BSEB 10th History Exercise 7 Solution in Hindi

BSEB 10th History Exercise 7 Solution in Hindi : बिहार बोर्ड कक्षा 10 इतिहास अध्याय 7 'व्यापार और भूमंडलीकरण' का विस्तृत समाधान और सभी प्रश्न उत्तर पाएं।

हम बिहार बोर्ड कक्षा 10 इतिहास के अध्याय 7 ‘व्यापार और भूमंडलीकरण’ के समाधान को वस्तुनिष्ठ प्रश्नों (Objective Questions) और विषयनिष्ठ प्रश्नों (Subjective Questions) के साथ आसान, स्पष्ट और बिहार बोर्ड के नवीनतम पाठ्यक्रम पर आधारित लेकर आए हैं। यदि आप सभी छात्रों को किसी भी प्रश्न या किसी भी concept को लेकर संदेह है तो उनका सबका उत्तर नीचे दिया गया है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

Q1: प्राचीन काल में किस स्थल मार्ग से एशिया और यूरोप का व्यापार होता था ?
[क] सूती मार्ग
[ख] रेशम मार्ग
[ग] उत्तरा पथ
[घ] दक्षिण पथ
Q2: पहला विश्व बाजार के रूप में कौन-सा शहर उभर कर आया ?
[क] अलेक्जेंन्ड्रिया
[ख] दिलमुन
[ग] मैनचेस्टर
[घ] बहारीन
Q3: आधुनिक युग में अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में होने वाली सबसे बड़ी क्रांति कौन-सी थी ?
[क] वाणिज्यिक क्रांति
[ख] औद्योगिक क्रांति
[ग] साम्यवादी क्रांति
[घ] भौगोलिक खोज
Q4: ‘गिरमिटिया मजदूर’ बिहार के किस क्षेत्र से भेजे जाते थे ?
[क] पूर्वी क्षेत्र
[ख] पश्चिमी क्षेत्र
[ग] उत्तरी क्षेत्र
[घ] दक्षिणी क्षेत्र
Q5: विश्व बाजार का विस्तार आधुनिक काल में किस समय से आरंभ हुआ ?
[क] 15वीं शताब्दी
[ख] 18वीं शताब्दी
[ग] 19वीं शताब्दी
[घ] 20वीं शताब्दी
Q6: विश्वव्यापी आर्थिक संकट किस वर्ष आरंभ हुआ था ?
[क] 1914
[ख] 1922
[ग] 1929
[घ] 1927
Q7: आर्थिक संकट (मंदी) के कारण यूरोप में कौन-सी नई शासन प्रणाली का उदय हुआ?
[क] साम्यवादी शासन प्रणाली
[ख] लोकतांत्रिक शासन प्रणाली
[ग] फासीवादी-नाजीवादी शासन
[घ] पूँजीवादी शासन प्रणाली
Q8: ब्रेटन वुड्स सम्मेलन किस वर्ष हुआ ?
[क] 1947
[ख] 1948
[ग] 1944
[घ] 1952
Q9: भूमंडलीकरण की शुरुआत किस दशक में हुई?
[क] 1990 के दशक में
[ख] 1970 के दशक में
[ग] 1960 के दशक में
[घ] 1980 के दशक में
Q10: द्वितीय महायुद्ध के बाद यूरोप में आर्थिक दुष्प्रभावों को समाप्त करने के लिए कौन-सी संस्था उभरी ?
[क] सार्क
[ख] नाटो
[ग] ओपेक
[घ] यूरोपीय संघ

रिक्त स्थानों की पूर्ति करें :

1. अलेग्जेक्ड्रीय नामक पहला विश्व बाजार यूनानी सम्राट सिकन्दर के द्वारा स्थापित किया गया।
2. विश्वव्यापी आर्थिक संकट यूरोपीय देश से आरंभ हुआ।
3. ब्रेटन वुड्स नामक सम्मेलन के द्वारा विश्व बैंक और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की स्थापना हुई?
4. आर्थिक संकट से विश्व स्तर पर बेरोजगारी नामक एक बड़ी सामाजिक समस्या उदित हुआ?
5. जॉन विलियन्स ने 1990 के बाद भूमंडलीकरण की प्रक्रिया को काफी तीव्र कर दिया?
सही मिलान करें स्तम्भ ‘क’ से स्तम्भ ‘ख’ का
मिलन करने वाले प्रश्नों में उसका सही उत्तर उस प्रश्न के सामने ही दिया गया है।
स्तम्भ ‘क’ स्तम्भ ‘ख’
(क) औद्योगिक क्रान्ति इंग्लैण्ड
(ख) हिटलर का उदय जर्मनी
(ग) विश्व आर्थिक मंदी 1929
(घ) विश्व बैंक की स्थापना 1944
(ड.) भूमंडलीकरण की शुरूआत 1990 के बाद
(च) विश्व बाजार की शुरूआत प्राचीन काल

