Bihar Board 10th Polity Ex-3 Solution and Free PDF

Bihar Board 10th Polity Ex-3 Solution and Free PDF : राजनीति विज्ञान अध्याय 3 'लोकतंत्र में प्रतिस्पर्धा एवं संघर्ष' का विस्तृत समाधान

क्या आप बिहार बोर्ड कक्षा 10वीं की राजनीति विज्ञान की तैयारी कर रहे हैं? अगर तीसरा अध्याय, ‘लोकतंत्र में प्रतिस्पर्धा एवं संघर्ष’, आपको थोड़ा मुश्किल लग रहा है, तो चिंता की कोई बात नहीं है।
हम बिहार बोर्ड कक्षा 10 राजनीति विज्ञान: अध्याय 3 – लोकतंत्र में प्रतिस्पर्धा एवं संघर्ष के समाधान को वस्तुनिष्ठ प्रश्नों (Objective Questions) और विषयनिष्ठ प्रश्नों (Subjective Questions) के साथ आसान, स्पष्ट और बिहार बोर्ड के नवीनतम पाठ्यक्रम पर आधारित लेकर आए हैं। यदि आप सभी छात्रों को किसी भी प्रश्न या किसी भी concept को लेकर संदेह है तो उनका सबका उत्तर नीचे दिया गया है।
मैं निकेत कुमार, आपके लिए Bihar Board (BSEB) Class 10 के राजनीति विज्ञान सहित अन्य सभी विषयों के Exercise Solution और Notes सरल, स्पष्ट एवं बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के नवीनतम पाठ्यक्रम पर आधारित आसान भाषा में अपनी वेबसाइट BSEBsolution पर निःशुल्क उपलब्ध कराता हूँ। यदि आप बिहार बोर्ड के छात्र हैं या बिहार बोर्ड के छात्रों को पढ़ाने वाले शिक्षक/शिक्षिका हैं, तो हमारी वेबसाइट को नियमित रूप से विज़िट करते रहें। नीचे आपको बिहार बोर्ड कक्षा 10 राजनीति विज्ञान अध्याय 3 ‘लोकतंत्र में प्रतिस्पर्धा एवं संघर्ष’ के Free Exercise Solution and PDF दिए गया है।
[ NOTE ] : कोई भी छात्र/छात्रा या शिक्षक/शिक्षिका जो हमारे Free Ultimate Notes को देख रहे है। यदि इसके लिए आपके पास कोई सुझवा है, तो बेझिझक Comment में या What’sApp : 8579987011 पर अपना सुझाव दें। आपके सुझावों का हम हमेशा स्वागत करते हैं। Thank You!

बिहार बोर्ड कक्षा 10 राजनीति विज्ञान अध्याय 3 : लोकतंत्र में प्रतिस्पर्धा एवं संघर्ष का विस्तृत समाधान ।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Question)
I. सही विकल्प चुनें ।

