BSEB 10th History Exercise 8 Solution in Hindi

BSEB 10th History Exercise 8 Solution in Hindi : बिहार बोर्ड कक्षा 10 इतिहास अध्याय 8 'प्रेस संस्कृति और राष्ट्रवाद' का विस्तृत समाधान पाएं।

हम बिहार बोर्ड कक्षा 10 इतिहास अध्याय 8 ‘प्रेस संस्कृति और राष्ट्रवाद” के समाधान को वस्तुनिष्ठ प्रश्नों (Objective Questions) और विषयनिष्ठ प्रश्नों (Subjective Questions) के साथ आसान, स्पष्ट और बिहार बोर्ड के नवीनतम पाठ्यक्रम पर आधारित लेकर आए हैं। यदि आप सभी छात्रों को किसी भी प्रश्न या किसी भी concept को लेकर संदेह है तो उनका सबका उत्तर नीचे दिया गया है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

Q1: महात्मा गाँधी ने किस पत्र का संपादन किया ?
[क] कामनवील
[ख] यंग इंडिया
[ग] बंगाली
[घ] बिहारी
Q2: किस पत्र ने रातों-रात वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट से बचने के लिए अपनी भाषा बदल दी ?
[क] हरिजन
[ख] भारत मित्र
[ग] अमृतबाजार पत्रिका
[घ] हिन्दुस्तान रिव्यू
Q3: 13वीं सदी में किसने ब्लॉक प्रिंटिंग के नमूने यूरोप में पहुँचाए ?
[क] मार्कोपोलो
[ख] निकितिन
[ग] इत्सिंग
[घ] मेगास्थनीज
Q4: गुटेनवर्ग का जन्म किस देश में हुआ था ?
[क] अमेरिका
[ख] जर्मनी
[ग] जापान
[घ] इंग्लैंड
Q5: गुटेनवर्ग ने सर्वप्रथम किस पुस्तक की छपाई की ?
[क] कुरान
[ख] गीता
[ग] हदीस
[घ] बाइबिल
Q6: इंग्लैंड में मुद्रणकला को पहुँचाने वाला कौन था ?
[क] हैमिल्टन
[ख] कैक्सटन
[ग] एडिसन
[घ] स्मिथ
Q7: किसने कहा “मुद्रण ईश्वर की दी हुई महानतम् देन है, सबसे बड़ा तोहफा” ?
[क] महात्मा गांधी
[ख] मार्टिन लूथर
[ग] मुहम्मद पैगम्बर
[घ] ईसा मसीह
Q8: रूसो कहाँ का दार्शनिक था ?
[क] फ्रांस
[ख] रूस
[ग] अमेरिका
[घ] इंग्लैंड
Q9: विश्व में सर्वप्रथम मुद्रण की शुरुआत कहाँ हुई?
[क] भारत
[ख] जापान
[ग] चीन
[घ] अमेरिका
Q10: किस देश की सिविल सेवा परीक्षा ने मुद्रित पुस्तकों की माँग बढ़ाई?
[क] मिश्र
[ख] भारत
[ग] चीन
[घ] जापान

रिक्त स्थानों की पूर्ति करें :

1. 1904-05 के रूस-जापन युद्ध में रूस की पराजय हुई ।
2. फिरोज शाह मेहता ने बांबे क्रॉनिकल का संपादन किया ।
3. वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट 1878 ई० में पास किया गया ।
4. भारतीय समाचार पत्रों के मुक्तिदाता के रूप में चार्ल्स मेटकॉफ़ को विभूषित किया गया।
5. अल-हिलाल का सम्पादन मौलाना अबुल कलाम आजाद ने किया।

सुमेलित करें :

मिलन करने वाले प्रश्नों में उसका सही उत्तर उस प्रश्न के सामने ही दिया गया है।
समूह ‘अ’ समूह ‘ब’
1. जे० के० हिक्की (ग) बंगाल गजट
2. राम मोहन राय (क) संवाद कौमुदी
3. बाल गंगाधर तिलक (घ) मराठा
4. केशवचन्द्र सेन (ङ) सुलभ समाचार
5. सुरेन्द्र नाथ बनर्जी (ख) बंगाली

बिहार बोर्ड कक्षा 10 इतिहास अध्याय 8 'प्रेस संस्कृति और राष्ट्रवाद' : Very Short Question Answer