बिहार बोर्ड कक्षा 10 इतिहास अध्याय 7 'व्यापार और भूमंडलीकरण' : Very Short Question Answer

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (20 शब्दों में उत्तर दें)

Q1: विश्व बाजार किसे कहते हैं?
उत्तर : ऐसा बाजार जहाँ विश्व के सभी देशों की वस्तुएँ आम लोगों के खरीदने के लिए उपलब्ध हों, उसे विश्व बाजार कहते हैं।
Q2: औद्योगिक क्रांति क्या है?
उत्तर : 18वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में हस्तशिल्प के स्थान पर मशीनों द्वारा बड़े पैमाने पर उत्पादन की प्रक्रिया को ही औद्योगिक क्रांति कहते हैं
Q3: आर्थिक संकट से आप क्या समझते हैं?
उत्तर : जब अर्थव्यवस्था के आधार कृषि, उद्योग और व्यापार ठप्प हो जाते हैं तथा बेरोजगारी बढ़ती है, उसे आर्थिक संकट कहते हैं।
Q4: भूमंडलीकरण किसे कहते हैं?
उत्तर : देश की अर्थव्यवस्था को विश्व की अर्थव्यवस्था के साथ जोड़ना ही भूमंडलीकरण कहलाता है, जिसके अंतर्गत व्यापार और निवेश स्वतंत्र होता है।
Q5: ब्रेटन वुड्स सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य क्या था?
उत्तर : ब्रेटन वुड्स सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद वैश्विक आर्थिक स्थिरता बनाए रखना और सदस्य राष्ट्रों के बीच आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देना था।
Q6: बहुराष्ट्रीय कंपनी क्या है?
उत्तर : वह कंपनी जो एक से अधिक राष्ट्रों में उत्पादन पर नियंत्रण या स्वामित्व रखती है, उसे बहुराष्ट्रीय कंपनी कहा जाता है।

बिहार बोर्ड कक्षा 10 इतिहास अध्याय 7 'व्यापार और भूमंडलीकरण' : Short Question Answer

लघु उत्तरीय प्रश्न (60 शब्दों में उत्तर दें)

