Bihar Board 10th Polity Ex-5 Solution and Free PDF : राजनीति विज्ञान अध्याय 5 ' लोकतंत्र की चुनौतियाँ का विस्तृत समाधान
क्या आप बिहार बोर्ड कक्षा 10वीं की राजनीति विज्ञान की तैयारी कर रहे हैं? अगर पांचवाँ अध्याय, ‘ लोकतंत्र की चुनौतियाँ’, आपको थोड़ा मुश्किल लग रहा है, तो चिंता की कोई बात नहीं है।
हम बिहार बोर्ड कक्षा 10 राजनीति विज्ञान: अध्याय 5 – लोकतंत्र में प्रतिस्पर्धा एवं संघर्ष के समाधान को वस्तुनिष्ठ प्रश्नों (Objective Questions) और विषयनिष्ठ प्रश्नों (Subjective Questions) के साथ आसान, स्पष्ट और बिहार बोर्ड के नवीनतम पाठ्यक्रम पर आधारित लेकर आए हैं। यदि आप सभी छात्रों को किसी भी प्रश्न या किसी भी concept को लेकर संदेह है तो उनका सबका उत्तर नीचे दिया गया है।
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मैं निकेत कुमार, आपके लिए Bihar Board (BSEB) Class 10 के राजनीति विज्ञान सहित अन्य सभी विषयों के Exercise Solution और Notes सरल, स्पष्ट एवं बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के नवीनतम पाठ्यक्रम पर आधारित आसान भाषा में अपनी वेबसाइट BSEBsolution पर निःशुल्क उपलब्ध कराता हूँ।
यदि आप बिहार बोर्ड के छात्र हैं या बिहार बोर्ड के छात्रों को पढ़ाने वाले
शिक्षक/शिक्षिका हैं, तो हमारी वेबसाइट को नियमित रूप से विज़िट करते रहें।
नीचे आपको बिहार बोर्ड कक्षा 10 राजनीति विज्ञान अध्याय 5 ‘ लोकतंत्र की चुनौतियाँ’ के Free Exercise Solution and PDF दिए गया है।
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बिहार बोर्ड कक्षा 10 राजनीति विज्ञान अध्याय 5 : लोकतंत्र की चुनौतियाँ का विस्तृत समाधान ।
वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Question)
I. सही विकल्प चुनें ।
Q1: लोकतंत्र की सफलता निर्भर करती है —
[क] नागरिकों की उदासीनता पर
[ख] नागरिकों की गैर-कानूनी कार्रवाई पर
[ग] नागरिकों की विवेकपूर्ण सहभागिता पर
[घ] नागरिकों द्वारा अपनी जाति के हितों की रक्षा पर
✔ सही उत्तर: [ग] नागरिकों की विवेकपूर्ण सहभागिता पर
Q2: 15वीं लोकसभा चुनाव से पूर्व लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी थी —
[क] 10 प्रतिशत
[ख] 15 प्रतिशत
[ग] 33 प्रतिशत
[घ] 50 प्रतिशत
✔ सही उत्तर: [क] 10 प्रतिशत
Q3: लोकतंत्र की प्रसिद्ध परिभाषा किसने दी थी?
[क] अरस्तू
[ख] अब्राहम लिंकन
[ग] रूसो
[घ] ग्रीन
✔ सही उत्तर: [ख] अब्राहम लिंकन
Q4: नए विश्व सर्वेक्षण के आधार पर भारतवर्ष में मतदाताओं की संख्या है लगभग —
[क] 90 करोड़
[ख] 91 करोड़
[ग] 75 करोड़
[घ] इनमें से कोई नहीं
✔ सही उत्तर: [क] 90 करोड़
Q5: क्षेत्रवाद की भावना का एक कुपरिणाम है —
[क] अपने क्षेत्र से लगाव
[ख] राष्ट्रहित
[ग] राष्ट्रीय एकता
[घ] अलगाववाद
✔ सही उत्तर: [घ] अलगाववाद
II: रिक्त स्थानों की पूर्ति करें ।
1. भारतीय लोकतंत्र _________ लोकतंत्र है।
( प्रतिनिध्यात्मक /एकात्मक)
2. न्यायपालिका में __________ के प्रति निष्ठा होनी चाहिए । ( सत्य /हिंसा)
3. भारतीय राजनीति में महिलाओं को ____________ प्रतिशत आरक्षण देने की मांग की गई है। ( 33 प्रतिशत /15 प्रतिशत)
4. वर्तमान में नेपाल की शासन-प्रणाली _____________ है। ( लोकतंत्रात्मक /राजतंत्र)
5. 15वीं लोकसभा चुनाव में UPA द्वारा ____________ सीटों पर विजय प्राप्त की गई। ( 265 /543)
2. न्यायपालिका में __________ के प्रति निष्ठा होनी चाहिए । ( सत्य /हिंसा)
3. भारतीय राजनीति में महिलाओं को ____________ प्रतिशत आरक्षण देने की मांग की गई है। ( 33 प्रतिशत /15 प्रतिशत)
4. वर्तमान में नेपाल की शासन-प्रणाली _____________ है। ( लोकतंत्रात्मक /राजतंत्र)
5. 15वीं लोकसभा चुनाव में UPA द्वारा ____________ सीटों पर विजय प्राप्त की गई। ( 265 /543)
बिहार बोर्ड कक्षा 10 राजनीति विज्ञान अध्याय 5 : लोकतंत्र की चुनौतियाँ का विस्तृत समाधान ।
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short-Answer Questions)
Q1: लोकतंत्र जनता का, जनता के द्वारा तथा जनता के लिए शासन है। कैसे ?
उत्तर : लोकतंत्र में जनता स्वयं अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करती है जो लोक-कल्याण हेतु शासन चलाते हैं, इसीलिए इसे जनता का शासन कहते हैं।
Q2: केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच आपसी टकराव से लोकतंत्र कैसे प्रभावित होता है ?
उत्तर : केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच टकराव से विकास कार्य बाधित होते हैं, जिससे संघीय ढांचा कमजोर होता है और लोकतांत्रिक व्यवस्था में अस्थिरता आती है।
Q3: राजनीति में परिवारवाद का क्या अर्थ है ?