1. निम्नकिंत के बारे में 20 शब्दों में उत्तर लिखें :

Q1: छापाखाना क्या है?
उत्तर : छापाखाना वह यंत्र या स्थान है जहाँ मशीनों की सहायता से कागजों पर लेखन सामग्री की छपाई या मुद्रण का कार्य किया जाता है।
Q2: गुटेनवर्ग कौन था?
उत्तर : योहान गुटेनवर्ग जर्मनी के एक प्रख्यात आविष्कारक थे, जिन्होंने यूरोप में प्रथम छापाखाना (प्रिंटिंग प्रेस) का आविष्कार कर मुद्रण क्रांति की शुरुआत की थी।
Q3: बाइबिल क्या है?
उत्तर : बाइबिल ईसाई धर्म का सबसे पवित्र धर्मग्रंथ है, जिसमें प्रभु ईसा मसीह की शिक्षाओं और उनके धार्मिक सिद्धांतों का संकलन किया गया है।
Q4: रेशम मार्ग क्या था?
उत्तर : रेशम मार्ग प्राचीन काल में एशिया को यूरोप और अफ्रीका से जोड़ने वाला एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्यापारिक और सांस्कृतिक संपर्क मार्ग था।
Q5: मराठा कौन थे?
उत्तर : मराठा महाराष्ट्र क्षेत्र में रहने वाले एक वीर योद्धा समुदाय थे, जिन्होंने छत्रपति शिवाजी महाराज के नेतृत्व में मुगलों के विरुद्ध शक्तिशाली साम्राज्य स्थापित किया था।
Q6: यंग इंडिया क्या था?
उत्तर : यंग इंडिया महात्मा गांधी द्वारा संपादित एक प्रसिद्ध साप्ताहिक पत्रिका थी, जिसके माध्यम से वे अपने विचारों और स्वतंत्रता आंदोलन का प्रचार-प्रसार करते थे।
Q7: वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट क्या था?
उत्तर : वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट 1878 में लॉर्ड लिटन द्वारा भारतीय स्थानीय भाषाई समाचार पत्रों पर कठोर नियंत्रण और सेंसरशिप लगाने हेतु पारित किया गया था।
Q8: सर सैयद अहमद कौन थे?
उत्तर : सर सैयद अहमद खाँ एक प्रमुख भारतीय समाज सुधारक और शिक्षाविद थे, जिन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना कर मुसलमानों में आधुनिक शिक्षा का प्रसार किया।
Q9: प्रोटेस्टेन्टवाद क्या है?
उत्तर : प्रोटेस्टेन्टवाद ईसाई धर्म की एक प्रमुख शाखा है, जो 16वीं शताब्दी में मार्टिन लूथर द्वारा कैथोलिक चर्च की कुरीतियों के विरुद्ध सुधार आंदोलन के रूप में शुरू हुई थी।
Q10: मार्टिन लूथर कौन थे?
उत्तर : मार्टिन लूथर एक महान जर्मन धर्मशास्त्री और धर्मसुधारक थे, जिन्होंने रोमन कैथोलिक चर्च की कुरीतियों के विरुद्ध प्रोटेस्टेंट धर्म-सुधार आंदोलन शुरू किया था।

बिहार बोर्ड कक्षा 10 इतिहास अध्याय 8 'प्रेस संस्कृति और राष्ट्रवाद' : Short Question Answer

2. निम्नांकित प्रश्नों के उत्तर 60 शब्दों में उत्तर दें :

