BSEB 10th History Exercise 6 Solution in Hindi

BSEB 10th History Exercise 6 Solution in Hindi : शहरीकरण एवं शहरी जीवन का पूरा समाधान पाएं। अभी free pdf Download करें!

हम बिहार बोर्ड कक्षा 10 इतिहास के अध्याय 6 “शहरीकरण एवं शहरी जीवन” के समाधान को वस्तुनिष्ठ प्रश्नों (Objective Questions) और विषयनिष्ठ प्रश्नों (Subjective Questions) के साथ आसान, स्पष्ट और बिहार बोर्ड के नवीनतम पाठ्यक्रम पर आधारित लेकर आए हैं। यदि आप सभी छात्रों को किसी भी प्रश्न या किसी भी concept को लेकर संदेह है तो उनका सबका उत्तर नीचे दिया गया है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

Q1: सामंती व्यवस्था से हटकर किस प्रकार की शहरी व्यवस्था की प्रवृति बढ़ी ?
[क] प्रगतिशील प्रवृति
[ख] आक्रामक प्रवृति
[ग] रूढ़िवादी प्रवृति
[घ] शोषणकारी प्रवृति
Q2: शहर को आधुनिक व्यक्ति का किस प्रकार का क्षेत्र माना जाता है ?
[क] सीमित क्षेत्र
[ख] प्रभाव क्षेत्र
[ग] विस्तृत क्षेत्र
[घ] सभी
Q3: स्थायी कृषि के प्रभाव से कैसा जमाव संभव हुआ ?
[क] संपत्ति
[ख] ज्ञान
[ग] शांति
[घ] बहुमूल्य धातु
Q4: एक प्रतियोगी एवं उद्यमी प्रवृति से प्रेरित किस प्रकार की अर्थव्यवस्था लागू की गई ?
[क] जीवन निर्वाह अर्थव्यवस्था
[ख] मुद्रा प्रधान अर्थव्यवस्था
[ग] शिथिल अर्थव्यवस्था
[घ] सभी
Q5: आधुनिक काल में औद्योगीकरण ने किसके स्वरूप को गहन रूप से प्रभावित किया ?
[क] ग्रामीणकरण
[ख] शहरीकरण
[ग] कस्बों
[घ] बन्दरगाहों
Q6: जनसंख्या का घनत्व सबसे अधिक कहाँ होता है ?
[क] ग्राम
[ख] कस्बा
[ग] नगर
[घ] महानगर
Q7: 1810 से 1880 ई. तक लंदन की आबादी 10 लाख से बढ़कर कहाँ तक पहुँची ?
[क] 20 लाख
[ख] 30 लाख
[ग] 40 लाख
[घ] 50 लाख
Q8: लंदन में अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा कब लागू हुई ?
[क] 1850
[ख] 1855
[ग] 1860
[घ] 1870
Q9: कौन सा सामाजिक वर्ग बुद्धिजीवी वर्ग के रूप में उभर कर आया ?
[क] उद्योगपति वर्ग
[ख] पूंजीपति वर्ग
[ग] श्रमिक वर्ग
[घ] मध्यम वर्ग
Q10: पूंजीपति वर्ग के द्वारा किस वर्ग का शोषण हुआ ?
[क] श्रमिक वर्ग
[ख] मध्यम वर्ग
[ग] कृषक वर्ग
[घ] सभी वर्ग

रिक्त स्थानों की पूर्ति करें :

1. शहरो के विस्तार में भव्य “परफ़ोटोक” का निर्माण हुआ ।
2. लंदन भारी संख्या में “प्रवासियों” को आकर्षित करने में सफल हुई ।
3. शहरों में रहने वाले “बाध्यताओं” से सीमित थे ।
4. “विकासशील” देशों में नगरों के प्रति रुझान देखा जाता है ।
5. “नगर प्रबंधन” के द्वारा निवास तथा आवासीय पद्धति, जन यातायात के साधन, जन स्वास्थ्य इत्यादि के उपाय किये गये ।

BSEB 10th History Exercise 6 Solution in Hindi
समूहों का मिलन :

मिलन करने वाले प्रश्नों में उसका सही उत्तर उस प्रश्न के सामने ही दिया गया है।
समूह ‘अ’ समूह ‘ब’
1. मैनचेस्टर लंकाशायर शेफिल्ड (5) औद्योगिक नगर
2. चिकित्सक (4) मध्यम वर्ग
3. प्रतियोगी मुद्रा प्रधान अर्थव्यवस्था (1) नगर
4. बम्बई (2) वाणिज्यिक राजधानी
5. हिन्द महासभा (3) बेरॉन हॉसमान

शहरीकरण एवं शहरी जीवन : लघु उत्तरीय प्रश्न (60 शब्दों में उत्तर दें)