उत्तर : राजनीति में परिवारवाद का अर्थ है जब किसी दल की सत्ता और निर्णय लेने की शक्ति एक ही परिवार के पास केंद्रित रहती है।
Q4: आर्थिक अपराध का अर्थ स्पष्ट करें।
उत्तर : आर्थिक लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से किए गए गैर-कानूनी कार्य, जैसे धोखाधड़ी, जालसाजी या कर चोरी, आर्थिक अपराध कहलाते हैं।
Q5: सूचना का अधिकार कानून लोकतंत्र का रखवाला है, कैसे ?
उत्तर : सूचना का अधिकार कानून सरकारी कामकाज में पारदर्शिता लाकर भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाता है और नागरिकों को जागरूक बनाकर लोकतंत्र की रक्षा करता है।
बिहार बोर्ड कक्षा 10 राजनीति विज्ञान अध्याय 5 : लोकतंत्र की चुनौतियाँ का विस्तृत समाधान ।
लघु उत्तरीय प्रश्न (Short-Answer Question)
Q1: लोकतंत्र से क्या समझते हैं ?
उत्तर : लोकतंत्र एक ऐसी शासन प्रणाली है जिसमें शासन की सर्वोच्च सत्ता जनता के हाथों में निहित होती है। सुप्रसिद्ध अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन के शब्दों में, “लोकतंत्र जनता का, जनता के द्वारा तथा जनता के लिए शासन है।” इस व्यवस्था के अंतर्गत आम नागरिक चुनाव के माध्यम से अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं, जो उनके प्रति उत्तरदायी होते हैं। यह प्रणाली समानता, स्वतंत्रता और मानवीय अधिकारों की सुरक्षा पर आधारित विश्व की सबसे लोकप्रिय शासन पद्धति मानी जाती है।
Q2: गठबंधन की राजनीति कैसे लोकतंत्र को प्रभावित करती है ?
उत्तर : गठबंधन की राजनीति लोकतंत्र को गहरा प्रभावित करती है क्योंकि यह विभिन्न विचारधाराओं और क्षेत्रीय दलों को सत्ता में भागीदारी प्रदान कर शासन को अधिक समावेशी बनाती है। इससे समाज के विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व बढ़ता है और आपसी सहमति की संस्कृति विकसित होती है। हालांकि, कई बार वैचारिक मतभेदों और निजी स्वार्थों के कारण सरकार में अस्थिरता पैदा होती है, जिससे नीतिगत निर्णय लेने में देरी होती है और विकास की गति भी प्रभावित हो सकती है।
Q3: नेपाल में किस तरह की शासन व्यवस्था है ? लोकतंत्र की स्थापना में वहाँ क्या-क्या बाधाएँ हैं ?
उत्तर : र्तमान में नेपाल में संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य शासन व्यवस्था कायम है। यहाँ लोकतंत्र की स्थापना के मार्ग में कई बाधाएँ रही हैं, जिनमें राजतंत्र का लंबा प्रभाव, माओवादियों और सरकार के बीच सशस्त्र संघर्ष, तथा राजनीतिक दलों के बीच आपसी वैचारिक मतभेद प्रमुख रहे हैं। इसके अतिरिक्त, विविध जातीय समुदायों के हितों में संतुलन बैठाना और नए संविधान का निष्पक्ष कार्यान्वयन करना भी वहाँ के लोकतंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती रही है।
Q4: क्या शिक्षा का अभाव लोकतंत्र के लिए चुनौती है ?
उत्तर : हाँ, शिक्षा का अभाव लोकतंत्र के लिए एक अत्यंत गंभीर चुनौती है। एक सफल लोकतंत्र के लिए नागरिकों का जागरूक और शिक्षित होना अनिवार्य है। शिक्षा के बिना मतदाता अपने मौलिक अधिकारों और कर्तव्यों को सही ढंग से नहीं समझ पाते, जिससे वे अक्सर जाति, धर्म या अनुचित प्रलोभन के आधार पर मतदान करने लगते हैं। अशिक्षित नागरिक सरकार की गलत नीतियों का विरोध या सही मूल्यांकन करने में असमर्थ होते हैं, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया कमजोर होती है और स्वस्थ जनमत का निर्माण नहीं हो पाता है।
Q5: आतंकवाद लोकतंत्र की चुनौती है। कैसे ?
उत्तर : आतंकवाद लोकतंत्र के लिए एक गंभीर चुनौती है क्योंकि यह समाज में भय और असुरक्षा का माहौल पैदा करता है जिससे शांति व्यवस्था भंग होती है। यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर प्रहार करता है, जो लोकतंत्र का आधार हैं। आतंकवाद के कारण देश की एकता और अखंडता खतरे में पड़ जाती है और सरकार का ध्यान जन कल्याण से हटकर रक्षा कार्यों पर केंद्रित हो जाता है, जिससे विकास की गति धीमी हो जाती है।
बिहार बोर्ड कक्षा 10 राजनीति विज्ञान अध्याय 5 : लोकतंत्र की चुनौतियाँ का विस्तृत समाधान ।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long-Answer Questions)
Q1: वर्तमान भारतीय राजनीति में लोकतंत्र की कौन-कौन सी चुनौतियाँ हैं ? विवेचना करें ।
उत्तर : भारतीय लोकतंत्र विश्व का सबसे बड़ा और सफल लोकतंत्र माना जाता है, लेकिन वर्तमान समय में इसके समक्ष कई जटिल और गंभीर चुनौतियाँ विद्यमान हैं। बिहार बोर्ड की पाठ्यपुस्तकों के अनुसार, लोकतंत्र केवल शासन की एक पद्धति नहीं है बल्कि यह एक सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था भी है। वर्तमान भारतीय राजनीति में लोकतांत्रिक जड़ों को मजबूत करने के मार्ग में आने वाली बाधाएं अत्यंत गहरी हैं, जो न केवल शासन की गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं बल्कि देश की एकता और अखंडता पर भी असर डालती हैं।
जातिवाद और सांप्रदायिकता की चुनौती : भारतीय राजनीति में जातिवाद एक ऐसी चुनौती है जो चुनाव प्रक्रिया से लेकर सरकार के गठन तक को प्रभावित करती है। राजनीतिक दल अक्सर विकास के मुद्दों के बजाय जातीय समीकरणों के आधार पर टिकटों का वितरण करते हैं, जिससे समाज में विभाजन की स्थिति उत्पन्न होती है। इसी प्रकार, सांप्रदायिकता लोकतंत्र के लिए एक बड़ा खतरा बनी हुई है। जब राजनीति का आधार धर्म बन जाता है, तो इससे समाज में धार्मिक उन्माद और असुरक्षा की भावना पैदा होती है। यह स्थिति धर्मनिरपेक्षता के मूल सिद्धांतों पर प्रहार करती है और वास्तविक जनहित के मुद्दों जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य को हाशिए पर धकेल देती है।