Q1: गुटेनवर्ग ने मुद्रणयंत्र का विकास कैसे किया?
उत्तर : जर्मनी के योहान गुटेनबर्ग ने जैतून पेरने वाली मशीन को आधार बनाकर अपने मुद्रणयंत्र का विकास किया। उन्होंने शीशा, रांगा और एंटिमोनी जैसी धातुओं के उचित मिश्रण से अक्षरों के निश्चित सांचे (टाइप) तैयार किए, जिन्हें आवश्यकतानुसार इधर-उधर घुमाया जा सकता था। इस यंत्र में स्याही लगाने और कागज़ पर समान दबाव डालने की उन्नत तकनीक का प्रयोग कर उन्होंने 1448 के आसपास अपना पहला छापाखाना पूर्ण किया, जिससे पुस्तकों का उत्पादन तेज़ और सस्ता हो गया।
Q2: छापाखाना यूरोप में कैसे पहुँचा?
उत्तर : चीन में विकसित काष्ठ-ब्लॉक प्रिंटिंग की तकनीक यूरोप में मार्को पोलो द्वारा पहुँची। 1295 ईस्वी में जब मार्को पोलो चीन की लंबी यात्रा के बाद इटली लौटे, तो वे अपने साथ छपाई का यह ज्ञान लेकर आए। इसके बाद इटली के लोग लकड़ी की तख्तियों से किताबें छापने लगे और धीरे-धीरे यह कला पूरे यूरोप में फैल गई, जिससे हस्तलिखित पांडुलिपियों का स्थान छपाई ने ले लिया।
Q3: इन्क्विज़ीशन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर : न्क्विज़ीशन कैथोलिक चर्च द्वारा स्थापित एक धार्मिक न्यायालय था, जिसका मुख्य उद्देश्य धर्मद्रोही विचारों की पहचान करना और उन्हें रोकना था। मुद्रण क्रांति के पश्चात जब बाइबिल के नए अर्थ निकाले जाने लगे और स्वतंत्र विचार तेजी से फैलने लगे, तब चर्च ने इन विचारों को दबाने हेतु इसका कड़ाई से उपयोग किया। यह संस्था लेखकों और प्रकाशकों पर कड़ा नियंत्रण रखती थी तथा दंड के माध्यम से धार्मिक कट्टरता को बनाए रखने का प्रयास करती थी।
Q4: पाण्डुलिपि क्या है? इसकी क्या उपयोगिता है?
उत्तर : भारत में छापाखाना (मुद्रण तकनीक) के विकास से पूर्व ताड़पत्रों, भोजपत्रों और हाथ से बने कागज पर हाथ से लिखने की पुरानी एवं समृद्ध परंपरा थी। इन्हीं हस्तलिखित सामग्रियों को पाण्डुलिपि कहा जाता है। इनकी मुख्य उपयोगिता यह है कि ये हमारे पूर्वजों के दुर्लभ ज्ञान, महान ग्रंथों, संस्कृति और इतिहास को सुरक्षित रखने का मुख्य साधन थीं। यद्यपि ये काफी नाजुक और महंगी होती थीं, लेकिन छापाखाना के आने से पहले ये शिक्षा और सूचना के प्रसार का आधार बनी रहीं।
Q5: लार्ड लिटन ने राष्ट्रीय आंदोलन को गतिमान बनाया—कैसे?
उत्तर : वाइसराय लार्ड लिटन की दमनकारी और प्रतिक्रियावादी नीतियों ने भारतीय जनमानस में गहरा असंतोष पैदा कर राष्ट्रीय आंदोलन को गति प्रदान की। उन्होंने 1878 में वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट पारित कर भारतीय भाषाई समाचार पत्रों पर कठोर प्रतिबंध लगा दिए और भारतीय शस्त्र अधिनियम (1879) के माध्यम से भारतीयों को हथियार रखने से वंचित कर दिया। इसके अतिरिक्त, सिविल सेवा में प्रवेश की आयु घटाने और देश में भीषण अकाल के बावजूद भव्य दिल्ली दरबार के आयोजन जैसे कार्यों ने भारतीयों को एकजुट होकर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संगठित होने के लिए विवश कर दिया।

बिहार बोर्ड कक्षा 10 इतिहास अध्याय 8 'प्रेस संस्कृति और राष्ट्रवाद' : Long Question Answer

3. निम्नांकित प्रश्नों के उत्तर 150 शब्दों में उत्तर दें :

Q1: मुद्रण क्रांति ने आधुनिक विश्व को कैसे प्रभावित किया?
उत्तर : मुद्रण क्रांति केवल तकनीकी सुधार नहीं थी, बल्कि इसने लोगों के जीवन को पूरी तरह से बदल दिया। पंद्रहवीं शताब्दी के मध्य में योहानेस गुटेनबर्ग द्वारा प्रिंटिंग प्रेस के आविष्कार ने हस्तलिखित पांडुलिपियों के युग को समाप्त कर दिया। मुद्रण क्रांति के कारण पुस्तकों का उत्पादन बड़े पैमाने पर होने लगा और उनकी कीमतों में भारी कमी आई। इससे पहले पुस्तकें केवल अमीर और अभिजात्य वर्ग तक सीमित थीं, लेकिन अब वे आम जनता की पहुँच में आ गईं। पुस्तकों की उपलब्धता ने एक नई पढ़ने की संस्कृति को जन्म दिया, जिससे समाज के निचले तबके में भी साक्षरता का प्रसार हुआ और सूचनाओं के आदान-प्रदान के नए रास्ते खुले।