Q1: किन तीन प्रक्रियाओं के द्वारा आधुनिक शहरों की स्थापना निर्णायक रूप से हुई?
उत्तर : आधुनिक शहरों की स्थापना मुख्य रूप से तीन ऐतिहासिक प्रक्रियाओं का परिणाम थी। सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया औद्योगिकीकरण की शुरुआत थी, जिसने बड़े पैमाने पर कारखानों की स्थापना की और रोजगार के नए अवसर पैदा किए। दूसरी प्रक्रिया आधुनिक शासन व्यवस्था और औपनिवेशिक नियंत्रण का विस्तार था, जिससे नए प्रशासनिक और व्यापारिक केंद्रों का उदय हुआ। अंत में, लोकतांत्रिक सिद्धांतों के विकास और जनसांख्यिकीय बदलाव ने ग्रामीण आबादी को शहरों की ओर आकर्षित कर नगरीकरण को निर्णायक गति प्रदान की।
Q2: समाज का वर्गीकरण ग्रामीण एवं नगरीय क्षेत्रों में किस भिन्नता के आधार पर किया जाता है?
उत्तर : समाज का वर्गीकरण मुख्य रूप से जनसंख्या के घनत्व, आर्थिक गतिविधियों और जीवन शैली की भिन्नता के आधार पर किया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में आबादी कम होती है और लोग मुख्य रूप से कृषि जैसे प्राथमिक कार्यों पर निर्भर रहते हैं। इसके विपरीत, नगरीय क्षेत्रों में जनसंख्या का घनत्व अधिक होता है और यहाँ के लोग व्यापार, उद्योग और सेवा क्षेत्र में लगे होते हैं। शहरों में सामाजिक संबंध अक्सर औपचारिक होते हैं, जबकि गाँवों में घनिष्ठता अधिक पाई जाती है।
Q3: आर्थिक तथा प्रशासनिक संदर्भ में ग्रामीण तथा नगरीय बनावट के दो प्रमुख आधार क्या हैं?
उत्तर : आर्थिक तथा प्रशासनिक संदर्भ में ग्रामीण तथा नगरीय बनावट के दो प्रमुख आधार जनसंख्या का घनत्व तथा आर्थिक क्रियाओं की प्रकृति हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में जनसंख्या का घनत्व कम होता है और यहाँ की मुख्य आबादी कृषि जैसे प्राथमिक कार्यों पर निर्भर रहती है। इसके विपरीत, नगरीय क्षेत्रों में जनसंख्या का घनत्व अधिक होता है और वहाँ की अधिकांश जनसंख्या गैर-कृषि कार्यों जैसे व्यापार, उद्योग और सेवा क्षेत्र में संलग्न रहती है।
Q4: गांव के कृषिजन्य आर्थिक क्रियाकलापों की विशेषता को दर्शायें।
उत्तर : गाँव के कृषिजन्य आर्थिक क्रियाकलाप मुख्य रूप से खेती, पशुपालन और डेयरी जैसे कार्यों पर आधारित होते हैं। यहाँ की अधिकांश जनसंख्या अपनी जीविका के लिए प्रत्यक्ष रूप से भूमि और उसकी उर्वरता पर निर्भर रहती है। इन क्रियाकलापों की प्रमुख विशेषता मानसून पर निर्भरता और पारंपरिक कृषि पद्धतियों का उपयोग है। इसके अतिरिक्त, ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मौसमी बेरोजगारी की प्रधानता रहती है, जहाँ श्रम की मांग फसलों की बुवाई और कटाई के समय ही अधिक होती है।
Q5: शहर किस प्रकार की क्रियाओं के केन्द्र होते हैं?
उत्तर : शहर मुख्य रूप से गैर-कृषि कार्यों के केंद्र होते हैं, जहाँ आर्थिक और व्यावसायिक गतिविधियाँ प्रमुखता से चलती हैं। इनमें व्यापार, वाणिज्य, उद्योग, और प्रशासनिक सेवाओं का जमावड़ा होता है। इसके अतिरिक्त, शहर शिक्षा, स्वास्थ्य और मनोरंजन के भी महत्वपूर्ण केंद्र माने जाते हैं। यहाँ की अर्थव्यवस्था विनिर्माण और सेवा क्षेत्र पर आधारित होती है, जो ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में काफी विकसित और जटिल होती है।
Q6: नगरीय जीवन एवं आधुनिकता एक-दूसरे से अभिन्न रूप से कैसे जुड़े हुए हैं?
उत्तर : नगरीय जीवन और आधुनिकता एक-दूसरे के पूरक हैं क्योंकि नगरों का विकास ही आधुनिक दृष्टिकोण, औद्योगिकीकरण और वैज्ञानिक प्रगति का प्रत्यक्ष परिणाम है। शहरों में मिलने वाली उन्नत सुविधाएँ, जैसे बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के विविध अवसर, आधुनिकता के ही प्रतीक माने जाते हैं। यहाँ की गतिशील जीवनशैली, व्यक्तिवाद और नई सोच की स्वीकार्यता आधुनिक विचारों को निरंतर बढ़ावा देती है, जिससे नगरीय समाज और आधुनिकता एक-दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़ जाते हैं।