Q1: वर्ष 1975 भारतीय राजनीति में किस लिए जाना जाता है ?
[क] इस वर्ष आम चुनाव हुए थे
[ख] श्रीमती इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री बनी थी
[ग] देश के अंदर आपातकाल लागू हुआ था
[घ] जनता पार्टी की सरकार बनी थी
Q2: भारतीय लोकतंत्र में सत्ता के विरुद्ध जन आक्रोश किस दशक से प्रारंभ हुआ?
[क] 1960 के दशक से
[ख] 1970 के दशक से
[ग] 1980 के दशक से
[घ] 1990 के दशक से
Q3: बिहार में संपूर्ण क्रांति का नेतृत्व निम्नलिखित में से किसने किया ?
[क] मोरारजी देशाई
[ख] नीतीश कुमार
[ग] इंदिरा गाँधी
[घ] जयप्रकाश नारायण
Q4: भारत में 1977 के आम चुनाव में किस पार्टी को बहुमत मिला था ?
[क] काँग्रेस पार्टी को
[ख] जनता पार्टी को
[ग] कम्युनिस्ट पार्टी
[घ] किसी पार्टी को भी नहीं
Q5: ‘चिपको आन्दोलन’ निम्नलिखित में से किससे संबंधित नहीं है ?
[क] अंगू के पेड़ काटने की अनुमति से
[ख] आर्थिक शोषण से मुक्ति से
[ग] शराबखोरी के विरुद्ध आवाज से
[घ] काँग्रेस पार्टी के विरोध से
Q6: ‘दलित पैंथर्स’ के कार्यक्रम से निम्नलिखित में से कौन संबंधित नहीं है ?
[क] जाति प्रथा का उन्मूलन
[ख] दलित सेना का गठन
[ग] भूमिहीन गरीब किसान की उन्नति
[घ] औद्योगिक मजदूरों का शोषण से मुक्ति
Q7: ‘भारतीय किसान यूनियन’ के प्रमुख नेता कौन थे ?
[क] मोरारजी देसाई
[ख] जयप्रकाश नारायण
[ग] महेंद्र सिंह टिकैत
[घ] चौधरी चरण सिंह
Q8: ‘ताड़ी विरोधी आंदोलन’ किस प्रांत में शुरू हुआ ?
[क] बिहार
[ख] उत्तर प्रदेश
[ग] आंध्र प्रदेश
[घ] तमिलनाडु
Q9: ‘नर्मदा घाटी परियोजना’ किन राज्यों से संबंधित है ?
[क] बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश
[ख] तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक
[ग] प. बंगाल, उत्तर प्रदेश, पंजाब
[घ] गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश
Q10: ‘सूचना के अधिकार आंदोलन’ की शुरुआत कहाँ से हुई ?
[क] राजस्थान
[ख] दिल्ली
[ग] तमिलनाडु
[घ] बिहार
Q11: ‘सूचना के अधिकार’ संबंधी कानून कब बना ?
[क] 2004 में
[ख] 2005 में
[ग] 2006 में
[घ] 2007 में
Q12: नेपाल में सप्तदलीय गठबंधन का मुख्य उद्देश्य क्या था ?
[क] राजा को देश छोड़ने पर मजबूर करना
[ख] लोकतंत्र की स्थापना करना
[ग] भारत-नेपाल संबंध सुधारना
[घ] सर्वदलीय सरकार बनाना
Q13: बोलिविया में जनसंघर्ष का मुख्य कारण क्या था ?
[क] पानी की कीमत में वृद्धि
[ख] खाद्यान्न की कीमत में वृद्धि
[ग] पेट्रोल की कीमत में वृद्धि
[घ] जीवन रक्षक दवाओं की कीमत में वृद्धि
Q14: श्रीलंका कब आज़ाद हुआ ?
[क] 1947 में
[ख] 1948 में
[ग] 1949 में
[घ] 1950 में
Q15: राजनीतिक दल का आशय है—
[क] अफसरों के समूह से
[ख] सेनाओं के समूह से
[ग] व्यक्तियों के समूह से
[घ] किसानों के समूह से
Q16: लगभग सभी राजनीतिक दलों का प्रमुख उद्देश्य क्या होता है ?
[क] सत्ता प्राप्त करना
[ख] सरकारी पद प्राप्त करना
[ग] चुनाव लड़ना
[घ] इनमें से कोई नहीं
Q17: राजनीतिक दलों की नींव सर्वप्रथम किस देश में पड़ी ?
[क] ब्रिटेन में
[ख] भारत में
[ग] फ्रांस में
[घ] संयुक्त राज्य अमेरिका में
Q18: निम्नलिखित में से किसे लोकतंत्र का प्राण माना जाता है ?
[क] सरकार
[ख] न्यायपालिका
[ग] संविधान
[घ] राजनीतिक दल
Q19: निम्नलिखित में से कौन-सा कार्य राजनीतिक दल नहीं करता है ?
[क] चुनाव लड़ना
[ख] सरकार की आलोचना करना
[ग] प्राकृतिक आपदा में राहत
[घ] अफसरों की बहाली संबंधी कार्य
Q20: निम्नलिखित में से कौन-सा विचार लोकतंत्र में राजनीतिक दलों से मेल नहीं खाता है ?
[क] दल जनता की भावनाएँ सरकार तक पहुँचाते हैं
[ख] दल एकता और अखंडता के साधन हैं
[ग] दल विकास के लिए सरकारी नीतियों में बाधा उत्पन्न करते हैं
[घ] दल विभिन्न वर्गों की समस्याएँ सरकार तक पहुँचाते हैं
Q21: किस देश में बहुदलीय व्यवस्था नहीं है ?
[क] पाकिस्तान
[ख] भारत
[ग] बांग्लादेश
[घ] ब्रिटेन
Q22: गठबंधन की सरकार बनाने की संभावना किस प्रकार की दलीय व्यवस्था में रहती है?
[क] एकदलीय व्यवस्था
[ख] द्विदलीय व्यवस्था
[ग] बहुदलीय व्यवस्था
[घ] उपर्युक्त में से किसी में भी नहीं
Q23: किसी भी देश में राजनीतिक स्थायित्व के लिए निम्नलिखित में से क्या आवश्यक नहीं है?
[क] सभी दलों द्वारा सरकार को रचनात्मक सहयोग देना
[ख] किसी भी ढंग से सरकार को अपदस्थ करना
[ग] निर्णय प्रक्रिया में सबकी सहमति लेना
[घ] सरकार द्वारा विरोधी दलों को नजरबंद करना
Q24: निम्नलिखित में से कौन-सी चुनौती राजनीतिक दलों की नहीं है ?
[क] दलों के भीतर समय पर सांगठनिक चुनाव न होना
[ख] युवाओं व महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व न मिलना
[ग] जनता की समस्याओं को सरकार के पास रखना
[घ] विपरीत सिद्धांत वाले दलों से गठबंधन करना
Q25: दल-बदल कानून निम्नलिखित में से किस पर लागू होता है ?
[क] सांसदों एवं विधायकों पर
[ख] राष्ट्रपति पर
[ग] उपराष्ट्रपति पर
[घ] उपर्युक्त में से सभी पर
Q26: राजनीतिक दलों की मान्यता और उनका चुनाव चिह्न कौन प्रदान करता है ?
[क] राष्ट्रपति सचिवालय
[ख] प्रधानमंत्री सचिवालय
[ग] निर्वाचन आयोग
[घ] संसद
Q27: निम्नलिखित में से कौन राष्ट्रीय दल नहीं है ?
[क] राष्ट्रीय जनता दल
[ख] बहुजन समाज पार्टी
[ग] लोक जनशक्ति पार्टी
[घ] भारतीय जनता पार्टी
Q28: जनता दल (यूनाइटेड) पार्टी का गठन कब हुआ ?
[क] 1992 में
[ख] 1999 में
[ग] 2000 में
[घ] 2004 में

II. (i) मिलान करें -

मिलन करने वाले प्रश्नों में उसका सही उत्तर उस प्रश्न के सामने ही दिया गया है।
सूची I सूची II
1. समाजवादी पार्टी साइकिल
2. राजद लालटेन
3. लोजपा बंगला
4. जे०डी०यू० तीर

(ii) मिलान करें -

मिलन करने वाले प्रश्नों में उसका सही उत्तर उस प्रश्न के सामने ही दिया गया है।
सूची I सूची II
1. काँग्रेस पार्टी यू० पी० ए०
2. भारतीय जनता पार्टी एनडीए
3. कम्युनिस्ट पार्टी थार्ड फ्रन्ट
4. झारखंड मुक्ति मोर्चा क्षेत्रीय पार्टी

बिहार बोर्ड कक्षा 10 राजनीति विज्ञान अध्याय 3: लोकतंत्र में प्रतिस्पर्धा एवं संघर्ष का विस्तृत समाधान ।

लघु उत्तरीय प्रश्न (Short-Answer Question)

