गयी, उत्पन्न की गयी
असत्याचरण : असत्य आचरण, लोकविरुद्ध आचरण
: निर्वैर बिना वैर-विरोध के
: उत्स स्रोत, उद्गम, मूल
आत्मतोषण : अपने को संतुष्ट करना, अपने को समझाना
चरितार्थता : सार्थकता
निःशेष : जिसका शेष भी न बचे, सम्पूर्ण
तकाजा : माँग

हजारी प्रसाद द्विवेदी का संक्षिप्त परिचय :

हजारी प्रसाद द्विवेदी आधुनिक हिंदी साहित्य के बहुमुखी प्रतिभा-संपन्न और गहन चिंतक रचनाकार थे। उनका जन्म सन् 1907 में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के आरत दुबे का छपरा नामक गाँव में हुआ। उनका बचपन परंपरागत सांस्कृतिक वातावरण में बीता, जिसने आगे चलकर उनके साहित्यिक व्यक्तित्व को समृद्ध किया। संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, बाँग्ला, इतिहास, संस्कृति, धर्म और दर्शन पर उनकी पैनी दृष्टि थी। उन्होंने केवल पढ़ा नहीं, बल्कि इन विषयों को अपने साहित्य में जीवंत भी किया।
द्विवेदीजी ने निबंध, उपन्यास, समालोचना, शोध, साहित्येतिहास और ग्रंथ-संपादन जैसे विविध क्षेत्रों में विशिष्ट योगदान दिया। उनकी भाषा में विद्वत्ता के साथ सरलता और सौंदर्य का अद्भुत संतुलन मिलता है। ‘अशोक के फूल’, ‘कल्पलता’, ‘विचार और वितर्क’, ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’, ‘अनामदास का पोथा’, ‘पुनर्नवा’, ‘कबीर’ और ‘हिंदी साहित्य की भूमिका’ जैसी कृतियाँ हिंदी साहित्य को नई दिशा देने वाली मानी जाती हैं।
उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय, शांति निकेतन और चंडीगढ़ विश्वविद्यालय में अध्यापन और प्रशासनिक पदों पर कार्य करते हुए नई पीढ़ी को भारतीय चिंतन और संस्कृति की ओर उन्मुख किया। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण और लखनऊ विश्वविद्यालय से डी॰लिट् की उपाधि प्राप्त हुई, जो उनके साहित्यिक अवदान की औपचारिक स्वीकृति है। सन् 1979 में दिल्ली में उनका निधन हो गया।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

नीचे इस अध्याय से संबंधित कुल 30 वस्तुनिष्ठ प्रश्न दिए गए हैं। ये प्रश्न अध्याय के गहन अध्ययन के आधार पर तैयार किए गए हैं तथा इनमें से कई प्रश्न पिछले वर्षों की बिहार बोर्ड मैट्रिक परीक्षा से भी लिए गए हैं। इन प्रश्नों का अभ्यास करने से आपको परीक्षा की तैयारी में काफी मदद मिलेगी और यह समझने में आसानी होगी कि परीक्षा में किस प्रकार के प्रश्न पूछे जा सकते हैं।
1. ‘पुराने का मोह सब समय वांछनीय ही नहीं होता’- यह पंक्ति किस शीर्षक पाठ की है?
(A) नाखून क्यों बढ़ते हैं
(B) बहादुर
(C) मछली
(D) नागरी लिपि

2. किस देश के लोग बड़े-बड़े नख पसंद करते थे?
(A) अंगदेश के
(B) गांधार के
(C) कैकय देश के
(D) गौड़ देश के

3. ‘अनामदास का पोथा’ उपन्यास किस लेखक की कृति है?
(A) हजारी प्रसाद द्विवेदी
(B) यतीन्द्र मिश्र
(C) अमरकांत
(D) महात्मा गाँधी

4. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ‘निर्लज्ज अपराधी’ किसे कहा है?
(A) डकैत को
(B) चोर को
(C) हत्यारे को
(D) नाखून को

5. हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित पाठ है-
(A) नाखून क्यों बढ़ते हैं
(B) बहादुर
(C) आविन्यों
(D) मछली

6. कौन-सा निबंध नई पीढ़ी में सौन्दर्य बोध, इतिहास चेतना और सांस्कृतिक आत्मगौरव का भाव जगाता है?
(A) श्रम विभाजन और जाति प्रथा
(B) नागरी लिपि
(C) बहादुर
(D) नाखून क्यों बढ़ते हैं

7. ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ हिन्दी की कौन विधा है?
(A) ललित निबंध
(B) कहानी
(C) कविता
(D) उपन्यास

8. ललित निबंध है-
(A) मछली
(B) नाखून क्यों बढ़ते हैं
(C) बहादुर
(D) नौबत खाने में इबादत

9. हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म कब और कहाँ हुआ?
(A) 1907-छपरा, बलिया
(B) 1916-बदरघाट, पटना
(C) 1935-अमरावती, महाराष्ट्र
(D) 1925-नागरा, बलिया

10. नाखून प्रतीक है-
(A) पाशवी वृत्ति का
(B) मानवता का
(C) प्रेम का
(D) पौरुष का

11. हम बार-बार नाखून क्यों काटते हैं?
(A) स्वच्छ रहने के लिए
(B) बर्बरता समापन हेतु
(C) सुंदरता के लिए
(D) मजबूरी से

12. द्विवेदी जी से किसने पूछा था- नाखून क्यों बढ़ते हैं?
(A) लड़के ने
(B) लड़की ने
(C) पत्नी ने
(D) नौकर ने