Q1: 1920 के आर्थिक संकट के कारणों को संक्षेप में स्पष्ट करें।
उत्तर : प्रथम विश्वयुद्ध के बाद वैश्विक स्तर पर कृषि उत्पादों के अति-उत्पादन के कारण वस्तुओं की कीमतों में भारी गिरावट आई, जिससे किसानों की आय और क्रय शक्ति लगभग समाप्त हो गई। इसके अतिरिक्त, युद्धकालीन माँग की समाप्ति से उद्योगों में मंदी छा गई और बेरोजगारी तेजी से बढ़ी। ऋणों की कमी और अमेरिकी निवेश में गिरावट ने वित्तीय बाजार को अस्थिर कर दिया, जिससे 1920 के दशक के उत्तरार्ध में यह संकट एक वैश्विक आर्थिक महामंदी के रूप में उभरकर सामने आया।
Q2: औद्योगिक क्रांति ने किस प्रकार विश्व बाजार के स्वरूप को विस्तृत किया?
उत्तर : औद्योगिक क्रांति ने उत्पादन की पद्धति को बदलकर विश्व बाजार के स्वरूप को अत्यंत व्यापक बना दिया। बड़े पैमाने पर कारखानों में होने वाले उत्पादन के लिए कच्चे माल की भारी आवश्यकता थी, जिसकी पूर्ति हेतु यूरोपीय देशों ने एशिया और अफ्रीका में नए व्यापारिक मार्ग खोजे। तैयार माल को बेचने के लिए विश्व स्तर पर बाजारों की तलाश शुरू हुई, जिससे विभिन्न महाद्वीपों के बीच व्यापारिक संबंध गहरे हुए। रेलवे और भाप के इंजनों जैसे आधुनिक परिवहन साधनों ने दूर-दराज के क्षेत्रों को वैश्विक व्यापार से जोड़कर स्थानीय बाजारों को अंतरराष्ट्रीय बाजार का रूप दे दिया।
Q3: विश्व बाजार के स्वरूप को समझाएँ।
उत्तर : विश्व बाजार का स्वरूप वह है जिसमें विश्व के सभी देशों की वस्तुएँ आम लोगों के लिए आसानी से उपलब्ध होती हैं। इसकी शुरुआत मुख्य रूप से औद्योगिक क्रांति के बाद हुई, जिसने उत्पादन और व्यापार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैला दिया। वर्तमान में, विश्व बाजार का स्वरूप अत्यंत व्यापक है, जहाँ केवल निर्मित माल ही नहीं बल्कि पूँजी, तकनीक और श्रम का भी वैश्विक स्तर पर तीव्र आदान-प्रदान होता है, जिससे सभी राष्ट्रों के बीच एक मजबूत आर्थिक निर्भरता विकसित हुई है।
Q4: भूमंडलीकरण में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के योगदान (भूमिका) को स्पष्ट करें।
उत्तर : भूमंडलीकरण के प्रसार में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मुख्य भूमिका है। ये कंपनियाँ विश्व के विभिन्न देशों में अपनी पूँजी और तकनीक का निवेश कर उत्पादन इकाइयों की स्थापना करती हैं। इनके द्वारा विभिन्न राष्ट्रों के बीच वस्तुओं, सेवाओं और निवेश का प्रवाह बढ़ा है, जिससे विश्व की अर्थव्यवस्थाएं एकीकृत हुई हैं। विदेशी व्यापार और विदेशी निवेश के माध्यम से ये कंपनियाँ वैश्विक बाजारों को जोड़ने और भूमंडलीकरण को तीव्र बनाने का कार्य करती हैं जिससे उत्पादन और बाजार का विस्तार वैश्विक स्तर पर संभव हुआ है।
Q5: 1950 के बाद विश्व अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण के लिए किए गए प्रयासों पर प्रकाश डालें।
उत्तर : 1950 के बाद विश्व अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण के लिए मुख्य रूप से ब्रेटन वुड्स समझौते के तहत अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं की स्थापना की गई। इन संस्थाओं का मुख्य उद्देश्य युद्ध से जर्जर हो चुकी अर्थव्यवस्थाओं को वित्तीय सहायता और स्थिरता प्रदान करना था। साथ ही, अमेरिका द्वारा लागू मार्शल योजना ने पश्चिमी यूरोप के पुनरुद्धार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। व्यापारिक बाधाओं को कम करने के लिए गेट्ट (GATT) जैसे समझौतों ने वैश्विक व्यापार और आर्थिक विकास को गति प्रदान की।
Q6: भूमंडलीकरण के भारत पर प्रभावों को स्पष्ट करें।
उत्तर : भूमंडलीकरण ने भारतीय अर्थव्यवस्था को व्यापक रूप से प्रभावित किया है। इसके कारण देश में विदेशी पूंजी निवेश और आधुनिक तकनीक का आगमन हुआ, जिससे संचार, बैंकिंग और सूचना प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में अभूतपूर्व प्रगति हुई है। उपभोक्ताओं को अब वैश्विक स्तर की गुणवत्ता वाली वस्तुएं आसानी से उपलब्ध हैं। हालांकि, इसने स्थानीय लघु उद्योगों के समक्ष कड़ी प्रतिस्पर्धा और रोजगार की अनिश्चितता जैसी चुनौतियां भी उत्पन्न की हैं।
Q7: विश्व बाजार के लाभ-हानि पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर : विश्व बाजार ने आधुनिक युग में व्यापार और उद्योग को नई गति प्रदान की है, जिससे कृषि उत्पादों में भारी वृद्धि हुई और उपभोक्ताओं को प्रतिस्पर्धी मूल्यों पर विविध वस्तुएं उपलब्ध हुईं। इसके विपरीत, इसके कारण विकसित देशों द्वारा उपनिवेशों का आर्थिक शोषण बढ़ा और साम्राज्यवाद को प्रोत्साहन मिला। विश्व बाजार के कारण ही आर्थिक मंदी जैसी वैश्विक समस्याएँ उत्पन्न हुईं, जिसने व्यापक बेरोजगारी और निर्धनता को जन्म दिया।

बिहार बोर्ड कक्षा 10 इतिहास अध्याय 7 'व्यापार और भूमंडलीकरण' : Long Question Answer

दीर्घउत्तरीय प्रश्न (150 शब्दों में उत्तर दें)

