BSEB 10th Hindi Godhuli Exercise-7 Solution

Follow Us On

Hindi Exercise Solution Series

BSEB 10th Hindi Godhuli Exercise-7 Solution "परम्परा का मूल्यांकन" and pdf

इस पोस्ट में हम बिहार बोर्ड कक्षा 10 हिंदी की पुस्तक “गोधूली” के सातवां अध्याय “परम्परा का मूल्यांकन” के कहानी का सारांश, कवि परिचय, सभी प्रश्नों के समाधान, महत्त्वपूर्ण एवं संभावित प्रश्न और वस्तुनिष्ठ प्रश्नों ( Objective Questions) को विस्तार से देखने वाले हैं।
हमारा प्रयास आपको परीक्षा की तैयारी करवाना है ताकि आप अपने बिहार बोर्ड मैट्रिक परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त कर सकें। इस अध्याय के सभी प्रश्नोत्तरों एवं व्याख्याओं का PDF भी आप निशुल्क डाउनलोड (Download) कर सकते हैं। PDF लिंक नीचे उपलब्ध है, जिससे आप इसे ऑफलाइन भी पढ़ सकते हैं।

"परम्परा का मूल्यांकन" की मुख्य बातें

यह निबंध बताता है कि नया और प्रगतिशील साहित्य लिखने के लिए पुरानी साहित्यिक परंपरा को जानना बहुत ज़रूरी है। जैसे इतिहास समझे बिना हम समाज के बदलाव को नहीं समझ सकते, वैसे ही साहित्य की दिशा समझने के लिए उसकी परंपरा जाननी चाहिए। आलोचना कोई कल्पना नहीं होती, बल्कि वह पुराने साहित्य के ज्ञान पर आधारित होती है। इसी से नया साहित्य जन्म लेता है। लेखक कहते हैं कि परंपरा को परखते समय यह देखना चाहिए कि कौन-सा साहित्य जनता और श्रमिक वर्ग के हित में है और कौन-सा केवल अमीर वर्ग का पक्षधर है। हर साहित्य वर्ग-संबंधों पर टिका नहीं होता, क्योंकि उसमें मानवीय भावनाएँ, अनुभव और संवेदना भी होती है, जो सबको जोड़ती हैं। साहित्य सिर्फ विचारधारा नहीं, बल्कि मनुष्य की भावनाओं और इंद्रिय-बोध का दर्पण भी है, इसलिए उसकी महत्ता लंबे समय तक बनी रहती है।

निबंध में यह भी बताया गया है कि समाज और साहित्य का विकास हमेशा एक जैसा नहीं होता। कई बार पुराने कवि आधुनिक कवियों से बेहतर होते हैं। महान साहित्यकारों की रचनाएँ समय से ऊपर उठकर जीवित रहती हैं। लेखक यह भी बताते हैं कि साहित्य के विकास में केवल व्यक्ति ही नहीं, बल्कि जातियाँ और समाज भी बड़ी भूमिका निभाते हैं। भारत की सांस्कृतिक एकता में रामायण और महाभारत जैसी कृतियों का बहुत बड़ा योगदान माना गया है। अंत में लेखक कहते हैं कि समाजवाद में ही साहित्य की असली परंपरा आम जनता तक पहुँचेगी। जब लोग पढ़ सकेंगे, तब भाषा की सीमाएँ टूटेंगी और देश की विभिन्न भाषाओं का साहित्य सबका हो जाएगा। इससे भारतीय साहित्य की पहचान और भी मज़बूत होगी और उसका योगदान विश्व संस्कृति तक पहुँचेगा।

इस विषय का हमारा समाधान ही क्यों?

  • हमारा समाधान बिहार बोर्ड कक्षा 10 के न्यूनतम पाठ्यक्रम (Syllabus) पर आधारित है।
  • यह समाधान सरल, आसान और स्पष्ट भाषा में प्रस्तुत किया गया है।
  • हिंदी गोधूली के अभ्यास (Exercise) समाधान के साथ अनेक महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न भी दिए गए हैं।
  • हमारी वेबसाइट पर हिंदी के साथ-साथ अन्य विषयों के समाधान भी उपलब्ध हैं।
  • यहाँ आपको निःशुल्क उच्च गुणवत्ता वाले PDF मिलेंगे।

गुणाकर मुले का संक्षिप्त परिचय

अध्याय – 7 परंपरा का मूल्यांकन
पूरा नाम डॉ० रामविलास शर्मा
जन्म 10 अक्टूबर 1912 ई०
जन्म स्थान ऊँचगाँव सानी, उन्नाव (उत्तर प्रदेश)
मृत्यु 30 मई 2000 ई०, दिल्ली
शिक्षा 1932 में बी०ए० एवं 1934 में अंग्रेजी साहित्य में एम०ए० (लखनऊ विश्वविद्यालय)
अध्यापन एवं कार्य क्षेत्र अंग्रेजी विभाग में अध्यापन (लखनऊ विश्वविद्यालय 1938-43), बलवंत राजपूत कॉलेज आगरा (1943-1971), के० एम० हिंदी संस्थान के निदेशक (1971-74), प्रगतिशील लेखक संघ के महामंत्री (1949-53)
प्रमुख रचनाएँ निराला की साहित्य साधना, आचार्य रामचंद्र शुक्ल और हिंदी आलोचना, भारतेन्दु हरिश्चंद्र, प्रेमचंद और उनका युग, भाषा और समाज, महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण, भारत की भाषा समस्या, नयी कविता और अस्तित्ववाद, भारत में अंग्रेजी राज और मार्क्सवाद, भारत के प्राचीन भाषा परिवार और हिंदी, विराम चिह्न, बड़े भाई आदि
विशेष उपलब्धि साहित्य अकादमी पुरस्कार (‘निराला की साहित्य साधना’ पर), हिंदी आलोचना को वैज्ञानिक दृष्टि प्रदान करने का श्रेय, जीवनी साहित्य को नया आयाम
प्रस्तुत निबंध का स्रोत पुस्तक – ‘परंपरा का मूल्यांकन’
रचनात्मक विशेषता वैज्ञानिक दृष्टि, स्पष्ट और तर्कपूर्ण भाषा, मार्क्सवादी दृष्टिकोण, परंपरा और आधुनिकता की संतुलित व्याख्या, साहित्य की सामाजिक भूमिका पर बल

