Bihar Board 10th Polity Ex-1 Solution and Free PDF

Bihar Board 10th Polity Ex-1 Solution and Free PDF : राजनीति विज्ञान अध्याय 1 'लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी' का विस्तृत समाधान

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बिहार बोर्ड कक्षा 10 राजनीति विज्ञान अध्याय 1 'लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी' का विस्तृत समाधान ।

Q1: हर सामाजिक विभिन्नता सामाजिक विभाजन का रूप नहीं लेती। कैसे?
उत्तर : यह सत्य है कि हर सामाजिक विभिन्नता सामाजिक विभाजन का रूप नहीं लेती। सामाजिक विभिन्नताएँ एक लोकतांत्रिक समाज में स्वाभाविक होती हैं, जो जन्म, जाति, धर्म, लिंग या व्यक्तिगत पसंद के आधार पर उत्पन्न होती हैं। लोकतंत्र में विभिन्नताओं का होना एक सामान्य बात है क्योंकि एक ही समाज में रहने वाले लोगों की पहचान के कई आधार हो सकते हैं। जब ये विभिन्नताएँ एक-दूसरे से टकराती नहीं हैं या समाज के बड़े हितों को प्रभावित नहीं करतीं, तब तक वे केवल विविधता का हिस्सा बनी रहती हैं। सामाजिक विभाजन की स्थिति तब उत्पन्न होती है जब एक सामाजिक अंतर दूसरे कई अंतरों से ऊपर हो जाता है और समाज में गहरी खाई पैदा कर देता है।
सामाजिक विभिन्नता का सामाजिक विभाजन में बदलना इस बात पर निर्भर करता है कि राजनीति और समाज उन अंतरों को किस प्रकार लेते हैं। यदि विभिन्नताओं को दबाया जाता है या किसी एक समूह को दूसरे पर हावी होने दिया जाता है, तभी वे विभाजनकारी बनती हैं।
Q2: सामाजिक अंतर कब और कैसे सामाजिक विभाजनों का रूप ले लेते हैं ?
उत्तर : सामाजिक अंतर तब सामाजिक विभाजन का रूप ले लेते हैं जब कुछ सामाजिक अंतर अन्य अनेक अंतरों के साथ ऊपर से नीचे की ओर जुड़ जाते हैं। सामान्य तौर पर प्रत्येक समाज में विभिन्न आधारों पर अंतर पाए जाते हैं जैसे कि जन्म, जाति, धर्म, लिंग या आर्थिक स्थिति। ये अंतर तब तक केवल विविधता कहलाते हैं जब तक वे एक-दूसरे को काटते रहते हैं, लेकिन जब एक प्रकार का अंतर दूसरे प्रकार के अंतरों से बड़ा हो जाता है और लोग खुद को एक विशिष्ट समूह का हिस्सा मानने लगते हैं, तो यह सामाजिक विभाजन का रूप ले लेता है। उदाहरण के लिए, अमेरिका में श्वेत और अश्वेत के बीच का अंतर एक सामाजिक विभाजन बन जाता है क्योंकि वहाँ अश्वेत लोग आमतौर पर गरीब, बेघर और भेदभाव के शिकार हैं। जब शिक्षा, धन और सामाजिक प्रतिष्ठा जैसे कारक किसी एक विशेष समूह के पक्ष में या विपक्ष में जुड़ जाते हैं, तो समाज में गहरी दरार पैदा हो जाती है।

सामाजिक विभाजन तभी होता है जब कोई एक सामाजिक अंतर इतना महत्वपूर्ण हो जाता है कि वह समाज के अन्य सभी हितों और पहचानों को पीछे छोड़ देता है।
Q3: सामाजिक विभाजनों की राजनीति के परिणामस्वरूप ही लोकतंत्र के व्यवहार में परिवर्तन होता है। भारतीय लोकतंत्र के संदर्भ में इसे स्पष्ट करें।
उत्तर : सामाजिक विभाजनों की राजनीति और लोकतंत्र के व्यवहार के बीच गहरा संबंध होता है। लोकतंत्र में जब सामाजिक विभिन्नताएं राजनीतिक रूप ले लेती हैं, तो यह शासन की प्रकृति और समाज के व्यवहार को बदल देती हैं। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में, सामाजिक विभाजन केवल संघर्ष के कारण नहीं बनते, बल्कि वे लोकतंत्र को अधिक व्यापक और समावेशी बनाने का माध्यम भी बनते हैं। जब विभिन्न सामाजिक समूह अपनी पहचान और अधिकारों के लिए संगठित होते हैं, तो राजनीतिक दल उनकी मांगों को सत्ता के गलियारों तक पहुँचाते हैं, जिससे लोकतंत्र की जड़ें और गहरी होती हैं।