राजनीति का अपराधीकरण और धन-बल वर्तमान दौर में राजनीति में अपराधीकरण की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है। अनेक उम्मीदवार अपने बाहुबल और धन के प्रभाव से चुनाव जीतने का प्रयास करते हैं, जिससे ईमानदार और समर्पित नागरिकों के लिए चुनावी राजनीति के द्वार बंद हो जाते हैं। धन-बल का अनियंत्रित उपयोग चुनावों को खर्चीला बना देता है, जिसके कारण सत्ता में आने के बाद प्रतिनिधि जनसेवा के बजाय अपने चुनावी खर्च की वसूली और भ्रष्टाचार में लिप्त हो जाते हैं। यह स्थिति लोकतंत्र की पारदर्शिता को नष्ट करती है और आम जनता का लोकतांत्रिक संस्थाओं से विश्वास कम कर देती है।
वंशवाद और परिवारवाद की समस्या : भारतीय राजनीतिक दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र का अभाव एक बड़ी चुनौती है। अधिकांश राजनीतिक दलों में निर्णय लेने की शक्ति और नेतृत्व का पद किसी एक विशेष परिवार के पास सुरक्षित रहता है, जिसे वंशवाद कहा जाता है। इसके कारण पार्टी के भीतर निष्ठावान और प्रतिभाशाली कार्यकर्ताओं को उच्च पदों पर पहुँचने का अवसर नहीं मिलता। वंशवाद की यह परंपरा लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत है, क्योंकि लोकतंत्र में योग्यता और जनसमर्थन को प्रधानता मिलनी चाहिए, न कि पारिवारिक विरासत को।
आर्थिक असमानता और क्षेत्रीय विषमता : लोकतंत्र की सफलता के लिए सामाजिक और आर्थिक समानता अनिवार्य है, लेकिन भारत में अमीर और गरीब के बीच की खाई निरंतर चौड़ी होती जा रही है। आर्थिक असमानता के कारण गरीब वर्ग की राजनीति में भागीदारी केवल मतदान तक सीमित रह जाती है। इसके साथ ही, क्षेत्रवाद की भावना भी एक बड़ी चुनौती है जहाँ कुछ विशेष क्षेत्रों के विकास को प्राथमिकता दी जाती है और अन्य को उपेक्षित छोड़ दिया जाता है। यह क्षेत्रीय असंतुलन अलगाववाद और असंतोष को जन्म देता है, जो राष्ट्रीय एकता के लिए बाधक सिद्ध होता है। इन सभी चुनौतियों का सामना करने के लिए जागरूक नागरिकता और राजनीतिक सुधारों की अत्यंत आवश्यकता है।
जातिवाद और सांप्रदायिकता की चुनौती : भारतीय राजनीति में जातिवाद एक ऐसी चुनौती है जो चुनाव प्रक्रिया से लेकर सरकार के गठन तक को प्रभावित करती है। राजनीतिक दल अक्सर विकास के मुद्दों के बजाय जातीय समीकरणों के आधार पर टिकटों का वितरण करते हैं, जिससे समाज में विभाजन की स्थिति उत्पन्न होती है। इसी प्रकार, सांप्रदायिकता लोकतंत्र के लिए एक बड़ा खतरा बनी हुई है। जब राजनीति का आधार धर्म बन जाता है, तो इससे समाज में धार्मिक उन्माद और असुरक्षा की भावना पैदा होती है। यह स्थिति धर्मनिरपेक्षता के मूल सिद्धांतों पर प्रहार करती है और वास्तविक जनहित के मुद्दों जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य को हाशिए पर धकेल देती है।
राजनीति का अपराधीकरण और धन-बल वर्तमान दौर में राजनीति में अपराधीकरण की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है। अनेक उम्मीदवार अपने बाहुबल और धन के प्रभाव से चुनाव जीतने का प्रयास करते हैं, जिससे ईमानदार और समर्पित नागरिकों के लिए चुनावी राजनीति के द्वार बंद हो जाते हैं। धन-बल का अनियंत्रित उपयोग चुनावों को खर्चीला बना देता है, जिसके कारण सत्ता में आने के बाद प्रतिनिधि जनसेवा के बजाय अपने चुनावी खर्च की वसूली और भ्रष्टाचार में लिप्त हो जाते हैं। यह स्थिति लोकतंत्र की पारदर्शिता को नष्ट करती है और आम जनता का लोकतांत्रिक संस्थाओं से विश्वास कम कर देती है।
वंशवाद और परिवारवाद की समस्या : भारतीय राजनीतिक दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र का अभाव एक बड़ी चुनौती है। अधिकांश राजनीतिक दलों में निर्णय लेने की शक्ति और नेतृत्व का पद किसी एक विशेष परिवार के पास सुरक्षित रहता है, जिसे वंशवाद कहा जाता है। इसके कारण पार्टी के भीतर निष्ठावान और प्रतिभाशाली कार्यकर्ताओं को उच्च पदों पर पहुँचने का अवसर नहीं मिलता। वंशवाद की यह परंपरा लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत है, क्योंकि लोकतंत्र में योग्यता और जनसमर्थन को प्रधानता मिलनी चाहिए, न कि पारिवारिक विरासत को।
आर्थिक असमानता और क्षेत्रीय विषमता : लोकतंत्र की सफलता के लिए सामाजिक और आर्थिक समानता अनिवार्य है, लेकिन भारत में अमीर और गरीब के बीच की खाई निरंतर चौड़ी होती जा रही है। आर्थिक असमानता के कारण गरीब वर्ग की राजनीति में भागीदारी केवल मतदान तक सीमित रह जाती है। इसके साथ ही, क्षेत्रवाद की भावना भी एक बड़ी चुनौती है जहाँ कुछ विशेष क्षेत्रों के विकास को प्राथमिकता दी जाती है और अन्य को उपेक्षित छोड़ दिया जाता है। यह क्षेत्रीय असंतुलन अलगाववाद और असंतोष को जन्म देता है, जो राष्ट्रीय एकता के लिए बाधक सिद्ध होता है। इन सभी चुनौतियों का सामना करने के लिए जागरूक नागरिकता और राजनीतिक सुधारों की अत्यंत आवश्यकता है।
Q2: बिहार की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी, लोकतंत्र के विकास में कहाँ तक सहायक है?