Q7: नगरों में विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग अल्पसंख्यक है, ऐसी मान्यता क्यों बनी है?
उत्तर : नगरों में विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग को अल्पसंख्यक इसलिए माना जाता है क्योंकि शहर की अधिकांश जनसंख्या श्रमिक वर्ग और आम नागरिकों की होती है। शहर के आर्थिक संसाधनों और राजनैतिक सत्ता पर केवल कुछ मुट्ठी भर प्रभावशाली लोगों का ही नियंत्रण रहता है। इन विशिष्ट लोगों के पास समस्त सुख-सुविधाएँ और अधिकार सुरक्षित होते हैं, जबकि जनसंख्या का एक बहुत बड़ा हिस्सा अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए कठिन संघर्ष करता है। यही विशाल संख्यात्मक अंतर और संसाधनों का असमान वितरण इस प्रभावशाली वर्ग को समाज में अल्पसंख्यक की श्रेणी में खड़ा कर देता है।
Q8: नागरिक अधिकारों के प्रति एक नई चेतना किस प्रकार के आंदोलन या प्रयास से बनी?
उत्तर : नागरिक अधिकारों के प्रति एक नई चेतना मुख्य रूप से लोकतांत्रिक आंदोलनों, जन संघर्षों और सूचना के अधिकार जैसे जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से विकसित हुई है। जब लोगों ने सत्ता में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग की, तो समाज के विभिन्न वर्गों में अपने अधिकारों के प्रति समझ बढ़ी। गैर-सरकारी संगठनों और नागरिक समाज के सक्रिय प्रयासों ने आम जनता को शासन की प्रक्रियाओं में भागीदारी के लिए प्रेरित किया, जिससे अंततः एक सशक्त और जागरूक नागरिक समाज का निर्माण हुआ।
Q9: व्यावसायिक पूँजीवाद ने किस प्रकार नगरों के उद्भव में अपना योगदान दिया?
उत्तर : व्यावसायिक पूँजीवाद ने व्यापार और वाणिज्य के विस्तार के माध्यम से नगरों के विकास को नई गति प्रदान की। इसके कारण नए व्यापारिक केंद्रों और मंडियों की स्थापना हुई, जहाँ वस्तुओं का विनिमय बड़े स्तर पर होने लगा। पूँजीपतियों द्वारा भारी पूँजी निवेश करने से उत्पादन के साधनों में वृद्धि हुई, जिससे रोजगार के नए अवसर पैदा हुए। गाँवों से लोगों का इन केंद्रों की ओर बड़े पैमाने पर पलायन बढ़ा, जिससे धीरे-धीरे ये व्यापारिक क्षेत्र बड़े औद्योगिक नगरों के रूप में परिवर्तित हो गए।
Q10: शहरों के उद्भव में मध्यम वर्ग की भूमिका किस प्रकार की रही?
उत्तर : शहरों के उद्भव में मध्यम वर्ग की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। औद्योगीकरण और व्यापार के विस्तार ने शहरों में नए आर्थिक अवसरों को जन्म दिया, जिससे शिक्षक, वकील, डॉक्टर, और क्लर्क जैसे नए बुद्धिजीवी वर्ग का उदय हुआ। इस वर्ग ने न केवल शहरी प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने में मदद की, बल्कि आधुनिक विचारों, शिक्षा और नई जीवनशैली को भी बढ़ावा दिया, जिससे शहरी समाज का स्वरूप और भी विकसित हुआ।
Q11: श्रमिक वर्ग का आगमन शहरों में किस परिस्थितियों के अन्तर्गत हुआ?
उत्तर : शहरों में श्रमिक वर्ग का आगमन मुख्य रूप से औद्योगिकीकरण और आधुनिक कारखानों की स्थापना के कारण हुआ। गांवों में कुटीर उद्योगों के पतन और कृषि में आए बदलावों के कारण बड़ी संख्या में भूमिहीन किसान और मजदूर बेरोजगार हो गए थे। अपनी जीविका की तलाश और रोजगार के अवसरों के आकर्षण में ये लोग शहरों की ओर पलायन करने लगे। शहरों में रहने की विकट परिस्थितियों और तंग बस्तियों के बावजूद, औद्योगिक विकास की मांग ने उन्हें वहां बसने के लिए विवश किया।
Q12: शहरों ने किन नई समस्याओं को जन्म दिया?
उत्तर : शहरों के तेजी से विकास और बढ़ती जनसंख्या ने कई नई गंभीर समस्याओं को जन्म दिया। अत्यधिक भीड़ के कारण आवास की समस्या उत्पन्न हुई, जिससे शहरों में मलिन बस्तियों का विस्तार हुआ जहाँ स्वास्थ्य और स्वच्छता का अभाव था। इसके अतिरिक्त, औद्योगीकरण ने भीषण पर्यावरणीय प्रदूषण और सामाजिक स्तर पर अमीरों एवं गरीबों के बीच आर्थिक असमानता को बढ़ावा दिया, जिससे शहरी जीवन जटिल हो गया।