Q1: 1929 के आर्थिक संकट के कारण और परिणामों को स्पष्ट करें।
उत्तर : 1929 के आर्थिक संकट : 1929 की विश्वव्यापी आर्थिक मंदी आधुनिक विश्व इतिहास की एक अत्यंत विनाशकारी घटना थी, जिसने पूरी दुनिया की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था को झकझोर कर रख दिया था। इस संकट की शुरुआत संयुक्त राज्य अमेरिका के शेयर बाजार के धराशायी होने से हुई और देखते ही देखते इसने वैश्विक रूप धारण कर लिया। यह मंदी लगभग एक दशक तक चली और इसने विकसित तथा विकासशील दोनों प्रकार की अर्थव्यवस्थाओं को गहराई से प्रभावित किया। इस संकट ने न केवल व्यापार और उद्योगों को नष्ट किया, बल्कि वैश्विक राजनीति में भी बड़े बदलावों का मार्ग प्रशस्त किया।

आर्थिक संकट के प्रमुख कारण : इस भीषण आर्थिक मंदी का सबसे प्रमुख और बुनियादी कारण कृषि क्षेत्र में अति-उत्पादन की समस्या थी। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान और उसके बाद कृषि उत्पादों की मांग में भारी वृद्धि हुई थी, लेकिन युद्ध समाप्त होने के बाद जब मांग घटी, तो कीमतों में भारी गिरावट आई। किसानों ने अपनी आय को बनाए रखने के लिए उत्पादन और अधिक बढ़ा दिया, जिससे बाजार में कृषि उत्पादों की बाढ़ आ गई और कीमतें और भी निचले स्तर पर चली गईं। इसके साथ ही, अमेरिकी शेयर बाजार (वॉल स्ट्रीट एक्सचेंज) का अक्टूबर 1929 में अचानक गिरना एक तात्कालिक कारण बना, जिससे निवेशकों का भरोसा टूट गया और बैंकों से पूंजी निकालने की होड़ मच गई। अमेरिका ने दूसरे देशों को दिए जाने वाले ऋणों में भारी कटौती कर दी, जिससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार की गति पूरी तरह रुक गई।

आर्थिक संकट के परिणाम : इस संकट के परिणाम अत्यंत भयावह रहे और इसने दुनिया भर में व्यापक स्तर पर तबाही मचाई। सबसे पहले, औद्योगिक उत्पादन में भारी गिरावट आने के कारण लाखों लोग बेरोजगार हो गए, जिससे गरीबी और भुखमरी का प्रसार हुआ। संयुक्त राज्य अमेरिका में हजारों बैंक दिवालिया हो गए क्योंकि कर्जदार अपना ऋण चुकाने में असमर्थ थे और जमाकर्ता अपनी जमा पूंजी निकालने के लिए बैंकों पर टूट पड़े थे। अंतरराष्ट्रीय व्यापार में लगभग 60 प्रतिशत की कमी आई, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पंगु हो गई। इस आर्थिक अस्थिरता ने विभिन्न देशों में राजनीतिक असंतोष को जन्म दिया, जिसके परिणामस्वरूप जर्मनी में नाजीवाद और इटली में फासीवाद जैसी अधिनायकवादी शक्तियों का उदय हुआ, जिसने अंततः द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार की।

आर्थिक संकट का भारत पर प्रभाव : भारत जैसे औपनिवेशिक देशों पर भी इस मंदी का गहरा प्रभाव पड़ा। यद्यपि भारत एक औद्योगिक राष्ट्र नहीं था, लेकिन वैश्विक बाजार से जुड़े होने के कारण यहाँ के कृषि निर्यात में भारी गिरावट आई। जूट, गेहूं और कपास जैसी नकदी फसलों की कीमतें आधी रह गईं, जिससे भारतीय किसानों की आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई। ब्रिटिश सरकार द्वारा लगान में कोई छूट न दिए जाने के कारण किसानों में असंतोष बढ़ा, जिसने महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन को और अधिक मजबूती प्रदान की। निष्कर्षतः, 1929 की आर्थिक मंदी ने यह स्पष्ट कर दिया कि विश्व की विभिन्न अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे से पूरी तरह जुड़ी हुई हैं और आर्थिक आत्मनिर्भरता के बिना कोई भी देश सुरक्षित नहीं रह सकता है।
Q2: 1945 से 1960 के बीच विश्वस्तर पर विकसित होने वाले आर्थिक संबंधों पर प्रकाश डालें।
उत्तर : द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद 1945 से 1960 के बीच वैश्विक आर्थिक संबंधों में एक क्रांतिकारी बदलाव देखा गया। इस कालखंड की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता ब्रेटन वुड्स सम्मेलन (1944) के माध्यम से एक नई अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक प्रणाली की स्थापना थी। युद्ध की तबाही के बाद औद्योगिक देशों ने यह अनुभव किया कि वैश्विक शांति के लिए आर्थिक स्थिरता और पूर्ण रोजगार अनिवार्य है। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक (World Bank) की स्थापना की गई, जिन्होंने युद्ध से जर्जर हो चुकी यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं के पुनर्निर्माण और वैश्विक व्यापार के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस काल को ब्रेटन वुड्स संस्थाओं के प्रभुत्व का युग माना जाता है, जहाँ स्थिर विनिमय दर प्रणाली के माध्यम से व्यापार को सुगम बनाया गया।