Q1: बिहार में हुए ‘छात्र आंदोलन’ के प्रमुख कारण क्या थे ?
उत्तर : बिहार में 1974 के दौरान हुए छात्र आंदोलन के मुख्य कारणों में बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और आवश्यक वस्तुओं की भारी कमी प्रमुख थी। राज्य में व्याप्त कुशासन और केंद्र सरकार की गलत नीतियों से त्रस्त होकर बिहार के छात्रों ने जयप्रकाश नारायण से इस आंदोलन के नेतृत्व का आग्रह किया। यह आंदोलन केवल सत्ता परिवर्तन के लिए नहीं बल्कि संपूर्ण सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था में बुनियादी सुधार लाने के उद्देश्य से शुरू हुआ था।
Q2: ‘चिपको आंदोलन’ का मुख्य उद्देश्य क्या थे ?
उत्तर : चिपको आंदोलन का मुख्य उद्देश्य हिमालयी क्षेत्रों में वनों की अंधाधुंध कटाई को रोकना और पर्यावरण का संरक्षण करना था। इस आंदोलन के माध्यम से स्थानीय ग्रामीणों, विशेषकर महिलाओं ने पेड़ों से चिपककर उन्हें ठेकेदारों की कुल्हाड़ियों से बचाया था। इसका एक अन्य महत्वपूर्ण उद्देश्य पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखना और स्थानीय समुदायों का वन संपदा पर अधिकार सुनिश्चित करना था ताकि प्राकृतिक संसाधनों का विनाश रोका जा सके।
Q3: स्वतंत्र राजनीतिक संगठन कौन होता है ?
उत्तर : स्वतंत्र राजनीतिक संगठन वे समूह होते हैं जो सत्ता के प्रत्यक्ष नियंत्रण से बाहर रहकर कार्य करते हैं। ये संगठन किसी विशिष्ट राजनीतिक दल का हिस्सा नहीं होते, बल्कि समाज के किसी विशेष वर्ग या सामान्य हितों की रक्षा के लिए सरकार पर दबाव बनाते हैं। इन्हें अक्सर दबाव समूह या आंदोलनकारी संगठन कहा जाता है। इनका मुख्य उद्देश्य चुनावी राजनीति में भाग लिए बिना सार्वजनिक नीतियों को प्रभावित करना और सामाजिक सुधार लाना होता है। ये लोकतंत्र में जनता की आवाज को मुखर करने का एक सशक्त माध्यम माने जाते हैं।
Q4: भारतीय किसान यूनियन की मुख्य माँगें क्या थीं ?
उत्तर : भारतीय किसान यूनियन ने अस्सी के दशक में किसानों के हितों के लिए कई महत्वपूर्ण माँगें रखी थीं। उनकी मुख्य माँगों में गन्ने और गेहूँ के सरकारी खरीद मूल्य में उचित वृद्धि करना, कृषि उत्पादों के अंतर्राज्यीय आवाजाही पर लगे प्रतिबंधों को पूरी तरह समाप्त करना तथा खेती के लिए बिजली की निर्बाध और सस्ती आपूर्ति सुनिश्चित करना शामिल था। इसके अतिरिक्त, यूनियन ने किसानों के बकाये कर्जों को माफ करने और वृद्ध किसानों की आर्थिक सुरक्षा के लिए पेंशन योजना लागू करने की भी पुरजोर वकालत की थी।
Q5: सूचना के अधिकार आंदोलन के मुख्य उद्देश्य क्या थे ?
उत्तर : सूचना के अधिकार आंदोलन का मुख्य उद्देश्य सरकारी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लाना और शासन में व्याप्त भ्रष्टाचार को समाप्त करना था। इस आंदोलन के जरिए नागरिक यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि विकास कार्यों के लिए आवंटित धन का सही उपयोग हो। इसका एक बड़ा लक्ष्य सरकारी तंत्र को जनता के प्रति अधिक जवाबदेह बनाना और लोकतंत्र में आम आदमी की भागीदारी को सशक्त करना था ताकि सत्ता पर जनता का नियंत्रण बना रहे।
Q6: राजनीतिक दल की परिभाषा दें ।
उत्तर : राजनीतिक दल लोगों के एक ऐसे संगठित समूह को कहते हैं जो समान राजनीतिक विचारधारा रखते हैं और चुनाव लड़ने तथा सरकार में राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने के उद्देश्य से एक साथ आते हैं। ये दल समाज के सामूहिक हित को ध्यान में रखते हुए कुछ विशेष नीतियों और कार्यक्रमों का निर्धारण करते हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक दल जनता की समस्याओं को सरकार तक पहुँचाने और लोकमत के निर्माण में एक अनिवार्य माध्यम के रूप में कार्य करते हैं।
Q7: किस आधार पर आप कह सकते हैं कि राजनीतिक दल जनता एवं सरकार के बीच कड़ी का काम करता है ?
उत्तर : राजनीतिक दल जनता और सरकार के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी या सेतु के रूप में कार्य करते हैं क्योंकि वे आम जनता की समस्याओं, आवश्यकताओं और उनकी मांगों को व्यवस्थित रूप से सरकार के समक्ष प्रस्तुत करते हैं। इसके विपरीत, सरकार द्वारा लागू की गई लोक-कल्याणकारी योजनाओं और नीतियों की विस्तृत जानकारी वे जनता तक पहुँचाकर उन्हें जागरूक बनाते हैं। इस प्रकार, वे शासन और सामान्य नागरिक के बीच निरंतर संवाद का मार्ग प्रशस्त कर लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करते हैं।
Q8: दलबदल कानून क्या है ?
उत्तर : भारत में दलबदल कानून निर्वाचित विधायकों और सांसदों को एक दल छोड़कर दूसरे दल में शामिल होने से रोकने के लिए बनाया गया है। यह कानून मुख्य रूप से राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित करने और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए 52वें संविधान संशोधन के माध्यम से 1985 में लागू किया गया था। यदि कोई सदस्य अपनी पार्टी के निर्देशों का उल्लंघन करता है या स्वेच्छा से पार्टी छोड़ता है, तो उसकी सदन की सदस्यता रद्द की जा सकती है। यह कानून अवसरवादी राजनीति और सरकार को अस्थिर करने की प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
Q9: राष्ट्रीय राजनीतिक दल किसे कहते हैं ?
उत्तर : राष्ट्रीय राजनीतिक दल वे दल हैं जिनका कार्यक्षेत्र और प्रभाव पूरे देश में होता है। भारत निर्वाचन आयोग के मानकों के अनुसार, यदि कोई दल लोकसभा चुनाव या कम से कम चार राज्यों के विधानसभा चुनाव में कुल वैध मतों का 6 प्रतिशत प्राप्त करता है और लोकसभा की कम से कम 4 सीटें जीतता है, तो उसे राष्ट्रीय दल की मान्यता प्राप्त होती है। इन दलों का अपना एक विशिष्ट और सुरक्षित चुनाव चिह्न होता है जिसे पूरे देश में केवल उसी दल के उम्मीदवार उपयोग कर सकते हैं, जैसे भारतीय जनता पार्टी या भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस।

बिहार बोर्ड कक्षा 10 राजनीति विज्ञान अध्याय 3: लोकतंत्र में प्रतिस्पर्धा एवं संघर्ष का विस्तृत समाधान ।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long-Answer Questions)