शहरीकरण एवं शहरी जीवन : दीर्घउत्तरीय प्रश्न (150 शब्दों में उत्तर दें)

Q1: शहरों के विकास की पृष्ठभूमि एवं उसकी प्रक्रिया पर प्रकाश डालें।
उत्तर : शहरों के विकास की ऐतिहासिक : शहरों का विकास मानवीय सभ्यता के इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और जटिल प्रक्रिया रही है। प्राचीन काल में शहरीकरण की शुरुआत उन भौगोलिक क्षेत्रों में हुई जहाँ कृषि उत्पादन अधिशेष में था, जिससे व्यापार और शिल्प कौशल को बढ़ावा मिला। बिहार बोर्ड की पाठ्यपुस्तकों के अनुसार, मध्यकाल तक शहर मुख्य रूप से राजनीतिक सत्ता, धार्मिक गतिविधियों और क्षेत्रीय व्यापार के केंद्र हुआ करते थे। इन शहरों की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले कच्चे माल और खाद्यान्न पर निर्भर करती थी। शहरी जीवन की प्रारंभिक विशेषता एक निश्चित सामाजिक संरचना और व्यावसायिक विविधता थी, जिसने धीरे-धीरे सामंती व्यवस्था के बंधनों को तोड़कर एक नई शहरी संस्कृति और स्वतंत्र पहचान को जन्म दिया।

औद्योगिक क्रांति और शहरीकरण की तीव्र प्रक्रिया : शहरीकरण की प्रक्रिया में सबसे बड़ा और युगांतरकारी बदलाव औद्योगिक क्रांति के साथ आया। अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मशीनों के आविष्कार और बड़े पैमाने पर कारखानों की स्थापना ने जनसंख्या को गाँवों से शहरों की ओर तीव्र गति से आकर्षित किया। जब उत्पादन के साधनों पर पूँजीपतियों का नियंत्रण हुआ, तो बेहतर रोजगार और आजीविका की तलाश में श्रमिक वर्ग बड़ी संख्या में औद्योगिक केंद्रों में बसने लगे। इस प्रक्रिया ने न केवल शहरों के भौतिक स्वरूप को बदला, बल्कि वहाँ की जीवनशैली और सामाजिक ताने-बने में भी आमूल-चूल परिवर्तन किए। लंदन, मैनचेस्टर और भारत के संदर्भ में मुंबई जैसे शहर इसी औद्योगिक विकास के प्रत्यक्ष परिणाम हैं। इस दौर में शहरों का विस्तार अक्सर अनियोजित तरीके से हुआ, जिसके परिणामस्वरूप घनी आबादी वाली बस्तियों और अस्वास्थ्यकर परिस्थितियों का भी जन्म हुआ।

नए सामाजिक वर्गों का उदय और आधुनिक प्रभाव : शहरीकरण की इस प्रक्रिया ने समाज को तीन प्रमुख वर्गों में स्पष्ट रूप से विभाजित कर दिया, जिनमें पूँजीपति वर्ग, मध्यम वर्ग और श्रमिक वर्ग शामिल थे। इनमें मध्यम वर्ग, जिसमें शिक्षक, वकील, डॉक्टर, इंजीनियर और क्लर्क जैसे पेशेवर लोग आते थे, आधुनिक शहरों की वैचारिक रीढ़ बना। इस वर्ग ने राजनीतिक चेतना, शिक्षा के प्रसार और लोकतांत्रिक मूल्यों के विकास में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। दूसरी ओर, श्रमिक वर्ग को प्रारंभिक दौर में अत्यंत कठिन परिस्थितियों और शोषण का सामना करना पड़ा, जिससे कालांतर में श्रमिक संगठनों और उनके अधिकारों के लिए आंदोलनों की शुरुआत हुई। आधुनिक शहरों के विकास में परिवहन के साधनों, जैसे रेलवे और सड़कों के विस्तार ने भी अहम योगदान दिया, जिसने दूर-दराज के क्षेत्रों को शहरी केंद्रों से जोड़ दिया। अंततः, शहरों का विकास केवल बड़ी इमारतों का निर्माण नहीं था, बल्कि यह एक ऐसी नवीन सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था का उदय था जिसने पूरी दुनिया की सभ्यता के स्वरूप को आधुनिकता की ओर मोड़ दिया।
Q2: ग्रामीण तथा नगरीय जीवन के बीच की भिन्नता को स्पष्ट करें।
उत्तर : ग्रामीण एवं नगरीय जीवन का आधारभूत परिचय : ग्रामीण और नगरीय जीवन के बीच की भिन्नता मानव सभ्यता के विकास के विभिन्न चरणों को दर्शाती है। ग्रामीण जीवन मुख्य रूप से कृषि और प्रकृति पर आधारित होता है, जहाँ सादगी और पारंपरिक मूल्यों की प्रधानता होती है। इसके विपरीत, नगरीय जीवन औद्योगिकीकरण, व्यापार और आधुनिकता का प्रतीक है। इन दोनों क्षेत्रों में जनसंख्या का घनत्व, व्यवसाय के साधन और सामाजिक दृष्टिकोण पूरी तरह से अलग होते हैं। जहाँ गाँव में लोग एक-दूसरे से भावनात्मक रूप से जुड़े होते हैं, वहीं शहरों में पेशेवर और औपचारिक संबंधों का अधिक महत्व होता है। बिहार बोर्ड की पाठ्यपुस्तकों के अनुसार, यह अंतर न केवल आर्थिक है बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक भी है।