बोध और अभ्यास प्रश्न

पाठ के साथ

Q1: परंपरा का ज्ञान किनके लिए सबसे ज्यादा आवश्यक है और क्यों ?
उत्तर : जो लोग साहित्य में परिवर्तन लाना चाहते हैं और नया, प्रगतिशील या क्रांतिकारी साहित्य रचना चाहते हैं, उनके लिए साहित्यिक परंपरा का ज्ञान सबसे अधिक आवश्यक है। क्योंकि बिना परंपरा को समझे न तो पुराने साहित्य की सीमाओं को पहचाना जा सकता है और न ही नई दिशा दी जा सकती है। परंपरा का ज्ञान ही प्रगतिशील आलोचना को आधार देता है, जिससे साहित्य की धारा को मोड़कर समाज के हित में नया और सार्थक साहित्य रचा जा सकता है।
Q2: परंपरा के मूल्यांकन में साहित्य के वर्गीय आधार का विवेक लेखक क्यों महत्त्वपूर्ण मानता है ?
उत्तर : लेखक मानते है कि परंपरा को समझते समय यह जानना ज़रूरी है कि कोई साहित्य किस वर्ग के हितों को व्यक्त करता है। मूल्यांकन करते समय सबसे पहले उस साहित्य को महत्व दिया जाना चाहिए जो शोषित और श्रमिक जनता की आवाज़ बनता है, न कि शोषक या संपन्न वर्ग की। साथ ही यह देखना आवश्यक है कि उस साहित्य की जड़ समाज की मेहनतकश जनता के जीवन और श्रम से जुड़ी है या नहीं। लेखक यह भी ज़ोर देता है कि यह परखा जाए कि वह साहित्य आज की जनता के लिए कितना उपयोगी है और उसे वर्तमान परिस्थितियों में किस प्रकार इस्तेमाल किया जा सकता है।
Q3: साहित्य का कौन-सा पक्ष अपेक्षाकृत स्थायी होता है ? इस संबंध में लेखक की राय स्पष्ट करें ।
उत्तर : लेखक के अनुसार साहित्य केवल विचारधारा का माध्यम नहीं है, बल्कि वह मनुष्य की संवेदनाओं, भावनाओं और इंद्रिय-बोध को भी अभिव्यक्त करता है। साहित्य मनुष्य के पूरे जीवन से जुड़ा होता है—सिर्फ उसके आर्थिक या सामाजिक जीवन से नहीं, बल्कि उसके स्वाभाविक, मानवीय और प्राणीगत अनुभवों से भी।
साहित्य में मनुष्य की आदिम भावनाएँ, संवेदनाएँ और सार्वभौमिक अनुभव अभिव्यक्त होते हैं, जो समय के साथ बहुत कम बदलते हैं। इसलिए लेखक मानता है कि साहित्य का भावनात्मक और मानवीय पक्ष अपेक्षाकृत अधिक स्थायी होता है।
Q4: ‘साहित्य में विकास प्रक्रिया उसी तरह सम्पन्न नहीं होती, जैसे समाज में’ लेखक का आशय स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर : लेखक का आशय यह है कि साहित्य और समाज का विकास एक जैसी प्रक्रिया से नहीं चलता। समाज में हम प्रगति की सीधी तुलना कर सकते हैं, जैसे सामंतवाद से पूँजीवाद और फिर समाजवाद की ओर बढ़ना। इन चरणों को यह कहकर आँका जा सकता है कि कौन-सा अधिक उन्नत या प्रगतिशील है। लेकिन साहित्य में ऐसा नहीं होता। यह ज़रूरी नहीं कि पूँजीवादी युग का लेखक सामंती युग के कवि से श्रेष्ठ हो। साहित्य में रचना का मूल्य समय या सामाजिक व्यवस्था के आधार पर तय नहीं होता, बल्कि लेखक की प्रतिभा, संवेदना और मौलिकता पर निर्भर करता है।
लेखक बताते हैं कि कवि अपने पूर्ववर्तियों से प्रेरणा लेते हैं, पर उनका अंधानुकरण नहीं करते। वे अपनी मौलिकता से नई परंपराएँ गढ़ते हैं। जैसे औद्योगिक वस्तुएँ बार-बार बनाई जा सकती हैं, लेकिन शेक्सपीयर जैसा साहित्यिक सृजन दोबारा नहीं हो सकता।
इसीलिए लेखक मानता है कि साहित्य का विकास-क्रम समाज की विकास प्रक्रिया जैसा सीधा, क्रमबद्ध और तुलनीय नहीं होता।
Q5: लेखक मानव चेतना को आर्थिक संबंधों से प्रभावित मानते हुए भी उसकी सापेक्ष स्वाधीनता किन दृष्टांतों द्वारा प्रमाणित करता है ?
उत्तर : लेखक कहते हैं कि आर्थिक संबंध मनुष्य की चेतना को प्रभावित तो करते हैं, पर पूरी तरह नियंत्रित नहीं करते। मनुष्य और परिस्थितियों का संबंध द्वंद्वात्मक होता है—दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। इसी आधार पर वे चेतना की सापेक्ष स्वाधीनता को कई उदाहरणों से स्पष्ट करते हैं:
1. एथेन्स बनाम अमरीका दोनों समाजों में गुलामी थी, लेकिन एथेन्स की सभ्यता ने पूरे यूरोप की संस्कृति को समृद्ध किया, जबकि अमरीकी गुलाम-मालिकों ने मानव संस्कृति को कोई योगदान नहीं दिया।
2. सामंतवाद में कविता के केंद्र सामंतवाद पूरी दुनिया में था, फिर भी महान कविता के केंद्र केवल भारत और ईरान माने गए। यह दिखाता है कि समान सामाजिक ढाँचे में भी कला समान रूप से विकसित नहीं होती।
3. पूँजीवाद और कला का विकास यूरोप के कई देशों में पूँजीवाद विकसित हुआ, लेकिन रैफेल, लियोनार्दो दा विंची और माइकेल एंजेलो जैसे कलाकार केवल इटली की देन हैं।