उत्तर : बिहार में महिला राजनीतिक भागीदारी की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
बिहार की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी का इतिहास अत्यंत प्रेरणादायक रहा है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से लेकर वर्तमान लोकतांत्रिक ढांचे तक, महिलाओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। हालांकि, स्वतंत्रता के शुरुआती दशकों में उनकी सक्रियता सीमित थी, लेकिन समय के साथ राजनीतिक चेतना के प्रसार ने उनकी भूमिका को नया विस्तार दिया है। लोकतंत्र की मजबूती के लिए आधी आबादी की भागीदारी अनिवार्य मानी जाती है, और बिहार ने इस दिशा में क्रांतिकारी कदम उठाते हुए महिलाओं को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास किया है।
पंचायती राज में 50 प्रतिशत आरक्षण का प्रभाव : बिहार देश का पहला ऐसा राज्य बना जिसने वर्ष 2006 में पंचायती राज संस्थाओं और नगर निकायों में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण का ऐतिहासिक प्रावधान किया। इस निर्णय ने ग्रामीण राजनीति की तस्वीर को पूरी तरह बदल दिया है। अब गांवों में मुखिया, सरपंच और अन्य महत्वपूर्ण पदों पर महिलाएं न केवल भारी संख्या में चुनकर आ रही हैं, बल्कि वे स्थानीय विकास की योजनाओं और निर्णय लेने की प्रक्रिया में भी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। इसने पुरुष प्रधान समाज की पारंपरिक सोच को कड़ी चुनौती दी है और स्थानीय स्तर पर सुशासन को बढ़ावा दिया है, जिससे लोकतंत्र का आधार जमीनी स्तर पर अत्यंत सुदृढ़ हुआ है।
सामाजिक और आर्थिक सशक्तीकरण के सूत्रधार के रूप में महिलाएं : राजनीति में महिलाओं के प्रवेश ने सामाजिक सुधारों की गति को तेज करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जब महिलाएं सत्ता और निर्णय लेने वाले पदों पर आती हैं, तो वे शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता और पेयजल जैसे बुनियादी मुद्दों को प्राथमिकता देती हैं। बिहार में शराबबंदी कानून जैसी बड़ी सामाजिक क्रांति की सफलता में महिलाओं की राजनीतिक मुखरता और संगठित शक्ति का सबसे बड़ा योगदान रहा है। इसके साथ ही, जीविका समूहों के माध्यम से महिलाओं ने जो आर्थिक आत्मनिर्भरता प्राप्त की है, उसने उनकी राजनीतिक आवाज को और अधिक वजनदार बनाया है, जिससे लोकतंत्र अधिक समावेशी बना है।
लोकतांत्रिक मूल्यों का सुदृढ़ीकरण और मतदान प्रतिशत में वृद्धि लोकतंत्र के विकास का सबसे बड़ा पैमाना जनता की सक्रिय भागीदारी है। पिछले कुछ विधानसभा और लोकसभा चुनावों के आंकड़े यह स्पष्ट करते हैं कि बिहार में महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों की तुलना में निरंतर बढ़ रहा है। महिलाएं अब केवल मूक दर्शक नहीं हैं, बल्कि वे एक निर्णायक राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरी हैं। महिलाओं की इस बढ़ती सक्रियता ने राजनीतिक दलों को अपने चुनावी घोषणापत्रों में महिला केंद्रित कल्याणकारी योजनाओं, जैसे ‘साइकिल योजना’ और ‘पोशाक योजना’, को प्रमुखता देने के लिए मजबूर किया है। इससे समाज के अंतिम पायदान पर खड़ी महिला तक लोकतंत्र की पहुँच सुनिश्चित हुई है।
चुनौतियां और भविष्य की राह : यद्यपि बिहार ने महिलाओं को राजनीतिक अवसर देने में अग्रणी भूमिका निभाई है, फिर भी कुछ व्यावहारिक चुनौतियां आज भी मौजूद हैं। राजनीति में पितृसत्तात्मक सोच और ‘मुखिया पति’ जैसी कुप्रथाएं कभी-कभी महिलाओं की वास्तविक शक्ति को बाधित करती हैं। इसके बावजूद, शिक्षा और जागरूकता के प्रसार से महिलाएं धीरे-धीरे इन बेड़ियों को तोड़ रही हैं। निष्कर्षतः, बिहार की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी ने न केवल लोकतंत्र को अधिक मानवीय और संवेदनशील बनाया है, बल्कि यह राज्य के समग्र विकास और न्यायपूर्ण समाज की स्थापना में सबसे प्रमुख स्तंभ के रूप में स्थापित हुई है।
पंचायती राज में 50 प्रतिशत आरक्षण का प्रभाव : बिहार देश का पहला ऐसा राज्य बना जिसने वर्ष 2006 में पंचायती राज संस्थाओं और नगर निकायों में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण का ऐतिहासिक प्रावधान किया। इस निर्णय ने ग्रामीण राजनीति की तस्वीर को पूरी तरह बदल दिया है। अब गांवों में मुखिया, सरपंच और अन्य महत्वपूर्ण पदों पर महिलाएं न केवल भारी संख्या में चुनकर आ रही हैं, बल्कि वे स्थानीय विकास की योजनाओं और निर्णय लेने की प्रक्रिया में भी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। इसने पुरुष प्रधान समाज की पारंपरिक सोच को कड़ी चुनौती दी है और स्थानीय स्तर पर सुशासन को बढ़ावा दिया है, जिससे लोकतंत्र का आधार जमीनी स्तर पर अत्यंत सुदृढ़ हुआ है।
सामाजिक और आर्थिक सशक्तीकरण के सूत्रधार के रूप में महिलाएं : राजनीति में महिलाओं के प्रवेश ने सामाजिक सुधारों की गति को तेज करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जब महिलाएं सत्ता और निर्णय लेने वाले पदों पर आती हैं, तो वे शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता और पेयजल जैसे बुनियादी मुद्दों को प्राथमिकता देती हैं। बिहार में शराबबंदी कानून जैसी बड़ी सामाजिक क्रांति की सफलता में महिलाओं की राजनीतिक मुखरता और संगठित शक्ति का सबसे बड़ा योगदान रहा है। इसके साथ ही, जीविका समूहों के माध्यम से महिलाओं ने जो आर्थिक आत्मनिर्भरता प्राप्त की है, उसने उनकी राजनीतिक आवाज को और अधिक वजनदार बनाया है, जिससे लोकतंत्र अधिक समावेशी बना है।