आर्थिक संरचना और व्यावसायिक भिन्नता : ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मुख्य स्तंभ खेती-बारी, पशुपालन और लघु उद्योग होते हैं। यहाँ के लोग अपनी आजीविका के लिए सीधे तौर पर प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर रहते हैं। गाँवों में श्रम का विभाजन कम होता है और अधिकांश लोग एक ही प्रकार के कार्यों में लगे होते हैं। इसके विपरीत, शहरों में आर्थिक गतिविधियों का दायरा अत्यंत विस्तृत होता है। नगरीय जीवन में विनिर्माण, व्यापार, बैंकिंग, प्रशासन और विभिन्न सेवा क्षेत्र मुख्य भूमिका निभाते हैं। शहरों में रोजगार के अवसर और बेहतर वेतन की संभावना अधिक होती है, जिसके कारण ग्रामीण क्षेत्रों से लोगों का पलायन शहरों की ओर निरंतर बना रहता है।

सामाजिक वातावरण और जीवनशैली : ग्रामीण समाज में सामुदायिकता की भावना प्रबल होती है। लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में सम्मिलित होते हैं और उनके बीच गहरा सामाजिक जुड़ाव होता है। गाँव की जीवनशैली शांत और धीमी होती है, जहाँ संयुक्त परिवार और पारंपरिक प्रथाओं का महत्व होता है। इसके उलट, नगरीय जीवन में व्यक्तिवाद का बोलबाला होता है। शहरों की भारी भीड़भाड़ में भी व्यक्ति अक्सर अकेलापन महसूस करता है क्योंकि वहाँ लोग अपनी व्यस्त दिनचर्या और निजी हितों को अधिक प्राथमिकता देते हैं। शहरों का जीवन अत्यंत तीव्र और प्रतिस्पर्धात्मक होता है, जहाँ भौतिक सुख-सुविधाओं की होड़ लगी रहती है और सामाजिक संबध औपचारिक मात्र रह जाते हैं।

आधारभूत सुविधाएँ और विकास के अवसर : नगरीय और ग्रामीण जीवन के बीच एक बड़ा अंतर सुविधाओं की उपलब्धता का भी है। शहरों में उच्च शिक्षा के केंद्र, आधुनिक चिकित्सा सुविधाएँ, विकसित परिवहन तंत्र और मनोरंजन के विभिन्न साधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते हैं। यही कारण है कि शहरों को आर्थिक और बौद्धिक विकास का केंद्र माना जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी इन मूलभूत सुविधाओं का तुलनात्मक रूप से अभाव देखने को मिलता है, हालांकि वर्तमान विकास कार्यों से स्थिति बदल रही है। शहरों की बुनियादी संरचना जैसे बिजली की निर्बाध आपूर्ति, पक्की सड़कें और उन्नत संचार व्यवस्था गाँवों की तुलना में कहीं अधिक व्यवस्थित और आधुनिक होती है।