इन उदाहरणों से लेखक यह साबित करते हैं कि आर्थिक परिस्थितियाँ महत्वपूर्ण होते हुए भी कला और चेतना को पूरी तरह बाँध नहीं सकतीं। प्रतिभा, सांस्कृतिक चेतना और व्यक्तिगत सृजन क्षमता साहित्य को स्वतंत्र दिशा दे सकती है।
Q6: साहित्य के निर्माण में प्रतिभा की भूमिका स्वीकार करते हुए लेखक किन खतरों से आगाह करता है ?
उत्तर : लेखक कहते हैं कि साहित्य के निर्माण में प्रतिभाशाली मनुष्यों की भूमिका निर्णायक होती है। ये मनुष्य नए विचार, शैली और परंपराएँ उत्पन्न करते हैं और साहित्य को नई दिशा देते हैं। लेकिन लेखक सावधान करते हैं कि प्रतिभाशाली व्यक्ति जो भी रचना करते हैं, वह हमेशा दोषमुक्त या श्रेष्ठ नहीं होती। उनके उत्कृष्ट कृतित्व में भी कमियाँ हो सकती हैं। प्रतिभाशाली मनुष्यों की उपलब्धियों के बाद ही नए लेखक और रचनाएँ कुछ नया और उल्लेखनीय कर सकती हैं। यही कारण है कि साहित्यिक विकास निरंतर चलता रहता है।
Q7: राजनीतिक मूल्यों से साहित्य के मूल्य अधिक स्थायी कैसे होते हैं ?
उत्तर : लेखक कहते हैं कि साहित्य के मूल्य राजनीतिक मूल्यों की तुलना में अधिक स्थायी होते हैं। इसके उदाहरण के रूप में वे अंग्रेज़ कवि टेनीसन द्वारा लैटिन कवि वर्जिल पर लिखी कविता का उल्लेख करते हैं। उसमें कहा गया है कि रोमन साम्राज्य का वैभव समाप्त हो गया, लेकिन वर्जिल के काव्य की ध्वनियाँ आज भी हमें सुनाई देती हैं और हृदय को आनंदित करती हैं।