लोकतांत्रिक मूल्यों का सुदृढ़ीकरण और मतदान प्रतिशत में वृद्धि लोकतंत्र के विकास का सबसे बड़ा पैमाना जनता की सक्रिय भागीदारी है। पिछले कुछ विधानसभा और लोकसभा चुनावों के आंकड़े यह स्पष्ट करते हैं कि बिहार में महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों की तुलना में निरंतर बढ़ रहा है। महिलाएं अब केवल मूक दर्शक नहीं हैं, बल्कि वे एक निर्णायक राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरी हैं। महिलाओं की इस बढ़ती सक्रियता ने राजनीतिक दलों को अपने चुनावी घोषणापत्रों में महिला केंद्रित कल्याणकारी योजनाओं, जैसे ‘साइकिल योजना’ और ‘पोशाक योजना’, को प्रमुखता देने के लिए मजबूर किया है। इससे समाज के अंतिम पायदान पर खड़ी महिला तक लोकतंत्र की पहुँच सुनिश्चित हुई है।
चुनौतियां और भविष्य की राह : यद्यपि बिहार ने महिलाओं को राजनीतिक अवसर देने में अग्रणी भूमिका निभाई है, फिर भी कुछ व्यावहारिक चुनौतियां आज भी मौजूद हैं। राजनीति में पितृसत्तात्मक सोच और ‘मुखिया पति’ जैसी कुप्रथाएं कभी-कभी महिलाओं की वास्तविक शक्ति को बाधित करती हैं। इसके बावजूद, शिक्षा और जागरूकता के प्रसार से महिलाएं धीरे-धीरे इन बेड़ियों को तोड़ रही हैं। निष्कर्षतः, बिहार की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी ने न केवल लोकतंत्र को अधिक मानवीय और संवेदनशील बनाया है, बल्कि यह राज्य के समग्र विकास और न्यायपूर्ण समाज की स्थापना में सबसे प्रमुख स्तंभ के रूप में स्थापित हुई है।
Q3: परिवारवाद और जातिवाद बिहार में किस तरह लोकतंत्र को प्रभावित करता है ?
उत्तर : बिहार की राजनीति में जातिवाद एक ऐसी गहरी समस्या है जो लोकतंत्र की जड़ों को खोखला करती है। चुनाव के समय अक्सर देखा जाता है कि राजनीतिक दल उम्मीदवारों का चयन उनकी योग्यता या जनसेवा के आधार पर न करके, निर्वाचन क्षेत्र की जातीय संरचना के आधार पर करते हैं। इससे मतदाताओं के बीच भी वैचारिक विभाजन के बजाय जातीय ध्रुवीकरण हो जाता है, जहाँ लोग विकास और सुशासन जैसे मुद्दों को भूलकर अपनी जाति के उम्मीदवार को वोट देना अपना धर्म समझने लगते हैं। यह प्रवृत्ति वोट बैंक की राजनीति को बढ़ावा देती है, जिससे समाज में आपसी तनाव और विद्वेष पैदा होता है। जब जाति ही सत्ता प्राप्ति का मुख्य आधार बन जाती है, तो निर्वाचित प्रतिनिधि भी पूरे समाज के बजाय केवल अपनी जाति विशेष के हितों की रक्षा में लग जाते हैं, जो लोकतंत्र के समानता और समावेशिता के सिद्धांतों के विरुद्ध है।
परिवारवाद बिहार के लोकतंत्र के लिए एक और बड़ी चुनौती है, जिसने राजनीतिक दलों के आंतरिक ढांचे को प्रभावित किया है। बिहार में कई ऐसे प्रमुख राजनीतिक दल हैं जिनका नेतृत्व एक ही परिवार के हाथों में सिमटा हुआ है। इससे राजनीति एक पारिवारिक विरासत की तरह लगने लगती है, जहाँ सत्ता पिता से पुत्र या पुत्री को हस्तांतरित की जाती है। यह प्रक्रिया नए, कर्मठ और योग्य युवाओं के लिए राजनीति के द्वार बंद कर देती है, क्योंकि उनके पास किसी बड़े राजनीतिक घराने का समर्थन नहीं होता। परिवारवाद के कारण दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र समाप्त हो जाता है और सभी महत्वपूर्ण निर्णय एक ही परिवार की पसंद-नापसंद पर निर्भर करते हैं। यह स्थिति आम नागरिक के इस विश्वास को ठेस पहुँचाती है कि लोकतंत्र में एक साधारण व्यक्ति भी शीर्ष पद तक पहुँच सकता है।
जातिवाद और परिवारवाद का मिला-जुला प्रभाव बिहार के आर्थिक और सामाजिक विकास पर नकारात्मक रूप से पड़ता है। जब सत्ता का आधार योग्यता के स्थान पर जाति या परिवार होता है, तो प्रशासन में भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद का बोलबाला हो जाता है। संसाधनों का वितरण न्यायपूर्ण तरीके से न होकर राजनीतिक लाभ के लिए किया जाता है, जिससे राज्य में बुनियादी सुविधाओं जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की स्थिति दयनीय बनी रहती है। बिहार का युवा, जो अपनी प्रतिभा के लिए जाना जाता है, इस राजनीतिक माहौल के कारण पलायन करने को मजबूर होता है। लोकतंत्र में जनता का शासन होना चाहिए, लेकिन ये कुरीतियाँ इसे ‘खास परिवारों’ और ‘खास जातियों’ का शासन बना देती हैं, जिससे सामाजिक न्याय की मूल अवधारणा केवल एक चुनावी नारा बनकर रह जाती है।
लोकतंत्र को इन बुराइयों से मुक्त करने के लिए बिहार के नागरिकों में राजनैतिक चेतना का होना अनिवार्य है। मतदाताओं को जातिगत भावनाओं से ऊपर उठकर विकास कार्यों और नैतिकता के आधार पर अपना प्रतिनिधि चुनना चाहिए। इसके साथ ही, निर्वाचन आयोग और कानून द्वारा राजनीतिक दलों के भीतर चुनाव कराने और परिवारवाद को नियंत्रित करने के लिए सख्त नियम बनाए जाने चाहिए। जब तक बिहार की राजनीति में योग्यता और पारदर्शिता को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी, तब तक लोकतंत्र का वास्तविक लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुँच पाएगा। जाति और परिवार के बंधनों को तोड़कर ही बिहार एक विकसित और समृद्ध लोकतांत्रिक राज्य बन सकता है।
परिवारवाद बिहार के लोकतंत्र के लिए एक और बड़ी चुनौती है, जिसने राजनीतिक दलों के आंतरिक ढांचे को प्रभावित किया है। बिहार में कई ऐसे प्रमुख राजनीतिक दल हैं जिनका नेतृत्व एक ही परिवार के हाथों में सिमटा हुआ है। इससे राजनीति एक पारिवारिक विरासत की तरह लगने लगती है, जहाँ सत्ता पिता से पुत्र या पुत्री को हस्तांतरित की जाती है। यह प्रक्रिया नए, कर्मठ और योग्य युवाओं के लिए राजनीति के द्वार बंद कर देती है, क्योंकि उनके पास किसी बड़े राजनीतिक घराने का समर्थन नहीं होता। परिवारवाद के कारण दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र समाप्त हो जाता है और सभी महत्वपूर्ण निर्णय एक ही परिवार की पसंद-नापसंद पर निर्भर करते हैं। यह स्थिति आम नागरिक के इस विश्वास को ठेस पहुँचाती है कि लोकतंत्र में एक साधारण व्यक्ति भी शीर्ष पद तक पहुँच सकता है।