सामाजिक विभाजनों का राजनीतिक के परिणामस्वरूप : भारतीय लोकतंत्र में सामाजिक विभाजनों की राजनीति का सबसे बड़ा प्रभाव यह रहा है कि इसने समाज के वंचित और पिछड़े वर्गों को राजनीतिक मुख्यधारा में शामिल किया है। पहले राजनीति का केंद्र केवल उच्च और कुलीन वर्ग तक सीमित था, लेकिन समय के साथ जाति, धर्म और भाषाई अस्मिताओं के आधार पर होने वाली राजनीति ने सत्ता के ढांचे को बदल दिया है। जब दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की समस्याओं को राजनीतिक मुद्दा बनाया गया, तो इससे उनकी राजनीतिक चेतना जागृत हुई। इसका परिणाम यह हुआ कि आज भारतीय लोकतंत्र में इन वर्गों की भागीदारी पहले की तुलना में कहीं अधिक बढ़ गई है, जिससे लोकतंत्र का व्यवहार अधिक प्रतिनिधिमूलक हो गया है।

भारतीय लोकतंत्र के संदर्भ में स्पष्टीकरण : भारत में भाषाई आधार पर राज्यों का पुनर्गठन सामाजिक विभाजनों की राजनीति का एक श्रेष्ठ उदाहरण है। शुरुआत में डर था कि भाषा के आधार पर राज्य बनाने से देश टूट जाएगा, लेकिन इसके विपरीत इस कदम ने देश की एकता को और अधिक मजबूत किया। इसी प्रकार, आरक्षण की राजनीति ने उन वर्गों को शासन प्रशासन में जगह दी जो सदियों से हाशिए पर थे। सामाजिक विभाजनों की इस राजनीतिक अभिव्यक्ति ने संघर्षों को हिंसक होने से रोका है क्योंकि अब विभिन्न समुदायों के पास अपनी बात रखने के लिए एक लोकतांत्रिक मंच उपलब्ध है।
Q4: सत्तर के दशक से आधुनिक दशक के बीच भारतीय लोकतंत्र का सफर (सामाजिक न्याय के संदर्भ में) का संक्षिप्त वर्णन करें ।
उत्तर : भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 1970 का दशक एक अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है। इसी कालखंड में भारतीय राजनीति में ‘सामाजिक न्याय’ की गूँज स्पष्ट रूप से सुनाई देने लगी थी। 1971 के चुनावों में ‘गरीबी हटाओ’ के नारे ने समाज के वंचित वर्गों में एक नई आशा जगाई। हालांकि, इसी दशक के मध्य में जब लोकतांत्रिक संस्थाओं पर दबाव बढ़ा, तब जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में ‘संपूर्ण क्रांति’ का आह्वान किया गया। इस आंदोलन ने न केवल सत्ता के केंद्रीकरण को चुनौती दी, बल्कि समाज के पिछड़े और दलित वर्गों को अपनी राजनीतिक शक्ति का अहसास कराया। इसी दौर में भारतीय लोकतंत्र ने आपातकाल जैसी कठिन परीक्षा का सामना किया, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि भारत की जनता अपनी लोकतांत्रिक स्वतंत्रता और अधिकारों के प्रति कितनी सजग है।
Q5: सामाजिक विभाजनों की राजनीति का परिणाम किन-किन चीजों पर निर्भर करता है ?
उत्तर : सामाजिक विभाजनों की राजनीति का परिणाम मुख्य रूप से निम्न चीजों पर निर्भर करता है –

लोगों की अपनी पहचान के प्रति चेतना पर : सामाजिक विभाजनों की राजनीति का सबसे पहला और प्रमुख कारक यह है कि लोग अपनी पहचान को किस रूप में देखते हैं। यदि लोग स्वयं को केवल एक विशिष्ट जाति, धर्म या भाषाई समूह का हिस्सा मानते हैं और अपनी पहचान को शेष समाज से अलग या श्रेष्ठ समझते हैं, तो उनके लिए दूसरों के साथ सामंजस्य बैठाना बहुत कठिन हो जाता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति खुद को केवल ‘हिंदू’ या ‘मुस्लिम’ या ‘तमिल’ के रूप में देखता है और भारतीय पहचान को गौण मानता है, तो सामाजिक संघर्ष की स्थिति पैदा होती है। इसके विपरीत, यदि लोग अपनी पहचान को बहुआयामी मानते हैं और राष्ट्रीय पहचान के भीतर अपनी क्षेत्रीय या भाषाई पहचान को संजोते हैं, तो राजनीतिक परिणाम सुखद होते हैं। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में जब लोग खुद को पहले ‘भारतीय’ और फिर कुछ और मानते हैं, तो सामाजिक विभाजन लोकतंत्र को खतरा नहीं पहुँचाते।

राजनीतिक दलों और नेताओं की भूमिका पर : दूसरा महत्वपूर्ण कारक यह है कि राजनीतिक दल किसी समुदाय की माँगों को किस प्रकार उठाते हैं। किसी भी लोकतंत्र में राजनीतिक नेताओं की यह जिम्मेदारी होती है कि वे समाज की विभिन्न आकांक्षाओं को मंच प्रदान करें। यदि राजनेता किसी एक समुदाय की माँगों को इस तरह से पेश करते हैं जो दूसरे समुदायों के हितों के खिलाफ न हो और संविधान के दायरे में हो, तो उसे स्वीकार करना आसान होता है। परंतु, यदि नेता केवल अपने वोट बैंक के लिए किसी एक समूह की ऐसी माँगें उठाते हैं जो देश की अखंडता या दूसरे समूह के अस्तित्व के लिए खतरा हो, तो परिणाम हिंसक और विभाजनकारी हो सकते हैं। शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के लिए यह आवश्यक है कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा समुदायों के बीच नफरत फैलाने के बजाय उनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा पर केंद्रित हो।