Q1: जनसंघर्ष से भी लोकतंत्र मजबूत होता है। क्या आप इस कथन से सहमत हैं ? अपने पक्ष में उत्तर दें।
उत्तर : यह कहना पूरी तरह सत्य है कि जनसंघर्ष से लोकतंत्र मजबूत होता है। लोकतंत्र के विकास की कहानी संघर्षों की कहानी रही है। लोकतंत्र कोई जड़ वस्तु नहीं है, बल्कि यह निरंतर विकासशील रहने वाली एक गतिशील व्यवस्था है। जब भी शासन व्यवस्था में विसंगतियाँ उत्पन्न होती हैं या जनता के अधिकारों का हनन होता है, तब जनसंघर्ष ही वह मुख्य उपकरण बनता है जो लोकतंत्र को पुनः उसकी पटरी पर लाता है। बिहार बोर्ड की पाठ्यपुस्तकों के अनुसार, लोकतंत्र के इतिहास में अधिकांश महत्वपूर्ण निर्णय आम जनता के व्यापक आंदोलनों और संघर्षों के माध्यम से ही लिए गए हैं, जिससे शासन में जनता की हिस्सेदारी और अधिक बढ़ी है।

लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनर्स्थापना और जवाबदेही : जनसंघर्ष सरकार को उसकी जवाबदेही और उत्तरदायित्व का बोध कराते हैं। जब सत्ताधारी दल जनता की इच्छाओं के विरुद्ध कार्य करने लगते हैं, तो जन आंदोलन उन्हें यह अहसास दिलाते हैं कि अंतिम शक्ति जनता के हाथों में ही निहित है। उदाहरण के तौर पर, नेपाल में लोकतंत्र की बहाली के लिए हुआ ऐतिहासिक आंदोलन या बोलीविया का जल-संघर्ष यह स्पष्ट करता है कि जब लोग संगठित होकर अपनी माँगों के लिए खड़े होते हैं, तो वे निरंकुश से निरंकुश शासन को भी झुकने पर मजबूर कर देते हैं। ये संघर्ष केवल विरोध का तरीका मात्र नहीं हैं, बल्कि ये लोकतंत्र की नींव को और अधिक गहरा और मजबूत बनाने की प्रक्रिया हैं।

सत्ता के दुरुपयोग पर अंकुश और समावेशिता : जनसंघर्ष लोकतंत्र में समावेशी राजनीति को बढ़ावा देते हैं। समाज के वे वर्ग जो अक्सर मुख्यधारा की राजनीति में उपेक्षित रह जाते हैं, वे आंदोलनों के माध्यम से अपनी आवाज शासन तक पहुँचाते हैं। इससे सत्ता का विकेंद्रीकरण होता है और यह सुनिश्चित होता है कि विकास का लाभ केवल कुछ प्रभावशाली लोगों तक ही सीमित न रहे। संघर्षों के माध्यम से जब हाशिए पर खड़े लोग अपनी माँग रखते हैं, तो इससे लोकतंत्र का आधार व्यापक होता है। यह सरकारों को बाध्य करता है कि वे ऐसी नीतियाँ बनाएँ जो समाज के हर वर्ग के लिए कल्याणकारी हों, जिससे व्यवस्था में जनता का विश्वास और अधिक बढ़ता है।

राजनीतिक चेतना और सक्रिय नागरिकता : लोकतंत्र की मजबूती के लिए नागरिकों का जागरूक होना अनिवार्य है। जनसंघर्ष लोगों में राजनीतिक चेतना जागृत करते हैं और उन्हें अपने अधिकारों तथा कर्तव्यों के प्रति सचेत बनाते हैं। जब लोग सामूहिक रूप से किसी समस्या के समाधान के लिए संघर्ष करते हैं, तो उनमें नेतृत्व क्षमता और संगठनात्मक कौशल का विकास होता है। इस प्रकार की सक्रिय नागरिकता ही एक स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है। अंततः, जनसंघर्ष लोकतंत्र के लिए कोई खतरा नहीं, बल्कि इसे सुरक्षित रखने वाला सुरक्षा कवच (Safety Valve) है, जो समाज के असंतोष को एक रचनात्मक दिशा प्रदान कर देश के लोकतांत्रिक ढांचे को और अधिक सुदृढ़ बनाता है।
Q2: किस आधार पर आप कह सकते हैं कि बिहार से शुरू हुआ छात्र आंदोलन का स्वरूप राष्ट्रीय हो गया।
उत्तर : बिहार में 1974 के छात्र आंदोलन की शुरुआत मुख्य रूप से बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, खाद्यान्न की कमी और आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमतों के विरोध में हुई थी। प्रारंभ में यह केवल छात्रों तक सीमित था, लेकिन जब छात्रों ने जयप्रकाश नारायण (जे.पी.) को इस आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए आमंत्रित किया, तो इसकी दिशा और स्वरूप पूरी तरह बदल गए। जे.पी. ने नेतृत्व स्वीकार करने के लिए यह शर्त रखी कि आंदोलन पूरी तरह अहिंसक होगा और यह केवल बिहार तक सीमित न रहकर अखिल भारतीय स्तर पर फैलाया जाएगा। उनके इस आह्वान के साथ ही बिहार का स्थानीय आंदोलन एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन में बदल गया, जिसने केंद्र की तत्कालीन कांग्रेस सरकार की नींव हिला दी।

संपूर्ण क्रांति का आह्वान और विपक्षी दलों का समर्थन : आंदोलन के स्वरूप को राष्ट्रीय बनाने में जयप्रकाश नारायण द्वारा दिए गए संपूर्ण क्रांति के नारे की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह संघर्ष केवल सत्ता परिवर्तन के लिए नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र को भ्रष्टाचार मुक्त करने और समाज के अंतिम व्यक्ति तक लाभ पहुँचाने के लिए है। इस विचार ने पूरे उत्तर भारत के युवाओं और आम नागरिकों को प्रभावित किया। इसी समय देश के प्रमुख गैर-कांग्रेसी दल जैसे भारतीय जनसंघ, भारतीय लोकदल, और सोशलिस्ट पार्टी ने जे.पी. के नेतृत्व को स्वीकार कर लिया और उनके साथ जुड़ गए। इससे यह आंदोलन छात्र आंदोलन की परिधि से बाहर निकलकर एक व्यापक राजनैतिक विकल्प के रूप में उभरा। रेलवे कर्मचारियों की देशव्यापी हड़ताल और विभिन्न राज्यों में छात्र संगठनों के उभार ने इसे पूरी तरह से राष्ट्रीय रंग में रंग दिया।