मार्शल योजना और पश्चिमी यूरोप का पुनरुद्धार : इस अवधि के दौरान अमेरिका ने अपनी आर्थिक शक्ति का उपयोग करते हुए मार्शल योजना (Marshall Plan) की शुरुआत की। इसके तहत युद्ध से बुरी तरह प्रभावित पश्चिमी यूरोपीय देशों को भारी वित्तीय सहायता प्रदान की गई ताकि वे साम्यवाद के प्रभाव से बच सकें और अपनी अर्थव्यवस्था को पुनः खड़ा कर सकें। इस योजना ने न केवल यूरोप के औद्योगिक विकास को गति दी, बल्कि वैश्विक स्तर पर अमेरिकी डॉलर को व्यापार की मुख्य मुद्रा के रूप में मजबूती से स्थापित कर दिया। इसके परिणामस्वरूप, पश्चिमी देशों के बीच व्यापारिक संबंधों में मजबूती आई और आर्थिक सहयोग का एक नया युग शुरू हुआ, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में पूंजी का प्रवाह तेज हो गया।

वैश्विक व्यापार और गैट (GATT) की भूमिका : व्यापारिक बाधाओं को दूर करने और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा देने के लिए 1947 में गैट (GATT – General Agreement on Tariffs and Trade) अस्तित्व में आया। इसने सदस्य देशों के बीच शुल्कों को कम करने और भेदभाव रहित व्यापारिक नीतियों को अपनाने पर जोर दिया। 1945 से 1960 के बीच विकसित देशों के उत्पादन और व्यापार में अभूतपूर्व वृद्धि हुई, जिसे अक्सर आर्थिक इतिहास में स्वर्ण युग (Golden Age) के रूप में जाना जाता है। इस दौरान तकनीक का प्रसार हुआ और बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) ने धीरे-धीरे वैश्विक बाजार में अपनी पैठ बनानी शुरू की, जिससे विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे से अधिक मजबूती से जुड़ गईं और औद्योगिक उत्पादन की गति तेज हो गई।

औपनिवेशिक मुक्ति और विकासशील देशों की स्थिति : 1945 के बाद एशिया और अफ्रीका के कई देश औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्र हुए। इन नव-स्वतंत्र राष्ट्रों के सामने अपनी पिछड़ी हुई अर्थव्यवस्था को सुधारने और गरीबी दूर करने की बड़ी चुनौती थी। हालाँकि, शुरुआत में ब्रेटन वुड्स संस्थाओं का मुख्य ध्यान केवल विकसित औद्योगिक देशों पर था, लेकिन 1950 के दशक के उत्तरार्ध तक इन संस्थाओं ने विकासशील देशों के विकास हेतु ऋण और तकनीकी सहायता देना प्रारंभ कर दिया। इन देशों ने अपनी आर्थिक संप्रभुता की रक्षा के लिए और विकसित देशों के आर्थिक वर्चस्व को चुनौती देने के लिए संगठित होना शुरू किया। इसी चेतना ने आगे चलकर विकासशील देशों के समूह जी-77 (G-77) के निर्माण की नींव रखी, जो एक नई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO) की मांग करने लगे। इस प्रकार 1945 से 1960 का काल वैश्विक आर्थिक अंतर्संबंधों के पुनर्गठन और नई वैश्विक संस्थाओं के प्रभुत्व का साक्षी रहा।
Q3: भूमंडलीकरण के कारण आम लोगों के जीवन में आने वाले परिवर्तनों को स्पष्ट करें।
उत्तर : भूमंडलीकरण का सामान्य परिचय : भूमंडलीकरण का अर्थ है देश की अर्थव्यवस्था का विश्व की अर्थव्यवस्था के साथ जुड़ाव, जिसके तहत वस्तुओं, सेवाओं, पूंजी और प्रौद्योगिकियों का आदान-प्रदान बिना किसी प्रतिबंध के होता है। बिहार बोर्ड के पाठ्यक्रम के अनुसार, 1991 की नई आर्थिक नीति के बाद भारत में भूमंडलीकरण की प्रक्रिया तेज हुई, जिसने आम लोगों के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन को व्यापक रूप से प्रभावित किया है। इसने न केवल बाजार की संरचना बदली है, बल्कि व्यक्ति के सोचने और रहने के ढंग में भी क्रांतिकारी परिवर्तन लाए हैं।