सरकार का रुख और प्रतिक्रिया पर : तीसरा और निर्णायक कारक सरकार की प्रतिक्रिया है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि शासन सत्ता में बैठे लोग विभिन्न समूहों की उचित माँगों के प्रति कैसा दृष्टिकोण अपनाते हैं। यदि सरकार अल्पसंख्यकों या हाशिए पर रहने वाले समूहों की जायज माँगों को सत्ता में साझेदारी देकर समायोजित करने का प्रयास करती है, जैसा कि बेल्जियम में देखा गया, तो सामाजिक विभाजन राजनीतिक स्थिरता में सहायक होते हैं। इसके विपरीत, यदि सरकार सत्ता की ताकत का उपयोग करके किसी एक बहुसंख्यक समुदाय की इच्छा को दूसरों पर थोपने की कोशिश करती है या अल्पसंख्यकों की वाजिब माँगों को दबाने का प्रयास करती है, जैसा कि श्रीलंका के उदाहरण में सिंहाला वर्चस्व के रूप में दिखा, तो इससे गृहयुद्ध और राष्ट्र के विभाजन का खतरा बढ़ जाता है। अंततः, लोकतांत्रिक राजनीति का परिणाम इस बात पर टिका होता है कि मतभेदों को बलपूर्वक दबाया जा रहा है या उन्हें बातचीत और सत्ता में उचित हिस्सेदारी के माध्यम से सुलझाया जा रहा है।
Q6: सामाजिक विभाजनों को संभालने के संदर्भ में इनमें से कौन-सा बयान लोकतांत्रिक व्यवस्था पर लागू नहीं होता ?
[क] लोकतंत्र में राजनीतिक प्रतिद्वन्द्विता के चलते सामाजिक विभाजनों की छाया राजनीति पर भी पड़ता है।
[ख] लोकतंत्र में विभिन्न समुदायों के लिए शांतिपूर्ण ढंग से अपनी शिकायतें जाहिर करना संभव है।
[ग] लोकतंत्र सामाजिक विभाजनों को हल करने का सबसे अच्छा तरीका है।
[घ] लोकतंत्र सामाजिक विभाजनों के आधार पर समाज के विखंडन की ओर ले जाता है।
Q7: निम्नलिखित तीन बयानों पर विचार करें—

(क) जहाँ सामाजिक अंतर एक-दूसरे से टकराते हैं, वहाँ सामाजिक विभाजन होता है।
(ख) यह संभव है कि एक व्यक्ति की कई पहचान हो।
(ग) सिर्फ भारत जैसे बड़े देशों में ही सामाजिक विभाजन होते हैं।

इन बयानों में से कौन-कौन से बयान सही हैं?
[अ] क, ख और ग
[ब] क और ख
[स] ख और ग
[द] सिर्फ ग
Q8: निम्नलिखित व्यक्तियों में कौन लोकतंत्र में रंगभेद के विरोधी नहीं थे?
[क] किंग मार्टिन लुथर
[ख] महात्मा गाँधी
[ग] ओलंपिक धावक टोमी स्मिथ एवं जॉन कॉलेस
[घ] जेड गुडी

9. निम्नलिखित का मिलान करें-

मिलन करने वाले प्रश्नों में उसका सही उत्तर उस प्रश्न के सामने ही दिया गया है।
(क) पाकिस्तान (ब) ईस्लाम
(ख) हिन्दुस्तान (अ) धर्मनिरपेक्ष
(ग) इंगलैंड (स) प्रोटेस्टेंट
Q10: भावी समाज में लोकतंत्र का जिम्मेवारी और उद्देश्य पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखें ।
उत्तर : भावी समाज में लोकतंत्र की भूमिका मात्र एक शासन पद्धति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक और नैतिक जीवन शैली के रूप में उभर रहा है। भविष्य के समाज में लोकतंत्र की सबसे बड़ी जिम्मेवारी एक ऐसे वातावरण का निर्माण करना है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति को समानता, स्वतंत्रता और न्याय का वास्तविक अनुभव हो सके। जैसे-जैसे समाज आधुनिकता की ओर बढ़ रहा है, लोकतांत्रिक संस्थाओं पर यह उत्तरदायित्व बढ़ता जा रहा है कि वे केवल बहुमत के शासन तक सीमित न रहकर समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करें। भावी लोकतंत्र का मुख्य उद्देश्य सत्ता का विकेंद्रीकरण करना और शासन में आम आदमी की भागीदारी को सुनिश्चित करना है ताकि निर्णय लेने की प्रक्रिया में केवल गिने-चुने लोगों का वर्चस्व न रहे।

एक आदर्श भावी समाज में लोकतंत्र की एक अनिवार्य जिम्मेवारी सामाजिक न्याय की स्थापना करना है। इसके अंतर्गत जाति, धर्म, लिंग या क्षेत्र के आधार पर होने वाले किसी भी भेदभाव को समाप्त करना प्राथमिक लक्ष्य होना चाहिए। लोकतंत्र का उद्देश्य भविष्य में एक ऐसे समावेशी समाज का निर्माण करना है जहाँ आर्थिक संसाधनों का वितरण न्यायोचित हो और विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से पहुँचे।