आपातकाल और राष्ट्रीय राजनीति पर प्रभाव : जून 1975 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा इंदिरा गांधी के निर्वाचन को अवैध घोषित किए जाने के बाद, जयप्रकाश नारायण ने दिल्ली के रामलीला मैदान में एक विशाल रैली का आयोजन किया और प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग की। उन्होंने पुलिस और सेना से भी सरकार के असंवैधानिक आदेशों को न मानने की अपील की। इस घटनाक्रम ने आंदोलन को अपने चरम पर पहुँचा दिया, जिसके जवाब में केंद्र सरकार ने 25 जून 1975 की आधी रात को देश में आपातकाल की घोषणा कर दी। आपातकाल के दौरान विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी और दमन ने जनता के भीतर लोकतंत्र की रक्षा के लिए एक नई चेतना पैदा की।

आंदोलन का परिणाम और जनता पार्टी का उदय : आपातकाल की समाप्ति के बाद जब 1977 में लोकसभा चुनाव हुए, तो बिहार आंदोलन से उपजी ऊर्जा और विपक्षी दलों के विलय के कारण जनता पार्टी का गठन हुआ। इस चुनाव में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा और केंद्र में पहली बार एक गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। इस प्रकार, बिहार के छात्रों द्वारा शुरू किया गया एक स्थानीय विरोध प्रदर्शन, जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में एक ऐसे राष्ट्रीय आंदोलन में बदल गया जिसने न केवल देश की सत्ता बदली, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की जड़ों को और अधिक मजबूत किया। यही कारण है कि बिहार छात्र आंदोलन को भारतीय राजनीति के इतिहास में एक युगांतरकारी घटना माना जाता है।
Q3: निम्नलिखित वक्तव्यों को पढ़ें और अपने पक्ष में उत्तर दें-
(क) क्षेत्रीय भावना लोकतंत्र को मजबूत करती है।
(ख) दबाव समूह स्वार्थी तत्त्वों का समूह है। इसीलिए इसे समाप्त कर देना चाहिए।
(ग) जनसंघर्ष लोकतंत्र का विरोधी है।
(घ) भारत में लोकतंत्र के लिए हुए आंदोलनों में महिलाओं की भूमिका नगण्य है।
उत्तर : (क) क्षेत्रीय भावना को अक्सर लोकतंत्र के लिए खतरा माना जाता है, परंतु वास्तविकता यह है कि क्षेत्रीय आकांक्षाएँ लोकतंत्र को अधिक समावेशी और मजबूत बनाती हैं। जब किसी विशेष क्षेत्र के लोग अपनी भाषा, संस्कृति और विकास के लिए आवाज उठाते हैं, तो यह सत्ता के विकेंद्रीकरण को बढ़ावा देता है। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में क्षेत्रीय दलों और भावनाओं ने स्थानीय समस्याओं को राष्ट्रीय पटल पर लाने का कार्य किया है। इससे शासन में समाज के हर वर्ग और क्षेत्र की भागीदारी सुनिश्चित होती है, जो अंततः लोकतंत्र की जड़ों को गहरा करती है। यदि क्षेत्रीय भावनाओं का सम्मान किया जाए और उन्हें संवैधानिक दायरे में जगह दी जाए, तो यह राष्ट्र की एकता और अखंडता को कमजोर करने के बजाय उसे और अधिक लचीला तथा सुदृढ़ बनाती है।

(ख) दबाव समूहों को स्वार्थी तत्वों का समूह मानकर उन्हें समाप्त करने का विचार लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध है। लोकतंत्र में केवल चुनाव जीतना ही भागीदारी नहीं है, बल्कि सरकार के निर्णयों को प्रभावित करना भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। दबाव समूह समाज के विभिन्न वर्गों जैसे किसानों, मजदूरों, और शिक्षकों के हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये समूह सरकार को किसी एक विशेष वर्ग के पक्ष में झुकने से रोकते हैं और सत्ता के संतुलन को बनाए रखते हैं। ये समूह जनमत का निर्माण करते हैं और सरकार को जनता की जरूरतों के प्रति जागरूक रखते हैं। इसलिए, दबाव समूहों को स्वार्थी कहना गलत होगा, क्योंकि वे लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामूहिक हितों की रक्षा के अनिवार्य साधन हैं।

(ग) जनसंघर्ष को लोकतंत्र का विरोधी मानना एक भ्रामक धारणा है क्योंकि जनसंघर्ष वास्तव में लोकतंत्र की आत्मा है। लोकतंत्र का विकास और विस्तार हमेशा जन आंदोलनों और संघर्षों के माध्यम से ही हुआ है। जब संस्थागत माध्यम जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने में विफल हो जाते हैं, तब जनसंघर्ष ही वह माध्यम बनता है जिसके द्वारा सत्ता को जनहित में निर्णय लेने के लिए बाध्य किया जाता है। भारत में सूचना का अधिकार, लोकपाल की नियुक्ति और विभिन्न सामाजिक सुधार जनसंघर्षों के ही परिणाम हैं। ये आंदोलन लोकतंत्र को अधिक पारदर्शी, उत्तरदायी और सक्रिय बनाते हैं। अतः जनसंघर्ष लोकतंत्र को कमजोर नहीं, बल्कि उसे और अधिक जीवंत और जन-केंद्रित बनाने का कार्य करते हैं।