रोजगार के अवसरों में वृद्धि और परिवर्तन : भूमंडलीकरण के कारण आम लोगों के लिए रोजगार के नए मार्ग प्रशस्त हुए हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) के आगमन से सूचना प्रौद्योगिकी, संचार, बैंकिंग और बीमा जैसे क्षेत्रों में नौकरियों की बाढ़ आ गई है। अब शिक्षित युवाओं के लिए केवल सरकारी नौकरियों पर निर्भरता समाप्त हो गई है और वे निजी क्षेत्र में अपनी दक्षता के आधार पर बेहतर वेतन प्राप्त कर रहे हैं। हालांकि, इसके कारण श्रम बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ी है और आउटसोर्सिंग (बाह्यस्रोतीकरण) जैसी नई प्रणालियों ने सेवा क्षेत्र को भारतीय अर्थव्यवस्था का सबसे मजबूत स्तंभ बना दिया है।

उपभोग के स्तर और जीवनशैली में सुधार : आम उपभोक्ताओं के लिए भूमंडलीकरण एक वरदान साबित हुआ है। आज बाजारों में अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों की वस्तुएं आसानी से उपलब्ध हैं। प्रतिस्पर्धा बढ़ने के कारण इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, वाहन और दैनिक उपयोग की वस्तुओं की कीमतों में गिरावट आई है और उनकी गुणवत्ता में सुधार हुआ है। इससे लोगों के जीवन स्तर में वृद्धि हुई है। अब एक सामान्य परिवार के पास भी मोबाइल फोन, टेलीविजन और इंटरनेट जैसी आधुनिक सुविधाएं मौजूद हैं, जो कुछ दशक पहले तक दुर्लभ मानी जाती थीं।

कृषि और ग्रामीण जनजीवन पर प्रभाव : भारत एक कृषि प्रधान देश है और भूमंडलीकरण ने ग्रामीण क्षेत्रों को भी प्रभावित किया है। नई कृषि तकनीकों, उन्नत बीजों और आधुनिक उर्वरकों की पहुंच ग्रामीण किसानों तक बढ़ी है। इससे उत्पादकता में वृद्धि हुई है और किसानों को अपने उत्पादों के लिए वैश्विक बाजार मिलने की संभावना बढ़ी है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव का सीधा असर छोटे किसानों पर पड़ता है। साथ ही, व्यावसायिक फसलों को बढ़ावा मिलने से पारंपरिक खेती के स्वरूप में भी बदलाव आया है।

सामाजिक और सांस्कृतिक रूपांतरण : भूमंडलीकरण ने सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा दिया है। इंटरनेट और सोशल मीडिया के माध्यम से लोग वैश्विक संस्कृतियों के संपर्क में आए हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में आधुनिकतम तकनीकों का समावेश हुआ है, जिससे ग्रामीण इलाकों में भी टेली-मेडिसिन और ऑनलाइन शिक्षा सुलभ हुई है। लेकिन इसके साथ ही, पश्चिमी खान-पान और पहनावे का प्रभाव बढ़ने से हमारी पारंपरिक संस्कृति और मूल्यों में बदलाव देखा जा रहा है। संयुक्त परिवारों का स्थान एकल परिवार ले रहे हैं और समाज में भौतिकवाद की प्रवृत्ति बढ़ रही है।