मुद्रण क्रांति ने धार्मिक क्षेत्र में व्यापक उथल-पुथल मचा दी। छपे हुए विचारों ने स्थापित धार्मिक मान्यताओं को चुनौती दी। मार्टिन लूथर जैसे समाज सुधारकों ने रोमन कैथोलिक चर्च की कुरीतियों के खिलाफ अपने विचार मुद्रित रूप में फैलाए। लूथर ने बाइबिल का जर्मन अनुवाद किया और हजारों प्रतियाँ छपवाईं, जिससे आम लोग स्वयं धर्मग्रंथों को पढ़कर उनकी व्याख्या करने लगे। इसने प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार आंदोलन की नींव रखी और चर्च के एकाधिकार को समाप्त कर दिया। मुद्रण के माध्यम से तार्किक बहस और आलोचनात्मक सोच को बढ़ावा मिला, जिससे लोग अंधविश्वासों को छोड़कर विज्ञान और तर्क की ओर झुकने लगे।

आधुनिक विश्व के राजनीतिक ढांचे को आकार देने में मुद्रण क्रांति की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। अठारहवीं शताब्दी के प्रबुद्ध विचारकों जैसे वॉल्टेयर और रूसो के विचारों को प्रिंटिंग प्रेस के माध्यम से दूर-दराज के क्षेत्रों तक पहुँचाया गया। इन लेखों ने जनता को स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के लोकतांत्रिक मूल्यों से परिचित कराया। इतिहासकारों का मानना है कि मुद्रण संस्कृति ने फ्रांसीसी क्रांति के लिए उपयुक्त आधार तैयार किया क्योंकि इसने राजशाही की निरंकुशता पर प्रहार किया और जनता को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक किया। अखबारों और पत्रिकाओं के माध्यम से जनमत तैयार करने की प्रक्रिया शुरू हुई, जो आज के लोकतंत्र का आधार है।

मुद्रण के प्रसार ने शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की। वैज्ञानिकों के शोध और आविष्कार अब केवल एक छोटे समूह तक सीमित नहीं रहे, बल्कि वे छपकर पूरी दुनिया में पहुँचने लगे, जिससे वैज्ञानिक क्रांति को गति मिली। मुद्रण ने मानचित्रों, पंचांगों और सरकारी सूचनाओं को सुलभ बनाया, जिससे व्यापार और प्रशासन में सुधार हुआ। बच्चों के लिए पाठ्यपुस्तकें और महिलाओं के लिए विशेष पत्रिकाओं के प्रकाशन ने समाज के हर वर्ग को ज्ञान की मुख्यधारा से जोड़ दिया। अंततः, मुद्रण क्रांति ने एक ऐसे सार्वजनिक क्षेत्र का निर्माण किया जहाँ सूचनाओं पर बहस हो सकती थी, जिसने आधुनिक सभ्य समाज और वैश्विक चेतना का निर्माण किया।
Q2: 19वीं सदी में भारत में प्रेस के विकास को रेखांकित करें।
उत्तर : उन्नीसवीं शताब्दी में भारत में प्रेस का विकास भारतीय पुनर्जागरण और राष्ट्रवादी चेतना के उदय के साथ गहराई से जुड़ा हुआ था। इस सदी के आरंभिक दौर में राजा राममोहन राय ने भारतीय पत्रकारिता को एक नई दिशा प्रदान की। उन्हें ‘भारतीय पत्रकारिता का अग्रदूत’ माना जाता है। उन्होंने 1821 में बंगाली साप्ताहिक ‘संवाद कौमुदी’ और 1822 में फारसी पत्रिका ‘मिरात-उल-अखबार’ का प्रकाशन शुरू किया। इन पत्रिकाओं का मुख्य उद्देश्य समाज में व्याप्त सती प्रथा, बाल विवाह और जातिवाद जैसी कुरीतियों के विरुद्ध जनमत तैयार करना था। प्रेस के माध्यम से पहली बार भारतीय समाज में वैज्ञानिक सोच और पाश्चात्य उदारवादी विचारों का प्रसार हुआ, जिससे मध्यम वर्ग के भीतर एक नई बौद्धिक जागृति पैदा हुई।