लेखक बताते हैं कि ब्रिटिश साम्राज्य के पतन के बाद भी शेक्सपियर, मिल्टन और शेली का साहित्य विश्व संस्कृति में अपनी जगह बनाए रखेगा और नए पाठक उन्हें पढ़ेंगे। इस प्रकार राजनीतिक व्यवस्था और मूल्य समय के साथ नष्ट हो सकते हैं, लेकिन साहित्यिक मूल्य स्थायी रहते हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों को प्रभावित करते हैं।
Q8: जातीय अस्मिता का लेखक किस प्रसंग में उल्लेख करता है और उसका क्या महत्त्व बताता है ?
उत्तर : लेखक कहते हैं कि साहित्य के विकास में जातियों और जनसमुदायों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। जब कोई समुदाय एक सामाजिक व्यवस्था से दूसरी व्यवस्था में प्रवेश करता है, तब उसकी अस्मिता नष्ट नहीं होती बल्कि बनी रहती है। यह अस्मिता इतिहास और सांस्कृतिक परंपरा के आधार पर निर्मित होती है और मानव समुदाय को एक संगठित जाति के रूप में जोड़ती है। लेखक इस प्रसंग में यह भी बताते हैं कि जातीय अस्मिता साहित्यिक परंपरा के ज्ञान को सुरक्षित रखने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने में विशेष महत्त्व रखती है। यही अस्मिता समाज और संस्कृति की निरंतरता सुनिश्चित करती है और साहित्य के मूल्य और पहचान को बनाए रखने में सहायक होती है।
Q9: जातीय और राष्ट्रीय अस्मिताओं के स्वरूप का अंतर करते हुए लेखक दोनों में क्या समानता बताता है ?
उत्तर : लेखक कहते हैं कि जातीय और राष्ट्रीय अस्मिता अलग स्वरूप की होती हैं, लेकिन दोनों में एक समानता भी है। जब किसी राष्ट्र या समुदाय के सभी तत्वों पर संकट आता है, तब राष्ट्रीय अस्मिता और जातीय अस्मिता दोनों ही मजबूत होकर सामने आती हैं और लोगों की प्रेरणा बनती हैं। उदाहरण के रूप में लेखक हिटलर के सोवियत संघ पर आक्रमण का उल्लेख करते हैं, जब रूसी जनता ने अपनी साहित्यिक परंपरा को याद करके राष्ट्रीय और जातीय अस्मिता दोनों को जागृत किया। इसके अनुसार समाजवादी व्यवस्था में जातीय अस्मिता नष्ट नहीं होती, बल्कि और अधिक पुष्ट होती है।
Q10: बहुजातीय राष्ट्र की हैसियत से कोई भी देश भारत का मुकाबला क्यों नहीं कर सकता ?
उत्तर : लेखक कहते हैं कि संसार का कोई भी देश बहुजातीय राष्ट्र के रूप में भारत का मुकाबला नहीं कर सकता, यदि वह इतिहास और संस्कृति को ध्यान में रखे। भारत में राष्ट्रीयता किसी एक जाति द्वारा दूसरी जातियों पर राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करके नहीं बनी, बल्कि यह मुख्यतः संस्कृति और इतिहास का परिणाम है। इस देश में साहित्यिक परंपरा का मूल्यांकन अत्यंत महत्वपूर्ण है, और सामाजिक विकास में कवियों की भूमिका अन्य देशों की तुलना में विशेष और निर्णायक रही है। यही कारण है कि भारत की सांस्कृतिक और साहित्यिक एकता बहुजातीय राष्ट्र होने के बावजूद अद्वितीय और अपराजेय बनी हुई है।
Q11: भारत की बहुजातीयता मुख्यतः संस्कृति और इतिहास की देन है। कैसे ?
उत्तर : लेखक कहते हैं कि भारत की बहुजातीयता मुख्यतः इसके समृद्ध इतिहास और साहित्यिक-सांस्कृतिक विकास की देन है। भारतीय सामाजिक विकास में व्यास और वाल्मीकि जैसे कवियों की विशेष भूमिका रही है। महाभारत और रामायण ने भारतीय साहित्य की आंतरिक एकता स्थापित की और विभिन्न जातियों की अस्मिता के सहारे यहाँ की संस्कृति का निर्माण किया। भारत में कभी किसी एक जाति ने अन्य जातियों पर राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित नहीं किया, बल्कि संस्कृति और साहित्य ने समरसता और एकता का पाठ पढ़ाया। इसी वजह से राष्ट्रीय अस्मिता और बहुजातीयता का आधार मजबूत हुआ है।
Q12: किस तरह समाजवाद हमारी राष्ट्रीय आवश्यकता है ? इस प्रसंग में लेखक के विचारों पर प्रकाश डालें ।
उत्तर : लेखक कहते हैं कि पूँजीवादी व्यवस्था में शक्ति का बहुत अपव्यय होता है और देश के साधनों का सही उपयोग नहीं हो पाता। इसके विपरीत, समाजवादी व्यवस्था में साधनों का सर्वोत्तम उपयोग संभव होता है। लेखक उदाहरण देते हैं कि जारशाही रूस में समाजवादी व्यवस्था के बाद देश एक नए राष्ट्र के रूप में पुनर्गठित हुआ और अनेक छोटे-बड़े राष्ट्र समाजवाद अपनाने के बाद पहले की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली बने। समाजवादी व्यवस्था में प्रगति की रफ्तार पूँजीवादी देशों की तुलना में तेज होती है। इसलिए भारत की राष्ट्रीय क्षमता और विकास को पूरी तरह सक्रिय करने के लिए समाजवाद आवश्यक है। यही कारण है कि लेखक के अनुसार समाजवाद हमारी राष्ट्रीय आवश्यकता है।
Q13: निबंध का समापन करते हुए लेखक कैसा स्वप्न देखता है ? उसे साकार करने में परंपरा की क्या भूमिका हो सकती है ? विचार करें ।
उत्तर : लेखक कहते हैं कि वे भारत में अधिक से अधिक लोगों के साक्षर होने का स्वप्न देखते हैं। जब जनता साक्षर होगी और साहित्य पढ़ने की सुविधा मिलेगी, तब रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों के करोड़ों नए पाठक होंगे। इस प्रक्रिया से देश में बड़े पैमाने पर सांस्कृतिक आदान-प्रदान होगा और लोग केवल अपनी भाषा तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि अन्य भाषा-भाषियों की रचनाएँ भी पढ़ेंगे। साहित्य की परंपरा इस साकार होने वाली प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह परंपरा जातीय और भाषाई सीमाओं को लांघकर पूरे देश की सांस्कृतिक संपत्ति बनती है और भारतीय साहित्य का गौरवशाली योगदान मानव संस्कृति की विशद धारा में दिखाई देता है।
Q14: साहित्य सापेक्ष रूप में स्वाधीन होता है । इस मत को प्रमाणित करने के लिए लेखक ने कौन-से तर्क और प्रमाण उपस्थित किए हैं ?
उत्तर : लेखक कहते हैं कि द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के अनुसार मनुष्य की चेतना आर्थिक सम्बन्धों से प्रभावित होती है, लेकिन यह पूरी तरह उनसे निर्धारित नहीं होती; अर्थात् मनुष्य और परिस्थितियों का सम्बन्ध द्वन्द्वात्मक है। यही कारण है कि साहित्य सापेक्ष रूप में स्वाधीन होता है। इसे प्रमाणित करने के लिए लेखक ने कहा कि अमरीका और एथेन्स दोनों में गुलामी थी, किन्तु एथेन्स की सभ्यता ने पूरे यूरोप को प्रभावित किया, जबकि अमरीकी गुलामों के मालिकों ने मानव संस्कृति को कुछ भी योगदान नहीं दिया। इसी तरह, यूरोप में पूँजीवादी विकास हुआ, पर रैफेल, लियोनार्दो दा विंची और माइकेल एंजेलो जैसी प्रतिभाशाली हस्तियों की अद्वितीय रचनाएँ समाज की सामान्य आर्थिक परिस्थितियों से स्वतंत्र रूप से उभरीं। लेखक बताते हैं कि साहित्य के निर्माण में प्रतिभाशाली मनुष्यों की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन साहित्य वहीं तक सीमित नहीं रहता; इसमें हमेशा कुछ नया करने की गुंजाइश बनी रहती है। इस प्रकार, साहित्य सापेक्ष रूप में स्वाधीन होता है।
Q15: व्याख्या करें
विभाजित बंगाल से विभाजित पंजाब की तुलना कीजिए, तो ज्ञात हो जाएगा कि साहित्य की परंपरा का ज्ञान कहाँ ज्यादा है, कहाँ कम है और इस न्यूनाधिक ज्ञान के सामाजिक परिणाम क्या होते हैं ।
उत्तर : लेखक कहते हैं कि जब मानव समाज बदलता है और नई सामाजिक परिस्थितियों में प्रवेश करता है, तब भी वह अपनी पुरानी अस्मिता को बनाए रखता है। इस अस्मिता के निर्माण में इतिहास और सांस्कृतिक परंपरा का अद्भुत योगदान होता है। साहित्य की परंपरा इसी ज्ञान का प्रमुख हिस्सा है। उदाहरण के रूप में लेखक विभाजित बंगाल और विभाजित पंजाब की तुलना करते हैं। बंगाल विभाजित हुआ है, फिर भी पूर्वी और पश्चिमी बंगाल के लोग अपनी साहित्यिक परंपरा से जुड़े रहने के कारण सांस्कृतिक रूप से अविभाजित हैं। वहीं पंजाब में ऐसा नहीं हो पाया, जिससे वहां अस्मिता और सांस्कृतिक एकता कमzor रही। इससे पता चलता है कि साहित्य की परंपरा का ज्ञान जितना अधिक होगा, सामाजिक और सांस्कृतिक एकता उतनी ही मजबूत रहेगी। न्यूनाधिक ज्ञान होने पर समाज में अस्मिता कमजोर होती है और सामाजिक विकास प्रभावित होता है। लेखक यह दर्शाते हैं कि इतिहास और सांस्कृतिक परंपरा से जुड़कर ही अस्मिता की रक्षा और समाज के प्रगतिशील बनने की संभावना बढ़ती है।