आर्थिक असमानता और चुनौतियां : जहां भूमंडलीकरण ने प्रगति के द्वार खोले हैं, वहीं इसने समाज में आर्थिक असमानता को भी जन्म दिया है। कुशल और शिक्षित वर्ग ने तो इसका भरपूर लाभ उठाया है, लेकिन कम कुशल श्रमिक और छोटे दुकानदार बड़ी कंपनियों की प्रतिस्पर्धा में पिछड़ रहे हैं। कुटीर और लघु उद्योगों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है क्योंकि वे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सस्ते और मशीनी उत्पादों का मुकाबला नहीं कर पाते। अतः भूमंडलीकरण ने विकास के साथ-साथ एक ऐसी चुनौती भी पेश की है जहां अमीर और गरीब के बीच की खाई को पाटना आवश्यक हो गया है।
Q4: 1991 से 1945 के बीच विकसित होने वाले राजनीतिक और आर्थिक संबंधों पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर : वर्ष 1919 में प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद दुनिया ने एक नए राजनीतिक युग में प्रवेश किया। वर्साय की संधि ने यूरोप के मानचित्र को बदल दिया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शांति बनाए रखने के लिए राष्ट्र संघ (League of Nations) की स्थापना की गई। हालांकि, यह संधि जर्मनी जैसे देशों के लिए अत्यंत अपमानजनक थी, जिसने भविष्य में प्रतिशोध की राजनीति को जन्म दिया। इस दौरान साम्राज्यवाद के विरुद्ध आवाजें उठने लगीं और भारत जैसे देशों में राष्ट्रवाद का प्रसार हुआ। राजनीतिक संबंधों में अस्थिरता का मुख्य कारण यह था कि पुराने साम्राज्य ढह रहे थे और नए राष्ट्रों का उदय हो रहा था, जिससे वैश्विक शक्ति संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका था।

1929 की आर्थिक महामंदी और उसके प्रभाव : आर्थिक दृष्टिकोण से 1919 से 1945 के बीच का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ 1929 की आर्थिक महामंदी थी। अमेरिका के शेयर बाजार के धराशायी होने से शुरू हुई इस मंदी ने पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया। इसके परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भारी गिरावट आई, बैंकों का दिवालिया निकल गया और बेरोजगारी चरम पर पहुँच गई। इस आर्थिक संकट ने विभिन्न देशों के बीच आर्थिक संबंधों को तनावपूर्ण बना दिया। देशों ने अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए संरक्षणवादी नीतियां अपनाईं और विदेशी आयात पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए। इस मंदी ने ही जर्मनी और इटली में अधिनायकवादी शक्तियों के उभार का मार्ग प्रशस्त किया, क्योंकि वहां की जनता आर्थिक बदहाली से तंग आकर उग्र राष्ट्रवाद की ओर आकर्षित होने लगी थी।

फासीवाद का उदय और द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि : 1930 के दशक में वैश्विक राजनीति और आर्थिक संबंधों में कड़वाहट और बढ़ गई। जर्मनी में हिटलर और इटली में मुसोलिनी के उदय ने लोकतांत्रिक मूल्यों को चुनौती दी। इन तानाशाही शक्तियों ने वर्साय की संधि की शर्तों को मानने से इनकार कर दिया और अपनी सैन्य शक्ति को बढ़ाना शुरू किया। जापान की विस्तारवादी नीति और जर्मनी द्वारा पड़ोसी देशों पर आक्रमण ने राष्ट्र संघ की विफलता को स्पष्ट कर दिया। इन राजनीतिक और आर्थिक खींचतान का अंतिम परिणाम 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध के रूप में सामने आया। 1945 में युद्ध की समाप्ति तक विश्व दो वैचारिक गुटों में बंट चुका था और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में उपनिवेशवाद का अंत तथा नई आर्थिक व्यवस्था की मांग उठने लगी थी।