जातिवाद और परिवारवाद का मिला-जुला प्रभाव बिहार के आर्थिक और सामाजिक विकास पर नकारात्मक रूप से पड़ता है। जब सत्ता का आधार योग्यता के स्थान पर जाति या परिवार होता है, तो प्रशासन में भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद का बोलबाला हो जाता है। संसाधनों का वितरण न्यायपूर्ण तरीके से न होकर राजनीतिक लाभ के लिए किया जाता है, जिससे राज्य में बुनियादी सुविधाओं जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की स्थिति दयनीय बनी रहती है। बिहार का युवा, जो अपनी प्रतिभा के लिए जाना जाता है, इस राजनीतिक माहौल के कारण पलायन करने को मजबूर होता है। लोकतंत्र में जनता का शासन होना चाहिए, लेकिन ये कुरीतियाँ इसे ‘खास परिवारों’ और ‘खास जातियों’ का शासन बना देती हैं, जिससे सामाजिक न्याय की मूल अवधारणा केवल एक चुनावी नारा बनकर रह जाती है।
लोकतंत्र को इन बुराइयों से मुक्त करने के लिए बिहार के नागरिकों में राजनैतिक चेतना का होना अनिवार्य है। मतदाताओं को जातिगत भावनाओं से ऊपर उठकर विकास कार्यों और नैतिकता के आधार पर अपना प्रतिनिधि चुनना चाहिए। इसके साथ ही, निर्वाचन आयोग और कानून द्वारा राजनीतिक दलों के भीतर चुनाव कराने और परिवारवाद को नियंत्रित करने के लिए सख्त नियम बनाए जाने चाहिए। जब तक बिहार की राजनीति में योग्यता और पारदर्शिता को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी, तब तक लोकतंत्र का वास्तविक लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुँच पाएगा। जाति और परिवार के बंधनों को तोड़कर ही बिहार एक विकसित और समृद्ध लोकतांत्रिक राज्य बन सकता है।
Q4: क्या चुने हुए शासक लोकतंत्र में अपनी मर्जी से सब कुछ कर सकते हैं ?
उत्तर : लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव जीतना और सरकार बनाना नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी व्यवस्था है जहाँ शासकों की शक्तियाँ संविधान और कानून द्वारा सीमित होती हैं। एक लोकतांत्रिक देश में चुने हुए शासक अपनी मर्जी से सब कुछ नहीं कर सकते क्योंकि उन्हें संविधान की मूल सीमाओं के भीतर रहकर कार्य करना पड़ता है। लोकतंत्र में सरकार का गठन जनमत के आधार पर होता है, लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि शासक निरंकुश हो जाए। सरकार को न केवल बहुसंख्यक समाज की इच्छाओं का सम्मान करना होता है, बल्कि अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करना भी उसका संवैधानिक उत्तरदायित्व होता है। हर प्रमुख फैसला लेने से पहले शासकों को एक लंबी चर्चा और विचार-विमर्श की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, जिससे गलत निर्णयों की संभावना कम हो जाती है।
शासकों की मनमानी को रोकने के लिए लोकतंत्र में शक्तियों का बँटवारा किया जाता है। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका एक-दूसरे की शक्तियों पर नियंत्रण रखते हैं। यदि निर्वाचित सरकार कोई ऐसा कानून बनाती है जो संविधान की मूल भावना के विरुद्ध हो, तो न्यायपालिका उसे अवैध घोषित कर सकती है। इसके अतिरिक्त, सरकारी अधिकारियों और संस्थाओं की अपनी स्वायत्तता होती है, जो शासन को किसी व्यक्ति विशेष की इच्छा के बजाय नियमों के आधार पर चलाने के लिए बाध्य करती है। निर्वाचित शासक को प्रशासनिक अधिकारियों और विभिन्न संस्थाओं के साथ तालमेल बिठाकर ही शासन चलाना होता है, जिससे सत्ता के दुरुपयोग की गुंजाइश कम हो जाती है।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता नागरिकों को दिए गए मौलिक अधिकार हैं। चुने हुए शासक नागरिकों के इन अधिकारों का हनन नहीं कर सकते। प्रेस की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी और विरोध प्रदर्शन का अधिकार शासकों को अपनी मनमानी करने से रोकता है। शासक जनता के प्रति जवाबदेह होते हैं और उन्हें पता होता है कि यदि वे जनविरोधी कार्य करेंगे, तो अगले चुनाव में जनता उन्हें सत्ता से बेदखल कर देगी। इस प्रकार, चुनावी प्रतिस्पर्धा और जनमत का दबाव शासकों को मर्यादित व्यवहार करने के लिए विवश करता है। अंततः, लोकतंत्र में नियम और कानून सर्वोपरि होते हैं, व्यक्ति या शासक नहीं, जो इस व्यवस्था को तानाशाही से अलग और श्रेष्ठ बनाता है।
शासकों की मनमानी को रोकने के लिए लोकतंत्र में शक्तियों का बँटवारा किया जाता है। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका एक-दूसरे की शक्तियों पर नियंत्रण रखते हैं। यदि निर्वाचित सरकार कोई ऐसा कानून बनाती है जो संविधान की मूल भावना के विरुद्ध हो, तो न्यायपालिका उसे अवैध घोषित कर सकती है। इसके अतिरिक्त, सरकारी अधिकारियों और संस्थाओं की अपनी स्वायत्तता होती है, जो शासन को किसी व्यक्ति विशेष की इच्छा के बजाय नियमों के आधार पर चलाने के लिए बाध्य करती है। निर्वाचित शासक को प्रशासनिक अधिकारियों और विभिन्न संस्थाओं के साथ तालमेल बिठाकर ही शासन चलाना होता है, जिससे सत्ता के दुरुपयोग की गुंजाइश कम हो जाती है।
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Q5: न्यायपालिका की भूमिका लोकतंत्र की चुनौती है कैसे? इसके सुधार के उपाय क्या है ?