सदी के मध्य तक भारत के विभिन्न हिस्सों में क्षेत्रीय भाषाओं में समाचार पत्रों का तेजी से विस्तार हुआ। 1850 के बाद ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने ‘सोमप्रकाश’ का संपादन किया, जिसने किसानों के हितों और सामाजिक न्याय की वकालत की। इसके साथ ही हिंदी, गुजराती, मराठी और तमिल भाषाओं में समाचार पत्रों की संख्या बढ़ने लगी। इन भाषाई समाचार पत्रों ने ब्रिटिश प्रशासन की नीतियों का विश्लेषण करना शुरू किया और आम जनता को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया। अमृत बाजार पत्रिका, जिसे शिशिर कुमार घोष और मोतीलाल घोष ने शुरू किया था, ने भाषाई प्रेस के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी भूमिका निभाई। इन पत्रों ने स्थानीय समस्याओं को उठाकर शासन और जनता के बीच एक संवाद स्थापित करने का प्रयास किया।

जैसे-जैसे प्रेस ने राष्ट्रवादी भावनाओं को भड़काना शुरू किया, ब्रिटिश सरकार ने इसे नियंत्रित करने के लिए दमनकारी नीतियां अपनाईं। 1878 में लॉर्ड लिटन द्वारा लागू किया गया ‘वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट’ इसका सबसे प्रमुख उदाहरण था। यह कानून विशेष रूप से भाषाई समाचार पत्रों को निशाना बनाने के लिए बनाया गया था ताकि वे सरकार की आलोचना न कर सकें। इस कानून के डर से रातों-रात ‘अमृत बाजार पत्रिका’ ने खुद को अंग्रेजी अखबार में बदल लिया था। हालांकि, इन प्रतिबंधों ने भारतीय पत्रकारों के भीतर और अधिक विद्रोह की भावना पैदा की। प्रेस अब केवल सूचना का साधन नहीं रह गया था, बल्कि वह औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ प्रतिरोध का एक सशक्त हथियार बन चुका था।

उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशकों में प्रेस भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और स्वतंत्रता संग्राम का मुख्य आधार बन गया। बाल गंगाधर तिलक ने ‘केसरी’ (मराठी) और ‘मराठा’ (अंग्रेजी) के माध्यम से उग्र राष्ट्रवाद की भावना को घर-घर पहुँचाया। तिलक के लेखों ने जनता को राजनीतिक रूप से संगठित होने के लिए प्रेरित किया। इसी दौरान प्रेस ने ब्रिटिश आर्थिक शोषण और ‘धन के निष्कासन’ (Drain of Wealth) के सिद्धांत को जनता के सामने स्पष्ट रूप से रखा। सदी के अंत तक प्रेस ने एक राष्ट्रव्यापी नेटवर्क बना लिया था, जिसने देश के विभिन्न हिस्सों के लोगों को एक साझा पहचान और एक साझा लक्ष्य के सूत्र में पिरो दिया। इस प्रकार, 19वीं सदी का प्रेस आधुनिक भारत के निर्माण और राजनीतिक चेतना के विकास की आधारशिला साबित हुआ।
Q3: भारतीय प्रेस की विशेषताओं को लिखें।
उत्तर : भारतीय प्रेस का विकास आधुनिक भारत के इतिहास की एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना है जिसने न केवल सूचनाओं का प्रसार किया बल्कि भारतीय राष्ट्रवाद की नींव को भी मजबूत किया। भारतीय प्रेस की सबसे प्रमुख विशेषता इसका राष्ट्रवादी स्वरूप था। औपनिवेशिक शासन के दौरान भारतीय पत्रकारों और संपादकों ने समाचार पत्रों को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जनमत तैयार करने का एक सशक्त माध्यम बनाया। इन अखबारों ने ब्रिटिश आर्थिक नीतियों के शोषणकारी चरित्र को उजागर किया और भारतीयों में स्वदेश प्रेम एवं राष्ट्रीय चेतना की भावना को गहराई से जगाया।