नई वैश्विक व्यवस्था और ब्रेटन वुड्स समझौता : युद्ध के अंतिम वर्षों में ही भविष्य की आर्थिक स्थिरता के लिए प्रयास शुरू हो गए थे। 1944 में अमेरिका के ब्रेटन वुड्स में हुए सम्मेलन के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक की स्थापना का निर्णय लिया गया। इसका मुख्य उद्देश्य युद्ध से जर्जर हो चुकी अर्थव्यवस्थाओं का पुनर्निर्माण करना और वैश्विक व्यापार में स्थिरता लाना था। 1945 तक आते-आते दुनिया ने महसूस किया कि टिकाऊ राजनीतिक शांति के लिए आर्थिक सहयोग अनिवार्य है। इसी सोच ने संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना की नींव रखी, जिसने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की नई विश्व व्यवस्था की दिशा तय की। इस प्रकार 1919 से 1945 का काल संघर्ष, आर्थिक विनाश और अंततः पुनर्गठन के प्रयासों का एक जटिल दौर रहा।
Q5: दो महायुद्धों के बीच तथा 1945 के बाद औपनिवेशिक देशों में होने वाले राष्ट्रीय आंदोलनों पर एक निबंध लिखें।
उत्तर : दो महायुद्धों के बीच राष्ट्रीय आंदोलनों का विकास : प्रथम विश्वयुद्ध (1914-1918) की समाप्ति ने वैश्विक राजनीति में एक नए युग का सूत्रपात किया। युद्ध के दौरान मित्र राष्ट्रों ने लोकतंत्र और आत्मनिर्णय के सिद्धांतों की रक्षा का दावा किया था, लेकिन युद्ध के बाद पेरिस शांति सम्मेलन में औपनिवेशिक देशों की आकांक्षाओं को नजरअंदाज कर दिया गया। इससे एशिया और अफ्रीका के देशों में भारी असंतोष फैला। 1917 की रूसी क्रांति ने उपनिवेशों को साम्राज्यवाद के विरुद्ध लड़ने की एक नई विचारधारा और शक्ति प्रदान की। भारत में महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलनों ने राष्ट्रवाद को एक जन-आंदोलन का रूप दे दिया। इसी प्रकार, हिंद-चीन (वियतनाम) में हो ची मिन्ह ने साम्यवादी विचारों के साथ राष्ट्रीय एकता को मजबूत करना शुरू किया। 1929 की आर्थिक मंदी ने औपनिवेशिक अर्थव्यवस्थाओं को अत्यंत दुर्बल कर दिया, जिससे किसानों और मध्यम वर्ग का संघर्ष और अधिक तीव्र हो गया।

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान बदलती परिस्थितियाँ : द्वितीय विश्वयुद्ध (1939-1945) ने यूरोपीय साम्राज्यवादी शक्तियों की नींव हिला दी। ब्रिटेन, फ्रांस और नीदरलैंड जैसे देश युद्ध में बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए और उनकी सैन्य एवं आर्थिक क्षमता क्षीण हो गई। युद्ध के दौरान दक्षिण-पूर्व एशिया में जापानी सफलताओं ने यूरोपीय शक्तियों की अजेयता के मिथक को तोड़ दिया। इससे औपनिवेशिक जनता में यह आत्मविश्वास जागा कि वे भी विदेशी शासन को उखाड़ फेंक सकते हैं। युद्ध के बाद गठित संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) ने मानवाधिकारों और देशों की संप्रभुता पर बल दिया, जिससे उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नैतिक समर्थन मिला। साथ ही, युद्ध के दौरान ‘अटलांटिक चार्टर’ जैसे समझौतों ने भी स्वतंत्रता की मांग को वैश्विक पहचान दिलाई।

1945 के बाद वि-उपनिवेशीकरण की लहर : 1945 के बाद का समय पूरे विश्व में वि-उपनिवेशीकरण (Decolonization) का काल माना जाता है। 1947 में भारत की स्वतंत्रता ने एशिया और अफ्रीका के अन्य गुलाम देशों के लिए एक प्रेरणा स्रोत का कार्य किया। भारत की आजादी के बाद बर्मा, श्रीलंका और इंडोनेशिया जैसे देश भी एक-एक कर स्वतंत्र हो गए। अफ्रीका में भी राष्ट्रवाद की प्रचंड लहर उठी, जिसके परिणामस्वरूप घाना, नाइजीरिया और बाद में अल्जीरिया ने कड़े संघर्ष के बाद मुक्ति प्राप्त की। शीत युद्ध की शुरुआत ने भी इस प्रक्रिया को प्रभावित किया, जहाँ सोवियत संघ ने प्रत्यक्ष रूप से साम्राज्यवादी शक्तियों के विरोध में राष्ट्रवादी ताकतों का समर्थन किया। इस प्रकार, दो महायुद्धों के बीच जन्मी चेतना और 1945 के बाद की अनुकूल वैश्विक परिस्थितियों ने सदियों पुराने औपनिवेशिक शासन का अंत कर दिया और स्वतंत्र राष्ट्र-राज्यों की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया।

BSEB 10th History Exercise 7 Solution in Hindi : PDF कैसे Download करें।

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क्रमांक अध्याय
1 यूरोप में राष्ट्रवाद
2 समाजवाद एवं साम्यवाद
3 हिन्द-चीन में राष्ट्रवादी आन्दोलन
4 भारत में राष्ट्रवाद
5 अर्थव्यवस्था और आजीविका
6 शहरीकरण एवं शहरी जीवन
8 प्रेस-संस्कृति एवं राष्ट्रवाद
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