भाषा की बात

1. पाठ से दस अविकारी शब्द चुनिए और उनका वाक्यों में प्रयोग कीजिए ।
उत्तर: और : लेखक कहते हैं कि साहित्य का मूल्य आर्थिक आधार से और सामाजिक चेतना से जुड़ा है।
भी : साहित्य में मानव की भावनाएँ भी व्यक्त होती हैं।
का : साहित्य का अध्ययन करना आवश्यक है।
में : प्रगतिशील आलोचना समाज में परिवर्तन लाने में मदद करती है।
के : कवियों के योगदान से साहित्यिक परंपरा मजबूत होती है।
पर : लेखक परंपरा के महत्व पर जोर देते हैं।
से : साहित्य से मनुष्य की चेतना विकसित होती है।
था : एथेन्स की सभ्यता प्राचीन यूरोप के लिए महत्वपूर्ण था।
यह : यह अध्ययन नई पीढ़ी के लिए उपयोगी है।
तो : यदि समाज साहित्यिक परंपरा को जानता है, तो उसका विकास संभव है।

2. निम्नलिखित पदों में विशेष्य का परिवर्तन कीजिए
बुनियादी परिवर्तन, मूर्त्त ज्ञान, अभ्युदयशील वर्ग, समाजवादी व्यवस्था, श्रमिक जनता, प्रगतिशील आलोचना, अद्वितीय भूमिका, राजनीतिक मूल्य
उत्तर: बुनियादी परिवर्तन : मूलभूत बदलाव
मूर्त्त ज्ञान : ठोस ज्ञान
अभ्युदयशील वर्ग : उन्नतिशील समुदाय
समाजवादी व्यवस्था : समाजवादी शासन
श्रमिक जनता : मजदूर वर्ग
प्रगतिशील आलोचना : उन्नतिशील समालोचना
अद्वितीय भूमिका : अनोखी भूमिका
राजनीतिक मूल्य : नीतिगत मूल्य