उत्तर : लोकतंत्र में न्यायपालिका की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और निर्णायक होती है क्योंकि यह संविधान के संरक्षक और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के प्रहरी के रूप में कार्य करती है। हालाँकि, वर्तमान समय में न्यायपालिका की कार्यप्रणाली स्वयं लोकतंत्र के सामने एक गंभीर चुनौती बनकर उभरी है। इसका सबसे प्रमुख कारण न्याय मिलने में होने वाली अत्यधिक देरी है। भारतीय अदालतों में करोड़ों मामले लंबित हैं, जिससे ‘न्याय में देरी, न्याय का हनन है’ वाली स्थिति उत्पन्न हो जाती है। जब आम आदमी को समय पर न्याय नहीं मिलता, तो उसका लोकतांत्रिक संस्थाओं और कानून के शासन से भरोसा उठने लगता है। इसके अतिरिक्त, न्यायपालिका की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता की कमी और न्यायाधीशों की नियुक्ति की कोलेजियम प्रणाली पर भी सवाल उठते रहे हैं, जिसे अक्सर एक बंद और अपारदर्शी व्यवस्था माना जाता है।
लोकतंत्र की एक और बड़ी चुनौती न्यायपालिका और विधायिका के बीच होने वाला टकराव है। कभी-कभी न्यायपालिका न्यायिक सक्रियता के नाम पर कार्यपालिका और विधायिका के कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप करने लगती है, जिससे शक्तियों के संतुलन का सिद्धांत प्रभावित होता है। जब न्यायपालिका नीति निर्माण जैसे कार्यों में दखल देती है, तो इसे निर्वाचित प्रतिनिधियों के अधिकारों का उल्लंघन माना जाता है। इसके साथ ही, न्याय प्रक्रिया का अत्यंत खर्चीला होना भी एक बड़ी बाधा है। गरीब और वंचित वर्गों के लिए कानूनी लड़ाई लड़ना आर्थिक रूप से लगभग असंभव हो जाता है, जिससे लोकतंत्र का ‘समान न्याय’ का आदर्श केवल कागजों तक सीमित रह जाता है। भ्रष्टाचार के छिटपुट मामले और जवाबदेही के अभाव ने भी न्यायपालिका की छवि और लोकतांत्रिक स्थिरता के सामने चुनौतियां पेश की हैं।
न्यायपालिका को सुदृढ़ और लोकतांत्रिक बनाने के लिए व्यापक सुधारों की आवश्यकता है। सबसे पहले, अदालतों में न्यायाधीशों के रिक्त पदों को शीघ्रता से भरा जाना चाहिए और फास्ट ट्रैक कोर्ट की संख्या बढ़ानी चाहिए ताकि लंबित मामलों का निपटारा त्वरित गति से हो सके। न्याय प्रक्रिया को आधुनिक बनाने के लिए ई-कोर्ट्स और डिजिटल तकनीकों का अधिक से अधिक उपयोग किया जाना चाहिए, जिससे पारदर्शिता बढ़े और कागजी कार्यवाही कम हो। नियुक्तियों के संदर्भ में, एक अधिक पारदर्शी और जवाबदेह प्रणाली विकसित करने की आवश्यकता है जो योग्यता और सामाजिक विविधता को प्राथमिकता दे।
न्याय को आम जनता तक पहुँचाने के लिए लोक अदालतों और ग्राम कचहरी जैसे स्थानीय निकायों को अधिक सशक्त बनाना चाहिए ताकि छोटे विवादों का समाधान स्थानीय स्तर पर ही हो सके। विधिक सहायता (Legal Aid) कार्यक्रमों को अधिक प्रभावी बनाया जाना चाहिए ताकि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग भी बिना किसी डर के न्यायालय की शरण ले सकें। साथ ही, न्यायपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए एक निष्पक्ष न्यायिक मानक और जवाबदेही कानून की आवश्यकता है। जब न्यायपालिका अपनी सीमाओं के भीतर रहकर त्वरित और पारदर्शी न्याय प्रदान करेगी, तभी लोकतंत्र की यह चुनौती एक अवसर में बदलेगी और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा सुनिश्चित हो पाएगी।
लोकतंत्र की एक और बड़ी चुनौती न्यायपालिका और विधायिका के बीच होने वाला टकराव है। कभी-कभी न्यायपालिका न्यायिक सक्रियता के नाम पर कार्यपालिका और विधायिका के कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप करने लगती है, जिससे शक्तियों के संतुलन का सिद्धांत प्रभावित होता है। जब न्यायपालिका नीति निर्माण जैसे कार्यों में दखल देती है, तो इसे निर्वाचित प्रतिनिधियों के अधिकारों का उल्लंघन माना जाता है। इसके साथ ही, न्याय प्रक्रिया का अत्यंत खर्चीला होना भी एक बड़ी बाधा है। गरीब और वंचित वर्गों के लिए कानूनी लड़ाई लड़ना आर्थिक रूप से लगभग असंभव हो जाता है, जिससे लोकतंत्र का ‘समान न्याय’ का आदर्श केवल कागजों तक सीमित रह जाता है। भ्रष्टाचार के छिटपुट मामले और जवाबदेही के अभाव ने भी न्यायपालिका की छवि और लोकतांत्रिक स्थिरता के सामने चुनौतियां पेश की हैं।
न्यायपालिका को सुदृढ़ और लोकतांत्रिक बनाने के लिए व्यापक सुधारों की आवश्यकता है। सबसे पहले, अदालतों में न्यायाधीशों के रिक्त पदों को शीघ्रता से भरा जाना चाहिए और फास्ट ट्रैक कोर्ट की संख्या बढ़ानी चाहिए ताकि लंबित मामलों का निपटारा त्वरित गति से हो सके। न्याय प्रक्रिया को आधुनिक बनाने के लिए ई-कोर्ट्स और डिजिटल तकनीकों का अधिक से अधिक उपयोग किया जाना चाहिए, जिससे पारदर्शिता बढ़े और कागजी कार्यवाही कम हो। नियुक्तियों के संदर्भ में, एक अधिक पारदर्शी और जवाबदेह प्रणाली विकसित करने की आवश्यकता है जो योग्यता और सामाजिक विविधता को प्राथमिकता दे।