(घ) भारत में लोकतांत्रिक आंदोलनों में महिलाओं की भूमिका को नगण्य बताना ऐतिहासिक और सामाजिक तथ्यों के पूर्णतः विपरीत है। भारतीय राजनीति और समाज सुधार के आंदोलनों में महिलाओं ने सदैव अग्रणी भूमिका निभाई है। चिपको आंदोलन में पेड़ों को बचाने के लिए महिलाओं का साहस हो या आंध्र प्रदेश का ताड़ी विरोधी आंदोलन, महिलाओं ने अपनी सामूहिक शक्ति से बड़े बदलाव किए हैं। वर्तमान समय में भी स्थानीय स्वशासन और विभिन्न सामाजिक-आर्थिक आंदोलनों में महिलाओं की भागीदारी निरंतर बढ़ रही है। बिहार जैसे राज्यों में शराबबंदी की मांग हो या शिक्षा और स्वास्थ्य के अधिकार के लिए संघर्ष, महिलाएँ आंदोलनों के केंद्र में रही हैं। अतः यह स्पष्ट है कि महिलाओं की सक्रियता के बिना भारतीय लोकतंत्र की सफलता की कल्पना करना असंभव है।
Q4: राजनीतिक दल को “लोकतंत्र का प्राण” क्यों कहा जाता है ?
उत्तर : राजनीतिक दलों को लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ माना जाता है। इनके अभाव में लोकतांत्रिक व्यवस्था के संचालन की कल्पना करना भी असंभव है, यही कारण है कि इन्हें लोकतंत्र का प्राण कहा जाता है। राजनीतिक दल समान विचारधारा वाले व्यक्तियों का एक ऐसा संगठित समूह होते हैं जो संवैधानिक माध्यमों से सत्ता प्राप्त करने और अपनी नीतियों को लागू करने का प्रयास करते हैं। लोकतंत्र में ये दल जनता की आकांक्षाओं को स्वर देते हैं और शासन को जन-अभिमुख बनाने का निरंतर प्रयास करते हैं।

जनमत का निर्माण और प्रतिनिधित्व राजनीतिक दल देश की विभिन्न जटिल समस्याओं को सरल बनाकर जनता के समक्ष प्रस्तुत करते हैं, जिससे जनमत का निर्माण होता है। लोकतंत्र में जनता अपनी राय सीधे शासन तक नहीं पहुँचा सकती, इसलिए राजनीतिक दल नागरिकों की समस्याओं, माँगों और आवश्यकताओं को संकलित कर उन्हें सरकार के मंच तक पहुँचाते हैं। ये दल समाज के विभिन्न वर्गों और हितों के बीच एक समन्वयकारी भूमिका निभाते हैं, जिससे शासन व्यवस्था में समावेशिता बनी रहती है। जब तक राजनीतिक दल सक्रिय नहीं होंगे, तब तक आम नागरिक देश की व्यापक नीतियों और शासन प्रक्रिया में अपनी प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित नहीं कर पाएगा।

सरकार का गठन और संचालन : लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में चुनाव एक अनिवार्य प्रक्रिया है और राजनीतिक दल इस प्रक्रिया के केंद्र में होते हैं। चुनाव के समय राजनीतिक दल अपने प्रत्याशियों को मैदान में उतारते हैं और अपनी नीतियों एवं कार्यक्रमों का प्रचार-प्रसार करते हैं। जिस दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त होता है, वह सरकार का गठन करता है और देश के शासन का संचालन करता है। सत्ताधारी दल अपनी विचारधारा के अनुसार कानून बनाता है और विकास की योजनाओं को लागू करता है। यदि राजनीतिक दल न हों, तो प्रत्येक उम्मीदवार स्वतंत्र होगा और ऐसी स्थिति में न तो कोई स्थिर सरकार बन पाएगी और न ही सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित होगी।

विपक्ष की भूमिका और नियंत्रण : लोकतंत्र की सफलता के लिए केवल सत्ताधारी दल ही नहीं, बल्कि विपक्ष का होना भी अत्यंत आवश्यक है। जो दल चुनाव में बहुमत प्राप्त नहीं कर पाते, वे विपक्ष की भूमिका निभाते हुए सरकार की त्रुटियों और जनविरोधी नीतियों की आलोचना करते हैं। यह आलोचना सरकार को निरंकुश होने से रोकती है और उसे जनता के प्रति उत्तरदायी बनाए रखती है। राजनीतिक दल ही वह माध्यम हैं जो शासन को पारदर्शी बनाते हैं और नागरिकों को उनके अधिकारों तथा सरकारी कामकाज के प्रति जागरूक करते हैं।

शासन और जनता के बीच सेतु का कार्य : राजनीतिक दल आम जनता और सरकारी मशीनरी के बीच एक मजबूत सेतु के रूप में कार्य करते हैं। एक साधारण नागरिक के लिए किसी उच्च सरकारी अधिकारी के पास जाना कठिन हो सकता है, लेकिन वह अपने स्थानीय दल के कार्यकर्ता या नेता के माध्यम से अपनी समस्याओं को सरकार तक आसानी से पहुँचा सकता है। राजनीतिक दल सरकारी कल्याणकारी योजनाओं को धरातल पर उतारने और लोगों को उनका लाभ दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अंततः, राजनीतिक दल देश की राजनीतिक संस्कृति को जीवंत रखते हैं और लोकतंत्र को क्रियाशील बनाते हैं, जिसके बिना पूरी लोकतांत्रिक संरचना निष्प्राण हो जाएगी।
Q5: राजनीतिक दल राष्ट्रीय विकास में किसी प्रकार योगदान करते हैं।
उत्तर : लोकतंत्र में राजनीतिक दल को लोकतंत्र का प्राण माना जाता है क्योंकि वे जनता और सरकार के बीच एक सेतु का कार्य करते हैं। किसी भी देश के सर्वांगीण और राष्ट्रीय विकास के लिए राजनीतिक दलों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। वे केवल चुनाव लड़ने वाली संस्थाएं नहीं हैं, बल्कि वे देश की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक दिशा तय करने वाले मुख्य कारक होते हैं। जब कोई राजनीतिक दल सत्ता में आता है, तो वह अपनी विचारधारा और चुनावी घोषणापत्र के अनुसार ऐसी नीतियां बनाता है जो सीधे तौर पर देश की प्रगति और लोक कल्याण से जुड़ी होती हैं।

जनमत का निर्माण और नीति निर्धारण : राजनीतिक दल देश की प्रमुख समस्याओं को जनता के सामने रखते हैं और उन पर जनमत का निर्माण करते हैं। वे नागरिकों को जागरूक करते हैं कि राष्ट्र के विकास के लिए कौन से मुद्दे जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी और आधारभूत संरचना सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं। जब ये दल सत्ता में पहुँचते हैं, तो वे इन मुद्दों को कानूनी जामा पहनाते हैं और विकास की योजनाएं तैयार करते हैं। भारत जैसे विकासशील देश में पंचवर्षीय योजनाओं से लेकर वर्तमान की कल्याणकारी योजनाओं तक का श्रेय राजनीतिक दलों की दूरदर्शिता और उनकी विकासपरक सोच को जाता है।