3. पाठ से संज्ञा के भेदों के चार-चार उदाहरण चुनें ।
उत्तर: 1. व्यक्तिवाचक संज्ञा : रामविलास शर्मा, एथेन्स, भारत, हिटलर
2. जातिवाचक संज्ञा : कवि, लेखक, जनता, समाज
3. समूहवाचक संज्ञा : समुदाय, जाति, राष्ट्र, वर्ग
4. द्रव्योंवाचक संज्ञा : शक्ति, संसाधन, साधन, साहित्य
5. भाववाचक संज्ञा : प्रेम, वीरता, स्वतंत्रता, साहस

4. निम्नलिखित सर्वनामों के प्रकार बताते हुए उनका वाक्य में प्रयोग करें
जो, वे, वह, यह, मैं, वैसा, कोई, कुछ, कौन, जैसा, हमारे, हम
उत्तर: सम्बन्धवाचक सर्वनाम : जो – वह व्यक्ति जो पढ़ाई में मेहनती है, सफल होगा।
पुरुषवाचक सर्वनाम : वे – वे छात्र मैदान में खेल रहे हैं।
निश्चयवाचक सर्वनाम : वह – वह घर बहुत सुंदर है।
निश्चयवाचक सर्वनाम : यह – यह किताब मेरे लिए आवश्यक है।
पुरुषवाचक सर्वनाम : मैं – मैं कल विद्यालय जाऊँगा।
सापेक्षवाचक सर्वनाम : वैसा – वैसा फल स्वाद में अच्छा होता है।
अनिश्चितवाचक सर्वनाम : कोई – कोई व्यक्ति दरवाजा खटखटा रहा है।
अनिश्चितवाचक सर्वनाम : कुछ – कुछ विद्यार्थी पहले ही कक्षा में पहुँच गए हैं।
प्रश्नवाचक सर्वनाम : कौन – कौन मेरे मित्र हैं?
सापेक्षवाचक सर्वनाम : जैसा – जैसा व्यवहार होगा, वैसा परिणाम मिलेगा।
सम्बंधवाचक/सामूहिक सर्वनाम : हमारे – हमारे शिक्षक बहुत ज्ञानवान हैं।
पुरुषवाचक सर्वनाम : हम – हम सब मिलकर खेल मैदान साफ़ करेंगे।

10th हिंदी गोधूली के अन्य अध्यायों के Solution भी देखें।

क्रमांक अध्याय
1 श्रम विभाजन एवं जातिप्रथा
2 विष के दाँत
3 भारत से हम क्या सीखें
4 नाखून क्यो बढ़ते हैं
5 नगरी लिपि
6 बहादुर
8 जित-जित मैं निरखत हूँ
9 आविन्यों
10 मछली
11 नैबतख़ाने में इबादत
12 शिक्षा और संस्कृति

शब्द निधि

प्रगतिशील आलोचना : जो आलोचना सामाजिक विकास को महत्त्व देती हो
भौतिकवाद : वह विचारधारा जो चेतना या भाव का मूल पदार्थ को मानती हो
अमूर्त्त : जो मूर्त्त न हो, जो दिखाई न पड़े, भावमय
विकासमान : विकास करता हुआ
प्रतिबिंबित : झलकता हुआ, जिसकी छाया दिखलाई पड़े
अभ्युदयशील : तरक्की करता हुआ, उन्नतिशील
ह्रासमान : नष्ट होता हुआ, छीजता हुआ, मरता हुआ
यथेष्ट : पर्याप्त
आदिम : अतिप्राचीन, सबसे पहला
व्यंजित : प्रकट, ध्वनित, अभिव्यक्त
पूर्ववर्ती : जो पहले से विद्यमान हो, पहले से मौजूद रहनेवाला, पूर्वज
नियामक : निर्मित और नियमबद्ध करनेवाला
द्वंद्वात्मक : जिसमें दो परस्पर विरोधी स्थितियों या पक्षों का संघर्ष हो
नामलेवा : नाम लेने वाला, उत्तराधिकारी
अस्मिता : अस्तित्व, पहचान
एकात्मकता : एकता, आत्मा की एकता
अविच्छिन्न : लगातार, निरंतर, अटूट
न्यूनाधिक : कमोबेश
समर्थ : सक्षम, सुयोग्य
वंचित : अभावग्रस्त
प्रभुत्व : अधिकार, स्वामित्व
विशद : व्यापक, विस्तृत
पुनर्गठित : फिर से व्यवस्थित
अपव्यय : फिजूलखर्ची
आत्मसात् : अपना हिस्सा बनाना, अपने में समाहित कर लेना

डॉ० रामविलास शर्मा का संक्षिप्त परिचय :