आने वाले समय में लोकतंत्र का एक प्रमुख उद्देश्य शासन व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ाना है। सूचना तकनीक के युग में नागरिकों की यह अपेक्षा रहती है कि सरकार के प्रत्येक कार्य की जानकारी उन्हें सुलभ हो। इसलिए, भावी लोकतंत्र को भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन प्रदान करने की जिम्मेदारी निभानी होगी। इसके साथ ही, युवाओं की राजनीतिक सहभागिता को बढ़ावा देना भी एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है। भावी समाज के लिए लोकतंत्र का एक अन्य महत्वपूर्ण उद्देश्य विविधता में एकता को बनाए रखना है। भारत जैसे विशाल देश में विभिन्न संस्कृतियों और विचारधाराओं का मेल है। लोकतंत्र की यह निरंतर जिम्मेवारी है कि वह इन विविधताओं के बीच सामंजस्य बिठाए और किसी भी प्रकार के क्षेत्रीय या सांप्रदायिक असंतोष को पनपने न दे।
Q11: भारत में किस तरह जातिगत असमानताएँ जारी है ? स्पष्ट करें ।
उत्तर : भारत में जाति प्रथा समाज की एक प्राचीन और जटिल विशेषता रही है जो आधुनिक समय में भी विभिन्न रूपों में जीवित है। हालाँकि स्वतंत्रता के बाद भारतीय संविधान ने समानता का अधिकार प्रदान किया और छुआछूत जैसी कुप्रथाओं को प्रतिबंधित किया, फिर भी जातिगत असमानताएँ पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। आज भी समाज के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक ढाँचे में जाति की गहरी जड़ें स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं, जो लोकतंत्र के पूर्ण विकास में बाधक बनी हुई हैं।

आर्थिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो जाति और संपत्ति के बीच आज भी एक गहरा संबंध बना हुआ है। ऐतिहासिक रूप से जिन जातियों को शिक्षा और संसाधनों से वंचित रखा गया था, वे आज भी आर्थिक रूप से पिछड़ी हुई हैं। उच्च जातियों के पास भूमि और पूंजी के बड़े हिस्से पर नियंत्रण है, जबकि दलित और पिछड़ी जातियों का एक बड़ा वर्ग आज भी भूमिहीन कृषि मजदूर या दिहाड़ी मजदूर के रूप में जीवन व्यतीत कर रहा है। राष्ट्रीय सर्वेक्षणों के अनुसार, गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों में अनुसूचित जातियों और जनजातियों का प्रतिशत सबसे अधिक है, जो यह दर्शाता है कि जाति आर्थिक स्थिति को निर्धारित करने वाला एक मुख्य कारक बनी हुई है।

सामाजिक व्यवहार में जातिगत भेदभाव का सबसे प्रबल उदाहरण अंतर्विवाह की परंपरा है। आधुनिक और शहरी समाज के दावों के बावजूद, आज भी अधिकांश भारतीय अपने ही जाति समूह के भीतर विवाह करना पसंद करते हैं। विवाह विज्ञापनों और पारिवारिक निर्णयों में जाति को प्राथमिकता दी जाती है। इसके अतिरिक्त, ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी सामाजिक मेलजोल और खान-पान में जातिगत दूरियाँ देखी जा सकती हैं। यद्यपि संवैधानिक रूप से अस्पृश्यता का अंत कर दिया गया है, फिर भी व्यवहार में कई स्थानों पर निचली जातियों के प्रति उपेक्षा और भेदभाव का भाव बना हुआ है।

भारतीय राजनीति में जाति एक अत्यंत शक्तिशाली कारक के रूप में उभरी है। चुनावी प्रक्रिया के दौरान राजनीतिक दल उम्मीदवारों का चयन उस क्षेत्र की जातीय संरचना को ध्यान में रखकर करते हैं। मतदान के समय लोग अक्सर अपनी जाति के उम्मीदवार को वरीयता देते हैं, जिसे वोट बैंक की राजनीति कहा जाता है। राजनीतिक लामबंदी ने जातियों के भीतर चेतना तो पैदा की है, लेकिन इसने समाज को जातीय आधार पर विभाजित भी किया है। जब नीतियां और निर्णय केवल विशिष्ट जातियों के तुष्टीकरण के लिए लिए जाते हैं, तो इससे समग्र सामाजिक विकास प्रभावित होता है और जातिगत विद्वेष बढ़ता है।