भारतीय प्रेस ने केवल राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए ही नहीं बल्कि सामाजिक और धार्मिक सुधार के क्षेत्र में भी क्रांतिकारी भूमिका निभाई। राजा राममोहन राय जैसे सुधारकों ने ‘संवाद कौमुदी’ और ‘मिरात-उल-अखबार’ के माध्यम से सती प्रथा, बाल विवाह और जातिगत भेदभाव जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ निरंतर आवाज उठाई। प्रेस ने वैज्ञानिक सोच और आधुनिक लोकतांत्रिक विचारों को बढ़ावा दिया जिससे भारतीय समाज की रूढ़िवादिता में कमी आई और एक जागरूक एवं आधुनिक नागरिक समाज का निर्माण संभव हो सका।

भारतीय प्रेस की एक अन्य महत्वपूर्ण विशेषता क्षेत्रीय भाषाओं या भाषाई प्रेस का तेजी से विकास होना था। हालाँकि अंग्रेजी प्रेस का अपना एक विशिष्ट प्रभाव था, लेकिन ‘अमृत बाजार पत्रिका’, ‘केसरी’, ‘मराठा’ और ‘हिन्दू’ जैसे क्षेत्रीय भाषा के समाचार पत्रों ने ग्रामीण क्षेत्रों और आम जनता तक राष्ट्रवादी संदेश पहुँचाया। इन पत्रों ने जनसाधारण की सरल भाषा में औपनिवेशिक उत्पीड़न को परिभाषित किया जिससे राष्ट्रीय आंदोलन केवल शिक्षित वर्ग तक सीमित न रहकर एक व्यापक जन आंदोलन में बदल सका। भाषाई प्रेस की इसी बढ़ती ताकत से घबराकर अंग्रेजों ने 1878 में वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट जैसा दमनकारी कानून लागू किया था।

भारतीय प्रेस का संपूर्ण इतिहास प्रतिरोध और निर्भीकता की कहानियों से भरा हुआ है। ब्रिटिश सरकार ने समय-समय पर कठोर सेंसरशिप, भारी जुर्माने और प्रेस की जब्ती जैसे प्रतिबंधों के माध्यम से भारतीय प्रेस की आवाज को कुचलने का प्रयास किया। इसके बावजूद, भारतीय पत्रकारों ने जेल जाने और आर्थिक हानि की परवाह किए बिना अपनी लेखनी को झुकने नहीं दिया। प्रेस ने न केवल सरकार की गलत नीतियों की आलोचना की बल्कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और अन्य राजनीतिक संगठनों की गतिविधियों को जनता तक पहुँचाकर पूरे देश को एक सूत्र में बांधने का महान कार्य किया। अंततः भारतीय प्रेस ने एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक भारत की नींव रखने में एक मार्गदर्शक और रक्षक की भूमिका निभाई।
Q4: राष्ट्रीय आंदोलन को भारतीय प्रेस ने कैसे प्रभावित किया?
उत्तर : भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में प्रेस और समाचार पत्रों की भूमिका अत्यंत निर्णायक और क्रांतिकारी रही है। उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के दौरान, भारतीय प्रेस ने केवल सूचना के आदान-प्रदान के माध्यम के रूप में ही कार्य नहीं किया, बल्कि इसने भारतीय जनता में राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने और उन्हें ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध एकजुट करने में एक शक्तिशाली अस्त्र की भूमिका निभाई। प्रेस ने भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों को एक साझा मंच प्रदान किया, जहाँ वे अपनी समस्याओं और अंग्रेजों की शोषक नीतियों पर चर्चा कर सकते थे।

जन-जागरूकता और सामाजिक-धार्मिक सुधार : भारतीय प्रेस का प्रारंभिक स्वरूप सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलनों से गहराई से जुड़ा हुआ था। राजा राममोहन राय द्वारा प्रकाशित ‘संवाद कौमुदी’ और ‘मिरात-उल-अखबार’ जैसे पत्रों ने भारतीय समाज में व्याप्त सती प्रथा, बाल विवाह और जातिगत भेदभाव जैसी कुरीतियों के विरुद्ध सशक्त आवाज उठाई। इन समाचार पत्रों ने भारतीयों को आधुनिक शिक्षा और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रेरित किया। प्रेस के माध्यम से फैले इन सुधारवादी विचारों ने भारतीयों के आत्म-सम्मान को जगाया, जो आगे चलकर राजनीतिक राष्ट्रवाद का आधार बना। जब तक जनता मानसिक रूप से स्वतंत्र नहीं होती, तब तक राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करना असंभव था, और प्रेस ने इस वैचारिक स्वतंत्रता की नींव रखी।