पर्यावरणीय प्रभाव : पर्यावरण की दृष्टि से देखा जाए तो ग्रामीण जीवन अधिक स्वच्छ और स्वास्थ्यवर्धक होता है। गाँवों में हरियाली, शुद्ध हवा और प्राकृतिक शांति होती है, जबकि शहरों में प्रदूषण, शोर-शराबा और कंक्रीट के ढाँचों की अधिकता होती है। शहरों का वातावरण अक्सर तनावपूर्ण और स्वास्थ्य के लिए चुनौतीपूर्ण होता है। निष्कर्षतः, ग्रामीण और नगरीय जीवन दोनों के अपने-अपने गुण और दोष हैं। जहाँ गाँव हमें सांस्कृतिक जड़ों और प्रकृति से जोड़ते हैं, वहीं शहर हमें प्रगति, आधुनिकता और वैश्विक अवसरों के द्वार दिखाते हैं। दोनों ही क्षेत्र एक-दूसरे पर निर्भर हैं और राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के लिए दोनों का संतुलित विकास अनिवार्य है।
Q3: शहरी जीवन में किस प्रकार के सामाजिक बदलाव आए?
उत्तर : आधुनिकीकरण और शहरीकरण ने पारंपरिक सामाजिक संरचनाओं को पूरी तरह से बदल दिया। बिहार बोर्ड की पाठ्यपुस्तकों के अनुसार, शहरों के विकास के साथ ही समाज में नए वर्गों का उदय हुआ और मानवीय संबंधों के स्वरूप में मौलिक परिवर्तन आए। ग्रामीण इलाकों में जहाँ संयुक्त परिवार और सामुदायिक पहचान को प्राथमिकता दी जाती थी, वहीं शहरों ने व्यक्तिवाद की भावना को बढ़ावा दिया। शहरी जीवन ने लोगों को पुराने सामाजिक बंधनों से मुक्त कर एक नई पहचान बनाने का अवसर प्रदान किया, जिससे समाज में एक नई गतिशीलता पैदा हुई।

शहरीकरण का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम मध्यम वर्ग का उदय था। यह वर्ग न तो बहुत अमीर था और न ही बहुत गरीब, बल्कि इसमें डॉक्टर, वकील, शिक्षक, इंजीनियर और क्लर्क जैसे पेशेवर लोग शामिल थे। इस वर्ग ने समाज में एक बौद्धिक नेतृत्व प्रदान किया और सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों में मुख्य भूमिका निभाई। मध्यम वर्ग के लोग शिक्षा और आधुनिक विचारों के प्रति अधिक जागरूक थे, जिसने समाज में रूढ़िवादिता को कम करने और तार्किक सोच को विकसित करने में मदद की। इसी वर्ग ने लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की मांग को भी पुरजोर तरीके से उठाया।

शहरी जीवन ने महिलाओं की सामाजिक स्थिति में भी व्यापक बदलाव किए। शहरों में शिक्षा की उपलब्धता और कामकाजी अवसरों के कारण महिलाएं घर की चारदीवारी से बाहर निकलने लगीं। हालांकि शुरुआती दौर में उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने सार्वजनिक जीवन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। औद्योगिक शहरों में बड़ी संख्या में महिलाएं कारखानों में काम करने लगीं, जिससे उनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ी। इसके साथ ही, महिलाओं के अधिकारों और मताधिकार के लिए आंदोलनों की शुरुआत भी शहरी वातावरण में ही हुई, जिसने समाज में लैंगिक समानता की नींव रखी।

औद्योगीकरण के कारण शहरों में एक विशाल श्रमिक वर्ग का निर्माण हुआ। गाँवों से रोजगार की तलाश में आए लोग शहरों में आकर बस गए, जिससे जनसंख्या का घनत्व अत्यधिक बढ़ गया। इस वर्ग को रहने के लिए तंग जगहों और अस्वच्छ बस्तियों जिन्हें चॉल या स्लम कहा जाता था, में रहना पड़ता था। हालांकि शहरी जीवन ने उन्हें नए प्रकार के रोजगार दिए, लेकिन उनके जीवन की स्थितियाँ बहुत दयनीय थीं। इस श्रमिक वर्ग की मौजूदगी ने समाज में वर्ग संघर्ष और श्रम संगठनों की विचारधारा को जन्म दिया, जिससे सामाजिक न्याय की नई अवधारणाएं विकसित हुईं।

शहरीकरण ने पारंपरिक संयुक्त परिवार प्रणाली को कमजोर कर दिया और एकल परिवार की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया। शहरों में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की चाह ने लोगों को परिवार के बजाय अपनी व्यक्तिगत प्रगति पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रेरित किया। शहरी जीवन में सामाजिक संबंध अब रक्त संबंधों के बजाय पेशेवर और हितों पर आधारित होने लगे। सार्वजनिक स्थानों जैसे पार्क, थिएटर और बाजारों ने सामाजिक मेलजोल के नए केंद्र बनाए, जहाँ अलग-अलग जातियों और धर्मों के लोग एक साथ आने लगे, जिससे पुराने जातिगत भेदभावों में कुछ हद तक कमी आई।
Q4: शहरीकरण की प्रक्रिया में व्यवसायी वर्ग, मध्यम वर्ग एवं मजदूर वर्ग की भूमिका की चर्चा करें।
उत्तर : आधुनिक काल में शहरीकरण की प्रक्रिया का गहरा संबंध औद्योगिक क्रांति से रहा है। जैसे-जैसे उद्योगों का विस्तार हुआ, ग्रामीण क्षेत्रों से लोगों का पलायन शहरों की ओर बढ़ा, जिससे समाज की संरचना में क्रांतिकारी बदलाव आए। इस प्रक्रिया ने समाज को मुख्य रूप से तीन वर्गों में विभाजित कर दिया, जिसमें व्यवसायी वर्ग, मध्यम वर्ग और मजदूर वर्ग शामिल थे। इन तीनों वर्गों ने शहरों के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्वरूप को गढ़ने में अपनी विशिष्ट भूमिका निभाई।