शिक्षा के क्षेत्र में भी जातिगत असमानता स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। हालाँकि सरकारी प्रयासों और आरक्षण के कारण पिछड़ी जातियों की पहुँच उच्च शिक्षा तक बढ़ी है, लेकिन गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक शिक्षा और संसाधनों की उपलब्धता के मामले में अभी भी बड़ी खाई है। आर्थिक रूप से कमजोर जातियों के बच्चों को स्कूल छोड़ना पड़ता है, जिससे वे भविष्य के बेहतर रोजगार के अवसरों से वंचित रह जाते हैं। इस प्रकार, शिक्षा का अभाव और आर्थिक तंगी मिलकर एक ऐसा चक्र बनाते हैं जो निचली जातियों को उसी स्थिति में बनाए रखने पर मजबूर करता है, जिससे जातिगत असमानता का यह सिलसिला पीढ़ी दर पीढ़ी जारी रहता है।
Q12: क्यों सिर्फ जाति के आधार पर भारत में चुनावी नतीजे तय नहीं हो सकते? इसके दो कारण बतावें ।
उत्तर : भारतीय राजनीति में जाति एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, परंतु यह सोचना पूरी तरह गलत होगा कि चुनाव के नतीजे केवल जाति के आधार पर ही तय होते हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाता कई अन्य पहलुओं पर भी विचार करते हैं, जो जातिगत समीकरणों से कहीं अधिक प्रभावशाली साबित होते हैं। बिहार बोर्ड की पाठ्यपुस्तकों के अनुसार, इसके मुख्य कारणों को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है।

निर्वाचन क्षेत्रों की मिश्रित सामाजिक संरचना : भारत में किसी भी संसदीय या विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र की बनावट ऐसी नहीं है कि वहाँ केवल एक ही जाति के मतदाताओं का पूर्ण बहुमत हो। प्रत्येक चुनाव क्षेत्र में विभिन्न जातियों, उपजातियों और समुदायों के लोग एक साथ रहते हैं। ऐसी स्थिति में, कोई भी उम्मीदवार या राजनीतिक दल केवल अपनी जाति के वोटों के भरोसे चुनाव नहीं जीत सकता। उसे जीत हासिल करने के लिए अपनी जाति के अलावा अन्य जातियों और समुदायों के मतदाताओं का विश्वास और समर्थन प्राप्त करना अनिवार्य होता है। यही कारण है कि राजनैतिक दल अपनी चुनावी रणनीतियों में केवल एक जाति को नहीं, बल्कि समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने का प्रयास करते हैं।

जाति के भीतर राजनीतिक मतभेद और प्रतिस्पर्धा : यह धारणा कि एक जाति के सभी लोग एक ही पार्टी या उम्मीदवार को वोट देते हैं, वास्तविकता में सही नहीं है। एक ही जाति के भीतर भी लोगों की राजनीतिक विचारधाराएँ, आर्थिक हित और प्राथमिकताएँ अलग-अलग होती हैं। अक्सर चुनावों में देखा जाता है कि एक ही निर्वाचन क्षेत्र से एक ही जाति के दो या दो से अधिक उम्मीदवार अलग-अलग राजनीतिक दलों से चुनाव लड़ते हैं। ऐसी स्थिति में उस जाति के मतदाताओं के पास विकल्पों की अधिकता होती है, जिससे उनके वोट विभिन्न उम्मीदवारों के बीच बँट जाते हैं। इसके अतिरिक्त, एक ही जाति के भीतर अमीर और गरीब मतदाताओं के मुद्दे अलग-अलग होते हैं, जो उनके मतदान व्यवहार को प्रभावित करते हैं।

सरकार का प्रदर्शन और जन कल्याणकारी मुद्दे : आधुनिक भारतीय राजनीति में मतदाता अब केवल जातिगत पहचान के आधार पर ही वोट नहीं देते, बल्कि वे वर्तमान सरकार के कामकाज का भी सूक्ष्मता से आकलन करते हैं। विकास, महँगाई, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं जैसे मुद्दे अक्सर जातिगत दीवारों को तोड़ देते हैं। यदि कोई सरकार जनता की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरती, तो वही जातिगत समूह जो कभी उसका समर्थक था, उसके खिलाफ मतदान कर देता है। सत्ता विरोधी लहर इसी बात का प्रमाण है कि मतदाता जाति से ऊपर उठकर बेहतर शासन और उज्ज्वल भविष्य के लिए मतदान करना पसंद करते हैं।
Q13: विभिन्न तरह की सांप्रदायिक राजनीति का ब्योरा दें और सबके साथ एक-एक उदाहरण दें।
उत्तर : साम्प्रदायिकता राजनीति में एक ऐसी विचारधारा है जहाँ धर्म को ही सामाजिक और राजनैतिक समुदाय का मुख्य आधार माना जाता है। जब एक धर्म के अनुयायी अपने हितों को दूसरे धर्म के अनुयायियों के हितों से श्रेष्ठ या अलग मानने लगते हैं, तो साम्प्रदायिक राजनीति का जन्म होता है। बिहार बोर्ड की पाठ्यपुस्तकों के अनुसार इसके विभिन्न रूप लोकतांत्रिक व्यवस्था में देखे जा सकते हैं जो अक्सर समाज के ताने-बाने को प्रभावित करते हैं।