ब्रिटिश आर्थिक नीतियों का अनावरण : भारतीय प्रेस ने ब्रिटिश सरकार की विनाशकारी आर्थिक नीतियों का पर्दाफाश करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ‘अमृत बाजार पत्रिका’, ‘हिंदू’, और ‘केसरी’ जैसे राष्ट्रवादी पत्रों ने भारत से धन के निष्कासन (Drain of Wealth) के सिद्धांत को सरल भाषा में जनता के सामने रखा। प्रेस ने यह स्पष्ट किया कि किस प्रकार अंग्रेजों ने भारतीय कुटीर उद्योगों को नष्ट किया और किसानों पर लगान का भारी बोझ डाला। अकाल के समय ब्रिटिश सरकार की संवेदनहीनता और शाही खर्चों की आलोचना करके प्रेस ने आम आदमी के मन में औपनिवेशिक शासन के प्रति तीव्र असंतोष पैदा किया। इससे जनता यह समझने लगी कि उनकी निर्धनता का मुख्य कारण विदेशी शासन है।

राष्ट्रीय आंदोलन और क्रांतिकारी विचारों का प्रसार : जैसे-जैसे राष्ट्रीय आंदोलन तीव्र हुआ, प्रेस इसका सबसे बड़ा प्रचारक बन गया। बाल गंगाधर तिलक ने अपने समाचार पत्र ‘केसरी’ और ‘मराठा’ के माध्यम से उग्र राष्ट्रवाद की भावना को प्रोत्साहित किया और घोषणा की कि ‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’। गांधीजी के ‘यंग इंडिया’ और ‘हरिजन’ जैसे पत्रों ने अहिंसा और सत्याग्रह के संदेश को देश के कोने-कोने तक पहुँचाया। प्रेस ने न केवल राजनीतिक आंदोलनों की रूपरेखा तैयार की, बल्कि क्रांतिकारियों के बलिदान की गाथाएं सुनाकर युवाओं में देशभक्ति का संचार किया। ब्रिटिश सरकार ने प्रेस की शक्ति से डरकर वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट (1878) जैसे दमनकारी कानून बनाए, लेकिन इससे प्रेस की धार और भी तेज हो गई।

देश की वैचारिक और राजनीतिक एकता : भारतीय प्रेस ने विभिन्न प्रांतों और भाषाई क्षेत्रों के बीच एक सेतु का कार्य किया। समाचार पत्रों के कारण ही बंगाल में होने वाली घटनाओं का प्रभाव पंजाब और महाराष्ट्र तक पहुँचने लगा। इससे भारतीयों में यह बोध विकसित हुआ कि उनकी समस्याएँ और उनका शत्रु एक ही है। प्रेस ने क्षेत्रीय सीमाओं को तोड़कर एक अखिल भारतीय पहचान विकसित करने में सहायता की। आंदोलनों के दौरान नेताओं के निर्देशों और सभाओं की जानकारी प्रेस के माध्यम से ही जन-जन तक पहुँचती थी, जिससे भारी संख्या में लोग स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने लगे। निष्कर्षतः, भारतीय प्रेस ने एक सशक्त जनमत तैयार किया, जिसने अंततः ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी और भारत की स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त किया।
Q5: मुद्रण यंत्र की विकास यात्रा को रेखांकित करें। यह आधुनिक स्वरूप में कैसे पहुँचा?
उत्तर : मुद्रण यंत्र की विकास यात्रा का इतिहास अत्यंत प्राचीन है, जिसकी शुरुआत चीन, जापान और कोरिया से हुई थी। प्राचीन काल में चीन में ब्लॉक प्रिंटिंग यानी लकड़ी के तख्तों पर अक्षरों को उकेरकर छपाई करने की तकनीक विकसित हुई थी। इसमें लकड़ी के ब्लॉक पर स्याही लगाकर उसे कागज़ पर रगड़ा जाता था। धीरे-धीरे यह तकनीक सिल्क मार्ग के माध्यम से अरब देशों और फिर यूरोप तक पहुँची। 13वीं शताब्दी के अंत में महान खोजी यात्री मार्को पोलो ने जब चीन से इटली वापस लौटकर मुद्रण की इस कला का प्रसार किया, तो यूरोप में हाथ से लिखे जाने वाले हस्तलिखित ग्रंथों (पांडुलिपियों) के स्थान पर लकड़ी के ब्लॉकों से छपाई का कार्य प्रारंभ हुआ।