राजनीतिक स्थिरता और कुशल प्रशासन : राष्ट्रीय विकास के लिए देश में राजनीतिक स्थिरता का होना अनिवार्य है। राजनीतिक दल एक संगठित इकाई के रूप में सरकार को स्थिरता प्रदान करते हैं, जिससे विकास कार्य निरंतर चलते रहते हैं। यदि राजनीतिक दल न हों, तो प्रत्येक प्रतिनिधि स्वतंत्र होगा और सरकार की नीतियों में एकरूपता का अभाव होगा, जिससे प्रशासनिक अराजकता फैल सकती है। दलगत अनुशासन के कारण ही सरकार अपनी दीर्घकालिक योजनाओं को सफलतापूर्वक लागू कर पाती है। इसके अतिरिक्त, राजनीतिक दल कुशल प्रशासन के लिए योग्य नेताओं का चयन और प्रशिक्षण भी करते हैं जो देश के भविष्य को संवारने में सहायक होते हैं।

सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता : भारत जैसे विविधताओं वाले देश में राष्ट्रीय एकता और सामाजिक सद्भाव विकास की पहली शर्त है। राजनीतिक दल विभिन्न जातियों, धर्मों और क्षेत्रों के हितों को एक मंच पर लाने का प्रयास करते हैं। वे क्षेत्रीय आकांक्षाओं और राष्ट्रीय हितों के बीच संतुलन बनाए रखते हैं। जब समाज के सभी वर्गों का विकास के मुख्यधारा में समावेश होता है, तभी वास्तविक राष्ट्रीय विकास संभव हो पाता है। राजनीतिक दल विभिन्न वर्गों के बीच आपसी मतभेदों को लोकतांत्रिक तरीके से सुलझाकर देश में शांति बनाए रखते हैं, जो आर्थिक विकास के लिए एक आवश्यक परिवेश प्रदान करता है।

विपक्ष की रचनात्मक भूमिका : राष्ट्रीय विकास में केवल सत्ताधारी दल ही नहीं, बल्कि विपक्ष की भी अहम भूमिका होती है। एक सजग विपक्ष सरकार की गलत नीतियों और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाता है। वह सरकार को निरंकुश होने से रोकता है और उसे जनता के प्रति जवाबदेह बनाता है। जब विपक्ष सरकार की कमियों को उजागर करता है, तो सरकार को अपनी योजनाओं में सुधार करने के लिए बाध्य होना पड़ता है। यह प्रक्रिया सुनिश्चित करती है कि देश का संसाधन सही दिशा में और राष्ट्र के सर्वोत्तम हित में उपयोग हो रहा है। इस प्रकार, राजनीतिक दल प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में राष्ट्र को प्रगति के पथ पर अग्रसर करने में अपनी अनिवार्य भूमिका निभाते हैं।
Q6: राजनीतिक दलों के प्रमुख कार्य बताएँ।
उत्तर : लोकतंत्र में राजनीतिक दल एक अनिवार्य अंग के रूप में कार्य करते हैं, जिन्हें लोकतंत्र का प्राण भी कहा जाता है। राजनीतिक दल ऐसे व्यक्तियों का एक संगठित समूह होते हैं जिनके विचार एक समान होते हैं और जो संवैधानिक उपायों द्वारा सत्ता प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। बिहार बोर्ड की पाठ्यपुस्तकों के अनुसार, राजनीतिक दल जनता की इच्छाओं को संगठित कर उन्हें सरकार तक पहुँचाने का सबसे सशक्त माध्यम हैं। इनके बिना लोकतांत्रिक व्यवस्था का संचालन लगभग असंभव है क्योंकि ये नागरिकों को राजनीतिक विकल्प प्रदान करते हैं।

चुनाव लड़ना और सरकार का गठन : राजनीतिक दलों का सबसे प्रमुख और प्राथमिक कार्य चुनाव लड़ना है। किसी भी लोकतांत्रिक देश में चुनाव विभिन्न राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों के बीच लड़ा जाता है। दल अपने सबसे प्रभावशाली सदस्यों को उम्मीदवार के रूप में जनता के समक्ष पेश करते हैं। चुनाव जीतने के बाद, जिस दल को बहुमत प्राप्त होता है, वह सरकार का गठन करता है और अपनी विचारधारा के अनुसार शासन व्यवस्था का संचालन करता है। जो दल चुनाव हार जाते हैं, वे विपक्ष की भूमिका निभाते हैं और सरकार की गलत नीतियों की आलोचना कर उसे सही मार्ग पर रखने का प्रयास करते हैं।

नीतियों और कार्यक्रमों का निर्धारण : प्रत्येक राजनीतिक दल की अपनी एक विशेष विचारधारा और एजेंडा होता है। दल देश की विभिन्न समस्याओं जैसे आर्थिक विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा के समाधान हेतु अपनी नीतियों और कार्यक्रमों का निर्माण करते हैं। चुनाव के समय ये दल अपना घोषणापत्र जारी करते हैं, जिसमें वे जनता को बताते हैं कि सत्ता में आने पर वे कौन-कौन से कार्य करेंगे। मतदाता विभिन्न दलों की नीतियों की तुलना करते हैं और जो नीति उन्हें सबसे बेहतर लगती है, उसके पक्ष में मतदान करते हैं। इस प्रकार, राजनीतिक दल जनता को सामूहिक निर्णय लेने में सहायता प्रदान करते हैं।

जनमत का निर्माण और जागरूकता : राजनीतिक दल समाज में जनमत निर्माण का एक महत्वपूर्ण कार्य करते हैं। वे रैलियों, सभाओं, पदयात्राओं और संचार माध्यमों के जरिए देश की गंभीर समस्याओं को उठाते हैं और उन पर जनता का ध्यान आकर्षित करते हैं। इससे आम नागरिकों में राजनीतिक चेतना जागृत होती है और वे देश की शासन व्यवस्था के प्रति अधिक जागरूक बनते हैं। राजनीतिक दल समाज के विभिन्न वर्गों की मांगों को एकत्रित कर उन्हें एक राजनीतिक मंच प्रदान करते हैं, जिससे सरकार के लिए उन समस्याओं का समाधान करना आसान हो जाता है।