साम्प्रदायिक राजनीति का सबसे आम रूप हमारे दैनिक विश्वासों और आम धारणाओं में दिखाई देता है। इसमें अक्सर दूसरे धर्मों के प्रति बनाए गए नकारात्मक पूर्वाग्रह, धार्मिक रूढ़ियाँ और अपने धर्म को अन्य धर्मों से श्रेष्ठ समझने की प्रवृत्ति शामिल होती है। यह विचार इतने सामान्य हो गए हैं कि कई बार लोग इन्हें साम्प्रदायिकता के रूप में पहचान भी नहीं पाते। उदाहरण के तौर पर, समाज में किसी विशेष धार्मिक समुदाय के प्रति यह धारणा पाल लेना कि वे कम आधुनिक हैं या उनके संस्कार दूसरों से निम्न हैं, इसी श्रेणी का हिस्सा है।

साम्प्रदायिक राजनीति का दूसरा रूप तब स्पष्ट होता है जब कोई धार्मिक समुदाय अपनी पहचान के आधार पर राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करने की कोशिश करता है। जो लोग बहुसंख्यक समुदाय से होते हैं, वे अक्सर अपनी संख्या के बल पर शासन की शक्तियों का उपयोग अपनी मान्यताओं को थोपने के लिए करते हैं, जिसे बहुसंख्यकवाद कहा जाता है। इसके विपरीत, अल्पसंख्यक समुदाय अपनी अलग पहचान बनाए रखने के लिए विशेष अधिकारों या अलग राजनैतिक इकाई की मांग करते हैं। उदाहरण के तौर पर, श्रीलंका में सिंहली समुदाय द्वारा शासन में अपना वर्चस्व स्थापित करना और तमिलों की उपेक्षा करना इसी मानसिकता का परिणाम है।

लोकतंत्र में चुनाव जीतने के लिए अक्सर सांप्रदायिक लामबंदी का सहारा लिया जाता है। इसके अंतर्गत राजनीतिक दल पवित्र प्रतीकों, धर्मगुरुओं के उपदेशों और भावनात्मक भाषणों का उपयोग करते हैं ताकि एक विशेष धर्म के मतदाताओं को एकजुट किया जा सके। चुनावी प्रतिस्पर्धा में धर्म का सहारा लेकर लोगों के मन में डर या धार्मिक गौरव का भाव पैदा किया जाता है। उदाहरण के तौर पर, चुनाव के दौरान किसी मंदिर या मस्जिद जैसे धार्मिक स्थलों के निर्माण को प्रमुख मुद्दा बनाना और धार्मिक नारों के माध्यम से भीड़ को प्रभावित करना सांप्रदायिक राजनीति का एक प्रचलित तरीका है।
Q14: जीवन के विभिन्न पहलुओं का जिक्र करें जिसमें भारत में स्त्रियों के साथ भेदभाव है या वे कमजोर स्थिति में हैं।
उत्तर : सामाजिक और शैक्षिक स्थिति में भेदभाव : भारत एक पितृसत्तात्मक समाज है जहाँ पुरुषों को महिलाओं की तुलना में अधिक प्रधानता दी जाती है। शिक्षा के क्षेत्र में स्त्रियों की स्थिति आज भी पुरुषों से काफी पीछे है। जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, पुरुषों की तुलना में महिलाओं की साक्षरता दर काफी कम है क्योंकि आज भी कई ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में माता-पिता अपनी बेटियों की शिक्षा पर खर्च करने के बजाय बेटों की पढ़ाई को अधिक प्राथमिकता देते हैं। लड़कियों को अक्सर घर के कामकाज और छोटे भाई-बहनों की देखभाल के लिए स्कूल से निकाल लिया जाता है, जिससे उनकी उच्च शिक्षा का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है।

आर्थिक क्षेत्र और श्रम का असमान विभाजन : आर्थिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो महिलाओं द्वारा किए गए घरेलू कार्यों जैसे खाना बनाना, सफाई करना और बच्चों का पालन-पोषण करना, को उत्पादक कार्य नहीं माना जाता है और न ही इसके लिए उन्हें कोई पारिश्रमिक मिलता है। श्रम के बाजार में भी स्त्रियों के साथ भेदभाव स्पष्ट दिखता है। यद्यपि समान पारिश्रमिक अधिनियम कागजों पर मौजूद है, लेकिन वास्तविकता यह है कि खेल, सिनेमा और खेती से लेकर कारखानों तक के क्षेत्रों में महिलाओं को उसी काम के लिए पुरुषों की तुलना में कम मजदूरी दी जाती है। इसके अलावा, ऊंचे पदों पर महिलाओं की संख्या आज भी बहुत कम है क्योंकि समाज की सोच उन्हें नेतृत्वकारी भूमिकाओं के बजाय सहायक भूमिकाओं में देखने की रही है।

स्वास्थ्य और लिंगानुपात की समस्या : भारतीय समाज में पुत्र की चाहत के कारण महिलाओं की स्थिति और भी दयनीय हो जाती है। कन्या भ्रूण हत्या जैसे अपराधों के कारण भारत का लिंगानुपात कई राज्यों में चिंताजनक रूप से गिर गया है। माता-पिता अक्सर बेटे की चाह में लिंग परीक्षण का सहारा लेते हैं, जिससे समाज में बालिकाओं की संख्या कम होती जा रही है। इसके साथ ही, पोषण के मामले में भी लड़कियों के साथ भेदभाव किया जाता है, जहाँ परिवार के सीमित संसाधनों में लड़कों के खान-पान और स्वास्थ्य पर अधिक ध्यान दिया जाता है, जिससे महिलाएं अक्सर कुपोषण और एनीमिया जैसी समस्याओं का शिकार हो जाती हैं।