13. काट दीजिए वे चुपचाप दंड स्वीकार कर लेंगे पर निर्लज्ज अपराधी की भाँति फिर छूटते ही सेंध पर हाजिर। प्रस्तुत पंक्तियाँ किस पाठ से ली गई है?
(A) नागरी लिपि
(B) परंपरा का मूल्यांकन
(C) आविन्यों
(D) नाखून क्यों बढ़ते हैं

14. ‘विचार और वितर्क’ किस लेखक की रचना है?
(A) हजारी प्रसाद द्विवेदी
(B) महात्मा गांधी
(C) गुणाकार मुले
(D) यतीन्द्र मिश्र

15. ‘नाखून बार-बार काटते रहना और अलंकृत करते रहना’ निरूपित करता है-
(A) सौन्दर्यबोध और सांस्कृतिक चेतना का
(B) सुन्दरता बढ़ाने का
(C) अच्छे व्यवहार का
(D) सुन्दरता और स्वास्थ्य पर ध्यान देने का

16. ‘मनुष्य की पशुता को जितनी बार भी काट दो, वह मरना नहीं जानती’ …….. पर पंक्ति किस शीर्षक पाठ की है?
(A) विष के दांत
(B) बहादुर
(C) नाखून क्यों बढ़ते हैं
(D) मछली

17. किसने कहा था कि- सब पुराने अच्छे नहीं होते, सब नए खराब ही नहीं होते हैं?
(A) मैक्समूलर
(B) हजारी प्रसाद द्विवेदी
(C) स्वामी विवेकानंद
(D) कालिदास

18. दधीचि की हड्डी से क्या बना था?
(A) इंद्र का बज्र
(B) धनुष
(C) त्रिशुल
(D) तलवार

19. ‘कुटज’ के रचनाकार हैं-
(A) हजारी प्रसाद द्विवेदी
(B) नलिन विलोचन शर्मा
(C) अमरकांत
(D) गुणाकर मुले

20. मनुष्य किस ओर बढ़ रहा है? पशुता की ओर या मनुष्यता की ओर? अस्त्र बढ़ाने की ओर या अस्त्र घटाने की ओर? प्रस्तुत पंक्ति किस रचना के हैं?
(A) मैक्समूलर
(B) गुणाकार मुले
(C) हजारी प्रसाद द्विवेदी
(D) विनोद कुमार शुक्ल

21. ‘विचार प्रवाह’ किस लेखक की रचना है?
(A) भीमराव अंबेदकर
(B) हजारी प्रसाद द्विवेदी
(C) यतीन्द्र मिश्र
(D) अमरकांत

22. काट दीजिए वे चुपचाप दंड स्वीकार कर लेंगे पर निर्लज्ज अपराधी की भाँति फिर छूटते ही सेंध पर हाजिर। उपर्युक्त कथन में निर्लज्ज अपराधी किसे कहा गया?
(A) चोरों को
(B) वनमानुष को
(C) जंगली जानवरों को
(D) नाखून को

23. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने किसके बहाने अत्यंत सहज शैली में सभ्यता और संस्कृति की विकास गाथा उद्घाटित कर दिखायी है?
(A) आँखों
(B) सुंदरता
(C) नाखूनों
(D) कानों

24. हजारी प्रसाद द्विवेदी किस विश्वविद्यालय में प्रोफेसर एवं प्रशासनिक पद पर रहे?
(A) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
(B) शांति निकेतन विश्वविद्यालय
(C) चंडीगढ़ विश्वविद्यालय
(D) सभी

25. द्विवेदी जी को किस रचना के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला?
(A) आलोकपर्व
(B) नाखून क्यों बढ़ते हैं
(C) कुटुज
(D) अशोक के फूल

26. लेखक के अनुसार मनुष्य के नाखून किसके जीवंत प्रतीक हैं?
(A) मनुष्यता के
(B) सभ्यता के
(C) पाशवी वृत्ति के
(D) सौन्दर्य के

27. हजारी प्रसाद द्विवेदी के कौन-सा निबंध नई पीढ़ी में सौंदर्यबोध, इतिहास चेतना और सांस्कृतिक आत्मगौरव का भाव जगाता है?
(A) अशोक के फूल
(B) कुटज
(C) नाखून क्यों बढ़ते हैं
(D) आलोक पर्व

28. लेखक के अनुसार नाखून की विविध आकृतियाँ कौन-सी हैं?
(A) त्रिकोण
(B) वर्तुलाकार
(C) चंद्राकार
(D) उपर्युक्त सभी

29. मनुष्य अपने नाखून बार-बार क्यों काटता है?
(A) स्वच्छ रहने के लिए
(B) पशुता समाप्त करने के लिए
(C) सौंदर्य के लिए
(D) मजबूरी से

30. लेखक के अनुसार नाखून किस प्रकार से मनुष्य की पशु प्रवृत्ति को दर्शाते हैं?
(A) नाखून बढ़ने से
(B) नाखून काटने से
(C) नाखून सजाने से
(D) नाखूनों की आकृति से

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निष्कर्ष :

ऊपर आपने बिहार बोर्ड कक्षा 10 की हिन्दी पुस्तक “गोधूली भाग 2” के गद्यखंड के चौथे अध्याय “नाखून क्यों बढ़ते हैं” की व्याख्या, बोध-अभ्यास, महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर और वस्तुनिष्ठ प्रश्नों को पढ़ा। हमें उम्मीद है कि यह सामग्री आपके अध्ययन को और सरल व प्रभावी बनाएगी। यदि किसी प्रश्न या समाधान को लेकर आपके मन में कोई शंका हो, तो आप नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में लिख सकते हैं या सीधे हमसे संपर्क करें। हम आपकी मदद करने की पूरी कोशिश करेंगे। संपर्क करें
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