सरकार और जनता के बीच मध्यस्थता : राजनीतिक दल सरकार और जनता के बीच एक सेतु या कड़ी के रूप में कार्य करते हैं। आम नागरिक के लिए किसी सरकारी अधिकारी या मंत्री से सीधे संपर्क करना कठिन हो सकता है, लेकिन वह अपने स्थानीय दल के नेता के माध्यम से अपनी समस्याओं को सरकार तक आसानी से पहुँचा सकता है। इसी प्रकार, दल सरकार द्वारा चलाई जा रही विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी जनता तक पहुँचाते हैं और उन्हें इनका लाभ दिलाने में सहायता करते हैं। इस प्रकार, राजनीतिक दल शासन को जनता के प्रति जवाबदेह और संवेदनशील बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
Q7: राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय राजनीतिक दलों की मान्यता कौन प्रदान करते हैं और इसके मापदंड क्या हैं ?
उत्तर : भारत में राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय दल के रूप में मान्यता प्रदान करने का सर्वोच्च अधिकार भारत के निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) के पास है। निर्वाचन आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है जो ‘चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968’ के तहत दलों के चुनावी प्रदर्शन का मूल्यांकन करती है। किसी भी राजनीतिक दल को मिलने वाली यह मान्यता उसके द्वारा चुनावों में प्राप्त किए गए मतों के प्रतिशत और जीती गई सीटों की संख्या पर निर्भर करती है। यह दर्जा प्राप्त होने पर दलों को विशेष सुविधाएँ जैसे कि एक स्थायी चुनाव चिह्न, मतदाता सूची तक आसान पहुँच और सरकारी टेलीविजन तथा रेडियो पर प्रचार के लिए समय मिलता है।

राज्य स्तरीय दल की मान्यता के मापदंड : किसी राजनीतिक दल को राज्य स्तरीय या क्षेत्रीय दल के रूप में मान्यता प्राप्त करने के लिए निर्वाचन आयोग द्वारा निर्धारित कुछ अनिवार्य शर्तों में से किसी एक को पूरा करना होता है। मुख्य मापदंड के अनुसार, यदि कोई दल उस राज्य की विधानसभा के आम चुनाव में पड़े कुल वैध मतों का कम से कम 6 प्रतिशत प्राप्त करता है और इसके साथ ही उसी राज्य की विधानसभा में कम से कम दो सीटें जीतने में सफल रहता है, तो उसे राज्य स्तरीय दल घोषित कर दिया जाता है। इसके अतिरिक्त, यदि कोई दल राज्य विधानसभा की कुल सीटों का कम से कम 3 प्रतिशत या न्यूनतम 3 सीटें (जो भी अधिक हो) प्राप्त करता है, तो भी उसे क्षेत्रीय दल की श्रेणी में स्थान मिल जाता है। एक अन्य प्रावधान यह भी है कि यदि दल लोकसभा चुनाव में उस राज्य के लिए निर्धारित प्रत्येक 25 सीटों में से कम से कम 1 सीट जीतता है, तो भी उसे मान्यता दी जा सकती है।

राष्ट्रीय दल की मान्यता के मापदंड : राष्ट्रीय दल के रूप में मान्यता प्राप्त करना किसी भी राजनीतिक दल के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि इसका प्रभाव पूरे देश में होता है। निर्वाचन आयोग के नियमों के अनुसार, यदि कोई दल कम से कम चार अलग-अलग राज्यों में राज्य स्तरीय दल के रूप में पहले से मान्यता प्राप्त है, तो उसे राष्ट्रीय दल का दर्जा दे दिया जाता है। इसके अलावा, यदि कोई दल लोकसभा चुनाव अथवा चार या अधिक राज्यों के विधानसभा चुनाव में कुल वैध मतों का 6 प्रतिशत प्राप्त करता है और इसके साथ ही वह किसी भी राज्य या राज्यों से लोकसभा की कम से कम चार सीटें जीतने में कामयाब रहता है, तो उसे राष्ट्रीय दल के रूप में स्वीकार किया जाता है। एक तीसरा विकल्प यह है कि यदि कोई दल लोकसभा की कुल सीटों की 2 प्रतिशत सीटें (वर्तमान में कम से कम 11 सीटें) जीतता है और ये निर्वाचित सदस्य कम से कम तीन अलग-अलग राज्यों से होने चाहिए।

मान्यता का महत्व और लाभ : राजनीतिक दलों को मिलने वाली इस मान्यता का भारतीय लोकतंत्र में गहरा प्रभाव पड़ता है। मान्यता प्राप्त दलों को निर्वाचन आयोग द्वारा एक विशेष चुनाव चिह्न आवंटित किया जाता है, जो उनके लिए आरक्षित रहता है; अर्थात राष्ट्रीय दल का चिह्न पूरे भारत में और राज्य स्तरीय दल का चिह्न उस संबंधित राज्य में कोई दूसरा उम्मीदवार उपयोग नहीं कर सकता। इसके अतिरिक्त, इन दलों को चुनाव के समय नामांकन दाखिल करने के लिए केवल एक प्रस्तावक की आवश्यकता होती है और उन्हें चुनाव प्रचार के दौरान ‘स्टार प्रचारकों’ की सूची रखने की अनुमति मिलती है जिनका खर्च उम्मीदवार के व्यक्तिगत चुनावी खर्च में नहीं जोड़ा जाता। इस प्रकार, निर्वाचन आयोग की यह प्रक्रिया सुनिश्चित करती है कि केवल गंभीर और व्यापक जन-आधार वाले दल ही देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रभावी भूमिका निभा सकें।

Bihar Board 10th Polity Ex-3 Solution and Free PDF कैसे Download करें।

नीचे आप सभी को बिहार बोर्ड कक्षा 10 के राजनीति विज्ञान अध्याय 3 ‘लोकतंत्र में प्रतिस्पर्धा एवं संघर्ष’ के सभी प्रश्नों का PDF link दिया जा रहा है। जिसे आप सभी छात्र बिल्कुल मुफ्त में Download कर सकते हैं।
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क्रमांक अध्याय
1 लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी
2 सत्ता में साझेदारी की कार्यप्रणाली
4 लोकतंत्र की उपलब्धियाँ
5 लोकतंत्र की चुनौतियाँ

Bihar Board Class 10 के हमारे Exercise Solution कैसे तैयार किए गए हैं?

सारांश :

हम आशा करते हैं कि हमारे द्वारा तैयार किए गए Bihar Board 10th Polity Ex-3 Solution and Free PDF की यह सामग्री आपकी परीक्षा तैयारी में अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी।

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