गुटेनबर्ग का क्रांतिकारी आविष्कार : मुद्रण के क्षेत्र में सबसे बड़ी क्रांति 1448 ईस्वी में जर्मनी के मेन्ज शहर में योहान गुटेनबर्ग द्वारा आधुनिक छापाखाना के आविष्कार से आई। गुटेनबर्ग ने अपने पिता के जैतून और अंगूर पेरने वाले यंत्रों से प्रेरणा ली और धातु के चल-टाइप का निर्माण किया। उन्होंने पीतल, सीसा और टिन जैसी धातुओं का उपयोग करके अक्षरों के साँचे बनाए, जिन्हें बार-बार व्यवस्थित कर नए पन्ने छापे जा सकते थे। गुटेनबर्ग द्वारा निर्मित इस पहले मुद्रण यंत्र से सबसे पहले बाइबिल की छपाई की गई। इस यंत्र ने मुद्रण की गति और शुद्धता में अभूतपूर्व वृद्धि की, जिससे ज्ञान का प्रसार जन-सामान्य तक सुलभ हो गया और यूरोप में पुनर्जागरण तथा धर्म-सुधार आंदोलनों को गति मिली।

औद्योगिक क्रांति और मुद्रण में तकनीकी सुधार : 18वीं और 19वीं शताब्दी की औद्योगिक क्रांति ने मुद्रण तकनीक को एक नया मोड़ दिया। अब हाथ से चलाए जाने वाले यंत्रों के स्थान पर भाप और बिजली से चलने वाले यंत्रों का प्रयोग होने लगा। न्यूयॉर्क के रिचर्ड एम. हो ने बेलनाकार प्रेस का विकास किया, जिससे प्रति घंटे हजारों की संख्या में अखबारों और पुस्तकों की छपाई संभव हो गई। इस मशीन में कागज़ को तेज़ी से लपेटने और छापने की अद्भुत क्षमता थी, जिसने समाचार पत्रों की दुनिया में क्रांति ला दी। इसी दौर में कागज़ की गुणवत्ता, स्याही के प्रकार और छपाई के तरीकों में निरंतर सुधार होते रहे जिससे लागत में कमी आई।

आधुनिक स्वरूप और डिजिटल मुद्रण : 20वीं शताब्दी तक आते-आते मुद्रण यंत्र अपने आधुनिक स्वरूप में पहुँच गया। ऑफसेट प्रिंटिंग के विकास ने एक साथ कई रंगों की छपाई को बेहद आसान और स्पष्ट बना दिया। इसके बाद कंप्यूटर क्रांति के आगमन ने मुद्रण कला की पूरी परिभाषा ही बदल दी। आधुनिक समय में हम लेजर प्रिंटिंग, डिजिटल प्रिंटिंग और इंकजेट तकनीक का उपयोग करते हैं, जहाँ बिना किसी प्लेट या सांचे के सीधे कंप्यूटर से कमांड देकर उच्च गुणवत्ता वाली छपाई की जाती है। आज का मुद्रण यंत्र न केवल अत्यंत तीव्र है, बल्कि यह ग्राफ़िक्स और सूक्ष्म विवरणों को भी सटीकता से उकेरने में सक्षम है। इस प्रकार, लकड़ी के गुटकों से शुरू हुई यह यात्रा आज डिजिटल और थ्री-डी मुद्रण तक पहुँच गई है, जिसने दुनिया को एक वैश्विक गांव में बदल दिया है।

BSEB 10th History Exercise 8 Solution in Hindi : PDF कैसे Download करें।

नीचे आप सभी को बिहार बोर्ड कक्षा 10 के इतिहास के अध्याय 8 ‘प्रेस संस्कृति और राष्ट्रवाद’ के सभी प्रश्नों का PDF link दिया जा रहा है। जिसे आप सभी छात्र बिल्कुल मुफ्त में Download कर सकते हैं।
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क्रमांक अध्याय
1 यूरोप में राष्ट्रवाद
2 समाजवाद एवं साम्यवाद
3 हिन्द-चीन में राष्ट्रवादी आन्दोलन
4 भारत में राष्ट्रवाद
5 अर्थव्यवस्था और आजीविका
6 शहरीकरण एवं शहरी जीवन
7 व्यापार और भूमंडलीकरण
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