न्याय को आम जनता तक पहुँचाने के लिए लोक अदालतों और ग्राम कचहरी जैसे स्थानीय निकायों को अधिक सशक्त बनाना चाहिए ताकि छोटे विवादों का समाधान स्थानीय स्तर पर ही हो सके। विधिक सहायता (Legal Aid) कार्यक्रमों को अधिक प्रभावी बनाया जाना चाहिए ताकि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग भी बिना किसी डर के न्यायालय की शरण ले सकें। साथ ही, न्यायपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए एक निष्पक्ष न्यायिक मानक और जवाबदेही कानून की आवश्यकता है। जब न्यायपालिका अपनी सीमाओं के भीतर रहकर त्वरित और पारदर्शी न्याय प्रदान करेगी, तभी लोकतंत्र की यह चुनौती एक अवसर में बदलेगी और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा सुनिश्चित हो पाएगी।
Q6: क्या आतंकवाद लोकतंत्र की चुनौती हैं ? स्पष्ट करें ।
उत्तर : आतंकवाद आधुनिक युग में लोकतंत्र के लिए सबसे गंभीर और विनाशकारी चुनौतियों में से एक बनकर उभरा है। यह एक ऐसी समस्या है जो न केवल किसी देश की सीमाओं के भीतर अशांति पैदा करती है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल स्तंभों—स्वतंत्रता, समानता और न्याय—पर भी सीधा प्रहार करती है। आतंकवाद का मुख्य उद्देश्य हिंसा और भय के माध्यम से अपनी अनुचित मांगों को मनवाना होता है, जो लोकतंत्र के मूल सिद्धांत संवाद और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के बिल्कुल विपरीत है। जब किसी राष्ट्र में आतंकवाद की जड़ें गहरी होने लगती हैं, तो वहां की पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया बाधित होने लगती है।
लोकतंत्र में प्रत्येक नागरिक को बिना किसी भय के अपने मौलिक अधिकारों का प्रयोग करने की स्वतंत्रता होती है। आतंकवाद इस स्वतंत्रता को छीन लेता है और समाज में भय का वातावरण पैदा करता है। जब लोग आतंकी हमलों के डर से अपनी राय व्यक्त करने या सार्वजनिक गतिविधियों में भाग लेने से डरने लगते हैं, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर होने लगती है। आतंकवाद नागरिकों के जीवन के अधिकार का सबसे बड़ा दुश्मन है, जो लोकतंत्र का सबसे प्राथमिक मूल्य है। इसके कारण जनता का शासन प्रणाली और राज्य की सुरक्षा व्यवस्था पर से विश्वास कम होने लगता है, जो किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए एक चिंताजनक स्थिति है।
आतंकवाद अक्सर समाज को धार्मिक, जातीय या भाषाई आधार पर विभाजित करने का प्रयास करता है। आतंकी संगठन समाज के विभिन्न वर्गों के बीच अविश्वास और वैमनस्य का बीज बोते हैं ताकि देश की एकता और अखंडता को खंडित किया जा सके। लोकतंत्र की सफलता विविधता में एकता और आपसी भाईचारे पर निर्भर करती है, लेकिन आतंकवादी गतिविधियां सांप्रदायिक दंगों और सामाजिक तनाव को बढ़ावा देती हैं। इससे राष्ट्र की सामाजिक बुनावट छिन्न-भिन्न हो जाती है और लोकतांत्रिक संस्थाओं को समाज को एकजुट रखने में कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है।
किसी भी लोकतांत्रिक सरकार का मुख्य लक्ष्य लोक-कल्याण और विकास होता है। आतंकवाद के कारण देश के बहुमूल्य आर्थिक संसाधनों का एक बहुत बड़ा हिस्सा विकास कार्यों, जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे के निर्माण के बजाय राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य साजो-सामान पर खर्च करना पड़ता है। आतंकी हमलों के कारण सार्वजनिक संपत्ति का विनाश होता है और विदेशी निवेश भी प्रभावित होता है, जिससे देश की आर्थिक प्रगति की गति धीमी हो जाती है। जब संसाधनों का रुख गरीबी उन्मूलन और रोजगार से हटकर सुरक्षा की ओर मुड़ जाता है, तो समाज के वंचित वर्गों की उपेक्षा होती है, जो लोकतंत्र की समावेशी प्रकृति के खिलाफ है।
लोकतंत्र में प्रत्येक नागरिक को बिना किसी भय के अपने मौलिक अधिकारों का प्रयोग करने की स्वतंत्रता होती है। आतंकवाद इस स्वतंत्रता को छीन लेता है और समाज में भय का वातावरण पैदा करता है। जब लोग आतंकी हमलों के डर से अपनी राय व्यक्त करने या सार्वजनिक गतिविधियों में भाग लेने से डरने लगते हैं, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर होने लगती है। आतंकवाद नागरिकों के जीवन के अधिकार का सबसे बड़ा दुश्मन है, जो लोकतंत्र का सबसे प्राथमिक मूल्य है। इसके कारण जनता का शासन प्रणाली और राज्य की सुरक्षा व्यवस्था पर से विश्वास कम होने लगता है, जो किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए एक चिंताजनक स्थिति है।
आतंकवाद अक्सर समाज को धार्मिक, जातीय या भाषाई आधार पर विभाजित करने का प्रयास करता है। आतंकी संगठन समाज के विभिन्न वर्गों के बीच अविश्वास और वैमनस्य का बीज बोते हैं ताकि देश की एकता और अखंडता को खंडित किया जा सके। लोकतंत्र की सफलता विविधता में एकता और आपसी भाईचारे पर निर्भर करती है, लेकिन आतंकवादी गतिविधियां सांप्रदायिक दंगों और सामाजिक तनाव को बढ़ावा देती हैं। इससे राष्ट्र की सामाजिक बुनावट छिन्न-भिन्न हो जाती है और लोकतांत्रिक संस्थाओं को समाज को एकजुट रखने में कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है।
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