राजनैतिक प्रतिनिधित्व का अभाव : राजनैतिक स्तर पर भी महिलाओं की भागीदारी अत्यंत सीमित रही है। हालांकि पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण की व्यवस्था की गई है, लेकिन लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में उनकी उपस्थिति अभी भी बहुत कम है। जब तक नीति निर्धारण और कानून बनाने वाली संस्थाओं में महिलाओं की संख्या पर्याप्त नहीं होगी, तब तक उनके हितों और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को मजबूती से नहीं उठाया जा सकेगा। समाज में व्याप्त सुरक्षा की कमी और हिंसा का डर भी स्त्रियों को सार्वजनिक जीवन में पूरी तरह सक्रिय होने से रोकता है, जो उनकी कमजोर स्थिति का एक प्रमुख पहलू है।
Q15: भारत की विधायिकाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की स्थिति क्या है ?
उत्तर : भारत की विधायिकाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की स्थिति वैश्विक मानकों और उनकी जनसंख्या के अनुपात में काफी चिंताजनक रही है। भारतीय लोकतंत्र के उच्चतम सदन, लोकसभा, में महिला सदस्यों की संख्या का प्रतिशत ऐतिहासिक रूप से बहुत कम रहा है और हाल के वर्षों में भी यह बमुश्किल 14 से 15 प्रतिशत के आसपास पहुँच पाया है। यदि हम विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं की बात करें, तो वहाँ स्थिति और भी अधिक विकट है, क्योंकि अधिकांश राज्यों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व कुल सदस्य संख्या के 5 प्रतिशत से भी कम है। इस दृष्टिकोण से भारत दुनिया के कई छोटे और विकासशील देशों से भी पीछे है, जहाँ महिलाओं को कानून बनाने वाली संस्थाओं में अधिक प्रभावी स्थान प्राप्त है। विधायिकाओं में महिलाओं की इस कम संख्या का सीधा अर्थ यह है कि नीति-निर्धारण और कानून निर्माण की प्रक्रियाओं में महिलाओं की आवाज को उतनी प्राथमिकता नहीं मिल पाती, जितनी मिलनी चाहिए।

हालाँकि, भारत के स्थानीय स्वशासन के स्तर पर स्थिति काफी भिन्न और उत्साहजनक है। 73वें और 74वें संविधान संशोधन के माध्यम से ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया था। इस दिशा में बिहार भारत का पहला ऐसा राज्य बना जिसने स्थानीय निकायों और पंचायतों में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देकर एक मिसाल कायम की। इस क्रांतिकारी कदम के कारण आज बिहार सहित देश भर के स्थानीय निकायों में लाखों महिलाएँ नेतृत्व की भूमिका निभा रही हैं। स्थानीय स्तर पर मिले इस अवसर ने महिलाओं में राजनीतिक चेतना जागृत की है और उन्हें सामाजिक समस्याओं के समाधान में सक्रिय भागीदार बनाया है। लेकिन इसके विपरीत, राज्य विधानसभाओं और संसद में इस तरह के अनिवार्य आरक्षण के अभाव में महिलाओं का संघर्ष आज भी जारी है।

विधायिकाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए लंबे समय से महिला आरक्षण विधेयक की माँग की जा रही थी। हाल ही में भारत सरकार द्वारा नारी शक्ति वंदन अधिनियम (2023) पारित किया गया है, जो लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का प्रावधान करता है। यह विधेयक भारतीय राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ माना जा रहा है, क्योंकि इसके लागू होने के बाद विधायिकाओं में महिलाओं की संख्या में व्यापक वृद्धि होगी। महिलाओं के प्रतिनिधित्व की इस कमी के पीछे मुख्य कारण पितृसत्तात्मक मानसिकता, राजनीतिक दलों द्वारा टिकट वितरण में भेदभाव और महिलाओं के पास पर्याप्त आर्थिक संसाधनों का अभाव रहा है। जब तक विधायिकाओं में महिलाओं की समुचित भागीदारी सुनिश्चित नहीं होती, तब तक सही मायनों में लैंगिक न्याय और लोकतंत्र की सफलता सुनिश्चित नहीं की जा सकती।
Q16: किन्हीं दो प्रावधानों का जिक्र करें जो भारत को धर्मनिरपेक्ष देश बनाता है ?
उत्तर : भारतीय संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष शब्द को विशेष महत्व दिया गया है, जिसका अर्थ है कि भारत में राज्य का अपना कोई आधिकारिक धर्म नहीं है। भारत को एक धर्मनिरपेक्ष देश बनाने वाला सबसे पहला और प्रमुख प्रावधान यह है कि यहाँ किसी भी धर्म को राजकीय धर्म के रूप में स्वीकार नहीं किया गया है। उदाहरण के लिए, जिस प्रकार श्रीलंका में बौद्ध धर्म, पाकिस्तान में इस्लाम और इंग्लैंड में ईसाई धर्म को राजकीय संरक्षण प्राप्त है, उसके विपरीत भारतीय संविधान सभी धर्मों को समान दर्जा देता है। भारतीय राज्य किसी भी नागरिक के साथ धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करता और न ही किसी विशिष्ट धर्म को प्राथमिकता प्रदान करता है। यह संवैधानिक व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि देश की शासन व्यवस्था किसी धार्मिक ग्रंथ के बजाय संविधान के सिद्धांतों के अनुरूप चले।

धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार : भारत को धर्मनिरपेक्ष बनाने वाला दूसरा अत्यंत महत्वपूर्ण प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 के अंतर्गत वर्णित धार्मिक स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार है। यह प्रावधान भारत के प्रत्येक नागरिक को अपनी पसंद के किसी भी धर्म को मानने, उसका आचरण करने और उसका प्रचार-प्रसार करने की पूर्ण स्वतंत्रता देता है। इसके अंतर्गत नागरिकों को यह भी अधिकार है कि वे किसी भी धर्म का पालन न करें या अपनी इच्छानुसार किसी अन्य धर्म को अपना लें। संविधान यह भी स्पष्ट करता है कि किसी भी व्यक्ति को धार्मिक आधार पर कोई कर देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता और न ही सरकारी सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों में किसी विशेष धार्मिक शिक्षा को अनिवार्य बनाया जा सकता है।

समानता का सिद्धांत और राज्य की तटस्थता : इन प्रावधानों के अतिरिक्त, भारतीय संविधान का अनुच्छेद 15 धर्म के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव को पूरी तरह प्रतिबंधित करता है। सरकारी नौकरियों और सार्वजनिक सुविधाओं के उपयोग के मामले में सभी नागरिकों को समान अवसर प्राप्त हैं, चाहे वे किसी भी धर्म के अनुयायी हों। भारतीय धर्मनिरपेक्षता की एक विशिष्ट विशेषता यह भी है कि राज्य धर्म से पूरी तरह अलग नहीं है, बल्कि वह सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान का भाव रखता है। जहाँ आवश्यकता होती है, राज्य सामाजिक कुरीतियों जैसे छुआछूत को समाप्त करने के लिए धार्मिक मामलों में सकारात्मक हस्तक्षेप भी कर सकता है। इस प्रकार, भारत का संविधान एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण करता है जहाँ बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक दोनों समुदायों को अपने धार्मिक विश्वासों को सुरक्षित रखने का पूरा अधिकार मिलता है।
Q17: जब हम लैंगिक विभाजन की बात करते हैं तो हमारा अभिप्राय होता है-
[क] स्त्री और पुरुष के बीच जैविक अंतर ।
[ख] समाज द्वारा स्त्रियों और पुरुषों को दी गई असमान भूमिकाएँ ।
[ग] बालक और बालिकाओं की संख्या का अनुपात ।
[घ] लोकतांत्रिक व्यवस्था में महिलाओं को मतदान का अधिकार न मिलना ।
Q18: भारत में यहाँ औरतों के लिए आरक्षण की व्यवस्था है-
[क] लोकसभा
[ख] विधानसभा
[ग] मंत्रिमंडल
[घ] पंचायती राज्य संस्थाएँ
Q19: सांप्रदायिक राजनीति किस पर आधारित है-
[अ] एक धर्म दूसरे से श्रेष्ठ है।
[ब] विभिन्न धर्मों के लोग समान नागरिक के रूप में खुशी-सुखी साथ रहते हैं।
[स] एक धर्म के अनुयायी एक समुदाय बनाते हैं ।
[द] एक धार्मिक समूह का प्रभुत्व बाकी सभी धर्मों पर कायम रहने में शासन की शक्ति का प्रयोग नहीं किया जा सकता है।
Q20: भारतीय संविधान के बारे में इनमें से कौन-सा कथन सही है-
[क] यह धर्म के आधार पर भेदभाव की मनाही करता है।
[ख] यह एक धर्म को राजकीय धर्म बनाता है ।
[ग] सभी लोगों को कोई भी धर्म मानने की आजादी देता है।
[घ] किसी धार्मिक समुदाय में सभी नागरिकों को बराबरी का अधिकार देता है।
Q21: जाती, धर्म और लिंग पर आधारित विभाजन सिर्फ भारत में है।

22. सूची I और सूची II का मेल कराएँ :

मिलन करने वाले प्रश्नों में उसका सही उत्तर उस प्रश्न के सामने ही दिया गया है।
1. अधिकारों और अवसरों के मामले में स्त्री और पुरुष की बराबरी माननेवाला व्यक्ति (ख) नारीवादी
2. धर्म को समुदाय का मुख्य आधार माननेवाला व्यक्ति (क) सांप्रदायिक
3. जाति को समुदाय का मुख्य आधार माननेवाला व्यक्ति (घ) जातिवादी
4. व्यक्तियों के बीच धार्मिक आस्था पर आधार पर भेदभाव न करनेवाला व्यक्तिन (ग) धर्म निरपेक्ष

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क्रमांक अध्याय
2 सत्ता में साझेदारी की कार्यप्रणाली
3 लोकतंत्र में प्रतिस्पर्धा एवं संघर्ष
4 लोकतंत्र की उपलब्धियाँ
5 लोकतंत्र की चुनौतियाँ

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