डॉ. रामविलास शर्मा हिंदी साहित्य और आलोचना के क्षेत्र के प्रमुख विद्वान थे। इनका जन्म 10 अक्टूबर 1912 को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के गाँव ऊँचगाँव सानी में हुआ। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से 1932 में बी.ए. और 1934 में अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद 1938 तक शोधकार्य में व्यस्त रहने के बाद उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में अध्यापन कार्य किया। 1943 में वे आगरा के बलवंत राजपूत कॉलेज में चले गए और 1971 तक वहाँ अध्यापन किया। बाद में आगरा विश्वविद्यालय के के.एम. हिंदी संस्थान के निदेशक बने और 1974 में सेवानिवृत्त हुए। रामविलास शर्मा हिंदी आलोचना में प्रगतिशील दृष्टिकोण के प्रवर्तक माने जाते हैं। उन्होंने हिंदी साहित्य और भाषा के सामाजिक एवं ऐतिहासिक मूल्य का विश्लेषण किया। उनकी लेखनी देशभक्ति और मार्क्सवादी चेतना से प्रेरित रही। वे केवल प्रगतिवादी आलोचना के विकास में नहीं, बल्कि इसके अंदर मौजूद विरोधाभासों के निवारण में भी योगदान देने वाले थे।
उनकी प्रमुख रचनाओं में निराला की साहित्य साधना (साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त), आचार्य रामचंद्र शुक्ल और हिंदी आलोचना, प्रेमचंद और उनका युग, भारत में अंग्रेजी राज और मार्क्सवाद, महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण आदि शामिल हैं। उन्होंने हिंदी गद्य को सरल, तर्कपूर्ण और स्पष्ट भाषा प्रदान की। 30 मई 2000 को उनका निधन दिल्ली में हुआ। डॉ. रामविलास शर्मा का योगदान हिंदी साहित्य की परंपरा और आलोचना को आधुनिक, वैज्ञानिक और समाजोपयोगी दृष्टि देने में ऐतिहासिक महत्व रखता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

नीचे इस अध्याय से संबंधित कुल 30 वस्तुनिष्ठ प्रश्न दिए गए हैं। ये प्रश्न अध्याय के गहन अध्ययन के आधार पर तैयार किए गए हैं तथा इनमें से कई प्रश्न पिछले वर्षों की बिहार बोर्ड मैट्रिक परीक्षा से भी लिए गए हैं। इन प्रश्नों का अभ्यास करने से आपको परीक्षा की तैयारी में काफी मदद मिलेगी और यह समझने में आसानी होगी कि परीक्षा में किस प्रकार के प्रश्न पूछे जा सकते हैं।
1. लेखक रामविलास शर्मा के गाँव का क्या नाम था?
(A) ऊँचगा सानी
(B) ऊँचगाँव सानी
(C) उचकागाँव सैनी
(D) ऊँचागाँव सैनी

2. ‘भौतिकवाद का अर्थ भाग्यवाद नहीं है’-किस निबंध की पंक्ति है?
(A) नागरी लिपि
(B) परंपरा का मूल्यांकन
(C) श्रम विभाजन और जाति प्रथा
(D) नाखून क्यों बढ़ते हैं

3. रामविलास शर्मा का जन्म कब हुआ था?
(A) 1910 ई० में
(B) 1911 ई० में
(C) 1912 ई० में
(D) 1914 ई० में

4. ‘परंपरा’ का मूल्यांकन है
(A) निबंध
(B) कहानी
(C) नाटक
(D) उपन्यास

5. ‘परंपरा का मूल्यांकन’ शीर्षक पाठ साहित्य की कौन सी विद्या है?
(A) कहानी
(B) निबंध
(C) व्यंग्य
(D) संस्मरण

6. निबंध ‘परंपरा का मूल्यांकन’ के लेखक कौन हैं?
(A) अमरकांत
(B) रामविलास शर्मा
(C) नलिन विलोचन शर्मा
(D) यतीन्द्र मिश्र

7. रामविलास शर्मा का निधन कब हुआ था?
(A) 30 मई, 2000 ई०
(B) 30 मई, 2001 ई०
(C) 30 मई, 2002 ई०
(D) 30 मई, 2003 ई०

8. साहित्य की परम्परा का पूर्ण ज्ञान किस व्यवस्था में संभव है?
(A) सामन्तवादी व्यवस्था
(B) पूँजीवादी व्यवस्था
(C) समाजवादी व्यवस्था
(D) उपर्युक्त सभी

9. साहित्य के निर्माण में प्रतिभाशाली मनुष्यों की भूमिका है।
(A) नगण्य
(B) निर्णायक
(C) नकारात्मक
(D) इनमें से कोई नहीं

10. जातीय अस्मिता की दृष्टि से इतिहास का प्रवाह कैसा है?
(A) विच्छिन्न
(B) अविच्छिन्न
(C) विच्छिन्न और अविच्छिन्न दोनों
(D) इनमें से कोई नहीं

11. परंपरा का ज्ञान किनके लिए आवश्यक है?
(A) जो लकीर के फकीर है
(B) जो उपयोगी साहित्य की रचना न करे
(C) जो लकीर के फकीर न होकर क्रांतिकारी साहित्य की रचना करे
(D) जो उपयोगी साहित्य की रचना न करे

12. हिन्दी आलोचना को वैज्ञानिक दृष्टि प्रदान करने का श्रेय किनको प्राप्त है?
(A) रामविलास शर्मा
(B) नलिन विलोचन शर्मा
(C) अमरकांत
(D) यतीन्द्र मिश्र

13. हिन्दी में जीवनी साहित्य को एक नया आयाम दिया है?
(A) यतीन्द्र मिश्र
(B) अमरकांत
(C) रामविलास शर्मा
(D) नलिन विलोचन शर्मा

14. साहित्य मुनष्य के संपूर्ण जीवन से संबद्ध है। आर्थिक जीवन के अलावा मुनष्य एक प्राणी के रूप में भी अपना जीवन बिताता है। साहित्य में उसकी बहुत-सी आदिम भावनाएँ प्रतिफलित होती हैं जो उसे प्राणी मात्र से जोड़ती है। यह गद्यांश किस पाठ का है?
(A) आविन्यों
(B) मछली
(C) शिक्षा और संस्कृति
(D) परंपरा का मूल्यांकन