शहरीकरण की प्रक्रिया में व्यवसायी वर्ग अथवा पूँजीपति वर्ग की भूमिका सबसे निर्णायक रही है। इस वर्ग ने शहरों के बुनियादी ढाँचे के निर्माण के लिए आवश्यक पूँजी निवेश किया। बड़े-बड़े कारखानों, मिलों और व्यापारिक केंद्रों की स्थापना करके उन्होंने शहरों को आर्थिक गतिविधियों का केंद्र बना दिया। उनके द्वारा किए गए निवेश के कारण ही सड़कों, रेलमार्गों और बंदरगाहों का विकास हुआ, जिससे व्यापार सुगम हुआ। इस वर्ग ने न केवल शहरों को आर्थिक मजबूती प्रदान की, बल्कि वैश्विक स्तर पर शहरी संस्कृति के प्रसार में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। हालांकि, उनका मुख्य लक्ष्य अधिक से अधिक लाभ कमाना था, जिसके कारण शहरों में संसाधनों का असमान वितरण भी देखने को मिला।

मध्यम वर्ग का उदय और प्रभाव : शहरीकरण के परिणामस्वरूप उभरा मध्यम वर्ग एक नई सामाजिक चेतना का प्रतीक बना। इस वर्ग में मुख्य रूप से शिक्षक, वकील, डॉक्टर, इंजीनियर, क्लर्क और छोटे व्यापारी शामिल थे। मध्यम वर्ग ने शहरी समाज में एक बौद्धिक और प्रशासनिक सेतु का कार्य किया। उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों, शिक्षा और आधुनिक विचारों के प्रसार में अग्रणी भूमिका निभाई। शहरों के सांस्कृतिक जीवन और सामाजिक सुधार आंदोलनों का नेतृत्व भी इसी वर्ग के हाथों में रहा। मध्यम वर्ग की उपस्थिति ने शहरों को केवल आर्थिक इकाई न रहने देकर उन्हें विचारों और नवाचारों का केंद्र बना दिया। उनकी माँगों और जागरूकता के कारण ही शहरों में सार्वजनिक सुविधाओं जैसे शिक्षा संस्थान और नागरिक सुरक्षा के प्रति सरकारें सक्रिय हुईं।

मजदूर वर्ग की स्थिति और भूमिका : शहरीकरण का सबसे विशाल और मेहनतकश हिस्सा मजदूर वर्ग था। ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि की दयनीय स्थिति के कारण बड़ी संख्या में लोग रोजगार की तलाश में शहरों की ओर खिंचे चले आए। इन मजदूरों ने औद्योगिक इकाइयों में कठिन श्रम करके शहरी अर्थव्यवस्था को गति प्रदान की। शहरों की गगनचुंबी इमारतों से लेकर विशाल कारखानों तक, हर निर्माण में इस वर्ग का पसीना शामिल रहा है। परंतु, शहरीकरण की इस प्रक्रिया में सबसे अधिक शोषण भी इसी वर्ग का हुआ। उन्हें शहरों के अत्यंत भीड़भाड़ वाले इलाकों और अस्वास्थ्यकर चॉल या बस्तियों में रहना पड़ा। उनके संघर्षों ने ही आगे चलकर श्रम कानूनों और सामाजिक न्याय की अवधारणा को जन्म दिया। मजदूरों के प्रवास ने शहरों के जनसांख्यिकीय स्वरूप को पूरी तरह बदल दिया और एक नई ‘श्रमिक संस्कृति’ का उदय हुआ।
Q5: एक औपनिवेशिक शहर के रूप में बम्बई शहर के विकास की समीक्षा करें।
उत्तर : बम्बई (वर्तमान मुंबई) का एक प्रमुख औपनिवेशिक शहर के रूप में विकास भारतीय इतिहास की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और जटिल प्रक्रिया रही है। प्रारंभ में, बम्बई सात अलग-अलग टापुओं का एक छोटा समूह था, जिस पर मूलतः पुर्तगालियों का नियंत्रण था। 1661 में पुर्तगाली राजकुमारी कैथरीन ऑफ ब्रेगेंजा का विवाह इंग्लैंड के राजा चार्ल्स द्वितीय से होने पर ये द्वीप अंग्रेजों को दहेज के रूप में प्राप्त हुए। इसके पश्चात, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने इसे मात्र 10 पाउंड के वार्षिक किराए पर लेकर अपने व्यापारिक केंद्र के रूप में विकसित करना शुरू किया। अठारहवीं शताब्दी के अंत तक, बम्बई ने सूरत के स्थान पर पश्चिमी भारत के मुख्य व्यापारिक केंद्र की जगह ले ली थी, जिससे यहाँ बड़ी संख्या में व्यापारियों, बैंकरों और शिल्पकारों का आगमन हुआ और शहर की आबादी तेजी से बढ़ने लगी।