15. रामविलास शर्मा को उनकी किस कृति के लिए ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ दिया गया था?
(A) प्रेमचंद और उनका युग
(B) भाषा और समाज
(C) निराला की साहित्य साधना
(D) विराम चिह्न

16. सोवियत संघ के लोग हिटलर विरोधी संग्राम को क्या कहते हैं?
(A) महान राष्ट्रीय संग्राम
(B) स्वाधीनता संग्राम
(C) राजनीतिक संग्राम
(D) सामाजिक संग्राम

17. किस व्यवस्था के कायम होने पर जातीय अस्मिता खण्डित नहीं होती वरन् और पुष्ट होती है?
(A) समाजवादी व्यवस्था
(B) पूंजीवादी व्यवस्था
(C) मिश्रित व्यवस्था
(D) राजनैतिक व्यवस्था

18. भारतीय संस्कृति से किन दो ग्रंथों को अलग कर दें, तो भारतीय साहित्य की आंतरिक एकता टूट जायेगी?
(A) वेद और पुराण
(B) रामायण और महाभारत
(C) हरिजन और यंग इंडिया
(D) रघुवंशम् और अभिज्ञान शाकुंतलम्

19. निबंध है-
(A) मछली
(B) परम्परा का मूल्यांकन
(C) बहादुर
(D) भारतमाता

20. ‘प्रेमचंद और उनका युग’ किनकी रचना है?
(A) गुणाकर मुले
(B) यतीन्द्र मिश्र
(C) रामविलास शर्मा
(D) अमरकांत

21. भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ के महामंत्री रहे
(A) भीमराव अंबेदकर
(B) रामविलास शर्मा
(C) अमरकांत
(D) यतीन्द्र मिश्र

22. अस्मिता का सही अर्थ है-
(A) पहचान (अस्तित्व)
(B) मना करना
(C) एकता
(D) पर्याप्त

23. विभाजित बंगाल से विभाजित पंजाब की तुलना कीजिए, तो ज्ञात हो जाएगा कि साहित्य की परंपरा का ज्ञान कहाँ ज्यादा है, कहाँ कम है, और इस न्यूनाधिक ज्ञान के सामाजिक परिणाम क्या होते हैं? उपर्युक्त गद्यांश किस पाठ से लिया गया है?
(A) श्रम विभाजन और जातिप्रथा
(B) विष के दाँत
(C) शिक्षा और संस्कृति
(D) परंपरा का मूल्यांकन

24. रामविलास शर्मा के अनुसार भारत की राष्ट्रीय क्षमता का पूर्ण विकास किस व्यवस्था में ही संभव है?
(A) समाजवादी व्यवस्था
(B) मिश्रित अर्थव्यवस्था
(C) पूँजीवादी व्यवस्था
(D) मार्क्सवादी व्यवस्था

25. जो लोग साहित्य में युग परिवर्तन करना चाहते हैं, जो लकीर के फकीर नहीं है, जो रूढ़ियाँ तोड़कर क्रांतिकारी साहित्य रचना चाहते हैं, उनके लिए साहित्य की परंपरा का ज्ञान सबसे ज्यादा आवश्यक है। प्रस्तुत गद्यांश किस पाठ से उधृत हैं?
(A) शिक्षा और संस्कृति
(B) परंपरा का मूल्यांकन
(C) नौबतखाने में इवादत
(D) आविन्यों

26. किसने सोवियत संघ पर आक्रमण किया?
(A) महारानी विक्टोरिया
(B) हिटलर ने
(C) पुतिन ने
(D) लेनिन ने

27. यदि मनुष्य परिस्थितियों का नियामक नहीं है तो
(A) नियामक है
(B) नियामक नहीं है
(C) सुरक्षा नहीं है
(D) आवश्यकता नहीं है

28. ‘जारशाही’ कहाँ थी?
(A) रूस में
(B) जापान में
(C) फ्रांस में
(D) चीन में

29. ‘निराला की साहित्य साधना’ के रचनाकार है?
(A) रघुवीर सहाय
(B) अज्ञेय
(C) जायसी
(D) रामविलास शर्मा

30. ‘साहित्य मनुष्य के संपूर्ण जीवन से संबद्ध है’ – यह पंक्ति किस पाठ से उद्धृत है?
(A) परंपरा का मूल्यांकन
(B) नागरी लिपि
(C) नाखून क्यों बढ़ते हैं
(D) बहादुर

[Note] : यदि आप उपयुक्त वस्तुनिष्ठ प्रश्नों का उत्तर जानना चाहते हैं, तो हमारे WhatsApp Channel या Telegram से अवश्य जुड़े।

"परम्परा का मूल्यांकन" की pdf Download करें

निष्कर्ष :

ऊपर आपने बिहार बोर्ड कक्षा 10 की हिन्दी पुस्तक “गोधूली भाग 2” के गद्यखंड के सातवें अध्याय “परम्परा का मूल्यांकन” की व्याख्या, बोध-अभ्यास, महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर और वस्तुनिष्ठ प्रश्नों को पढ़ा। हमें उम्मीद है कि यह सामग्री आपके अध्ययन को और सरल व प्रभावी बनाएगी। यदि किसी प्रश्न या समाधान को लेकर आपके मन में कोई शंका हो, तो आप नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में लिख सकते हैं या सीधे हमसे संपर्क करें। हम आपकी मदद करने की पूरी कोशिश करेंगे। संपर्क करें
Scroll to Top