व्यापारिक विस्तार और आर्थिक आधार : बम्बई की आर्थिक प्रगति के पीछे सूती वस्त्र उद्योग और चीन के साथ होने वाले अफीम के व्यापार की केंद्रीय भूमिका रही। 1861 में जब अमेरिका में गृह युद्ध छिड़ा, तो ब्रिटेन को अमेरिका से होने वाली कपास की आपूर्ति पूरी तरह बाधित हो गई। इस परिस्थिति में भारतीय कपास की मांग वैश्विक बाजार में अत्यधिक बढ़ गई, जिसका सीधा लाभ बम्बई के व्यापारियों और बंदरगाह को मिला। इस आर्थिक उछाल ने शहर में भारी पूंजी का निवेश किया और यहाँ के स्थानीय व्यापारियों को समृद्ध बनाया। इसके बाद 1869 में स्वेज नहर के खुलने से बम्बई और यूरोप के बीच की दूरी कम हो गई, जिससे यह बंदरगाह विश्व अर्थव्यवस्था के एक प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित हो गया और इसे भारत का प्रवेश द्वार (Gateway of India) कहा जाने लगा।

भूमि सुधार और शहरी नियोजन : बम्बई की सबसे बड़ी चुनौती इसकी भौगोलिक स्थिति थी क्योंकि यहाँ बढ़ती आबादी के लिए भूमि का अभाव था। इस समस्या के समाधान के लिए भूमि सुधार की प्रक्रिया अपनाई गई। सात टापुओं को आपस में जोड़ने के लिए समुद्र को भरकर नई भूमि तैयार की गई, जिसमें बैकबे रिक्लेमेशन जैसी परियोजनाएं अत्यंत महत्वपूर्ण थीं। जैसे-जैसे शहर का विस्तार हुआ, यहाँ दो अलग-अलग हिस्से स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे। एक ओर अंग्रेजों का व्यवस्थित और भव्य किला क्षेत्र था, जहाँ चौड़ी सड़कें और सार्वजनिक भवन थे, तो दूसरी ओर स्थानीय भारतीयों का सघन और भीड़भाड़ वाला नेटिव टाउन विकसित हुआ। भूमि के अभाव ने यहाँ चाल (Chawls) जैसी अनूठी आवासीय व्यवस्था को जन्म दिया, जहाँ मजदूर वर्ग के लोग बेहद सीमित स्थान में निवास करते थे।

वास्तुकला और आधुनिक पहचान : औपनिवेशिक शासन के दौरान बम्बई की इमारतों को ब्रिटिश साम्राज्य की शक्ति और भव्यता के प्रतीक के रूप में डिजाइन किया गया। यहाँ की वास्तुकला में नियो-गोथिक शैली का व्यापक प्रयोग हुआ, जिसके उदाहरण बॉम्बे हाई कोर्ट, यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी और विक्टोरिया टर्मिनस (अब छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस) जैसी विशाल इमारतों में देखे जा सकते हैं। साथ ही, बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में इंडो-सारसेनिक शैली का विकास हुआ, जिसमें गेटवे ऑफ इंडिया जैसी भव्य संरचनाएं बनाई गईं। 1853 में भारत की पहली रेलवे लाइन का बम्बई से ठाणे के बीच चलना भी इस शहर के आधुनिकीकरण में एक मील का पत्थर साबित हुआ। अंततः, अपनी औद्योगिक मिलों, विशाल बंदरगाह और विविध सांस्कृतिक परिवेश के कारण बम्बई एक प्रमुख औपनिवेशिक महानगर और भारत की आर्थिक राजधानी के रूप में विकसित हुआ।

BSEB 10th History Exercise 6 Solution in Hindi : PDF कैसे Download करें।

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क्रमांक अध्याय
1 यूरोप में राष्ट्रवाद
2 समाजवाद एवं साम्यवाद
3 हिन्द-चीन में राष्ट्रवादी आन्दोलन
4 भारत में राष्ट्रवाद
5 अर्थव्यवस्था और आजीविका
7 व्यापार और भूमंडलीकरण
8 प्रेस-संस्कृति एवं राष्ट्रवाद
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