BSEB 10th Science Ex-5 Ultimate Notes Free pdf | तत्वों का आवर्त वर्गीकरण
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BSEB 10th Science Ex-5 Ultimate Notes : तत्वों का आवर्त वर्गीकरण
परिचय (Introduction)
हमारे आस-पास विभिन्न प्रकार के तत्व मौजूद हैं। वर्तमान में 118 तत्वों की खोज हो चुकी है। इन सभी तत्वों के गुणों का अलग-अलग अध्ययन करना बहुत मुश्किल है। इसलिए, वैज्ञानिकों ने इन तत्वों को उनके गुणों में समानता के आधार पर वर्गीकृत करने की आवश्यकता महसूस की, ताकि उनके अध्ययन को सरल बनाया जा सके और उनके गुणों में एक निश्चित प्रवृत्ति (trend) को समझा जा सके।
1. वर्गीकरण के प्रारंभिक प्रयास (Early Attempts at Classification)
तत्वों को वर्गीकृत करने के लिए समय-समय पर कई वैज्ञानिकों ने प्रयास किए। इनमें से कुछ प्रमुख प्रयास निम्नलिखित हैं:
1.1. डोबेराइनर के त्रिक (Dobereiner’s Triads)
लगभग 1817 में, जर्मन रसायनज्ञ जोहान वोल्फगैंग डोबेराइनर ने समान गुणधर्म वाले तत्वों को समूहों में व्यवस्थित करने का प्रयास किया।
- अवधारणा: डोबेराइनर ने तीन-तीन तत्वों के ऐसे समूह बनाए, जिनके रासायनिक गुण समान थे। इन समूहों को ‘त्रिक’ कहा गया।
- नियम: त्रिक के तीनों तत्वों को परमाणु द्रव्यमान के आरोही क्रम में रखने पर, बीच वाले तत्व का परमाणु द्रव्यमान, अन्य दो तत्वों के परमाणु द्रव्यमानों का लगभग औसत होता था।
- उदाहरण:
लिथियम (Li), सोडियम (Na), पोटेशियम (K):
Li का परमाणु द्रव्यमान = 6.9
K का परमाणु द्रव्यमान = 39.0
Na का औसत परमाणु द्रव्यमान = (6.9 + 39.0) / 2 = 22.95 (जो Na के वास्तविक परमाणु द्रव्यमान 23 के लगभग बराबर है).
कैल्शियम (Ca), स्ट्रॉन्शियम (Sr), बेरियम (Ba)
क्लोरिन (Cl), ब्रोमीन (Br), आयोडीन (I) - सीमाएँ: डोबेराइनर अपने समय तक ज्ञात सभी तत्वों में केवल तीन ही त्रिक ज्ञात कर सके, इसलिए यह वर्गीकरण सफल नहीं हो पाया।
1.2. न्यूलैंड्स का अष्टक सिद्धांत (Newlands’ Law of Octaves)
1866 में, अंग्रेज वैज्ञानिक जॉन न्यूलैंड्स ने तत्वों को परमाणु द्रव्यमान के आरोही क्रम में व्यवस्थित किया।
- अवधारणा: उन्होंने पाया कि जब तत्वों को उनके बढ़ते हुए परमाणु द्रव्यमान के अनुसार व्यवस्थित किया जाता है, तो प्रत्येक आठवें तत्व के गुणधर्म पहले तत्व के गुणधर्मों के समान होते हैं। इसकी तुलना उन्होंने संगीत के ‘अष्टक’ (सा, रे, गा, मा, पा, धा, नी, सा) से की, जहाँ आठवाँ स्वर पहले स्वर के समान होता है।
- उदाहरण:
लिथियम (Li) से शुरू करने पर, आठवां तत्व सोडियम (Na) होता है और इन दोनों के गुणधर्म समान होते हैं।
इसी प्रकार, बेरिलियम (Be) के गुणधर्म मैग्नीशियम (Mg) से मिलते-जुलते हैं। - सीमाएँ:
- यह नियम केवल कैल्शियम (Ca) तक ही लागू होता था, क्योंकि कैल्शियम के बाद हर आठवें तत्व के गुणधर्म पहले तत्व से नहीं मिलते थे।
- न्यूलैंड्स ने कल्पना की थी कि प्रकृति में केवल 56 तत्व ही मौजूद हैं, लेकिन बाद में कई नए तत्वों की खोज हुई।
- अपने सारणी में, उन्होंने कुछ असमान गुणों वाले तत्वों को एक ही स्थान पर रख दिया था। उदाहरण के लिए, कोबाल्ट (Co) और निकिल (Ni) को एक ही स्लॉट में रखा गया था, जबकि उन्हें हैलोजन (F, Cl, Br) के साथ रख दिया, जो उनसे भिन्न गुणधर्म रखते हैं।
2. मेंडलीफ की आवर्त सारणी (Mendeleev’s Periodic Table)
रूसी रसायनज्ञ दिमित्री इवानोविच मेंडलीफ ने 1869 में तत्वों के वर्गीकरण में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
- अवधारणा: उन्होंने तत्वों को उनके परमाणु द्रव्यमान के आरोही क्रम में और रासायनिक गुणों की समानताओं के आधार पर व्यवस्थित किया। उन्होंने तत्वों के ऑक्साइड और हाइड्राइड बनाने पर विशेष ध्यान दिया।
- मेंडलीफ का आवर्त नियम: “तत्वों के गुणधर्म उनके परमाणु द्रव्यमानों के आवर्ती फलन (periodic function) होते हैं।” इसका अर्थ है कि एक निश्चित अंतराल के बाद तत्वों के गुणों की पुनरावृत्ति होती है।
- मेंडलीफ की आवर्त सारणी की संरचना: उनकी सारणी में उदग्र कॉलम को समूह (Groups) कहा गया, और क्षैतिज पंक्तियों को आवर्त (Periods) कहा गया। समूहों में समान रासायनिक गुणधर्म वाले तत्व थे।
2.1. मेंडलीफ की आवर्त सारणी की उपलब्धियाँ (Achievements)
- कुछ तत्वों के लिए रिक्त स्थान छोड़ना: मेंडलीफ ने अपनी सारणी में कुछ खाली स्थान छोड़े थे। उन्होंने साहसपूर्वक भविष्यवाणी की कि इन रिक्त स्थानों पर ऐसे तत्व आएंगे जिनकी खोज अभी नहीं हुई है। उन्होंने इन तत्वों के गुणों का भी अनुमान लगाया था।
उदाहरण: उन्होंने एका-बोरॉन, एका-एल्यूमीनियम और एका-सिलिकॉन का नाम दिया। बाद में जब स्कैंडियम (Sc), गैलियम (Ga) और जर्मेनियम (Ge) की खोज हुई, तो उनके गुणधर्म मेंडलीफ द्वारा की गई भविष्यवाणियों से हूबहू मिलते थे। - संदेहास्पद परमाणु द्रव्यमानों में सुधार: मेंडलीफ ने कुछ तत्वों के परमाणु द्रव्यमानों को सही करने में मदद की।
- उत्कृष्ट गैसों के लिए स्थान: जब उत्कृष्ट गैसों (जैसे हीलियम, नियॉन, आर्गन) की खोज हुई, तो उन्हें मेंडलीफ की मूल आवर्त सारणी को छेड़े बिना एक नए समूह (समूह 18) में रखा जा सका।
2.2. मेंडलीफ की आवर्त सारणी की सीमाएँ (Limitations)
- हाइड्रोजन की स्थिति: हाइड्रोजन को आवर्त सारणी में निश्चित स्थान नहीं दिया जा सका। यह क्षार धातुओं (समूह 1) और हैलोजनों (समूह 17) दोनों के साथ समानताएं दिखाता है।
- समस्थानिकों की स्थिति: समस्थानिकों की खोज के बाद, यह समस्या उत्पन्न हुई। समस्थानिकों के रासायनिक गुण समान होते हैं लेकिन परमाणु द्रव्यमान भिन्न होते हैं। मेंडलीफ के नियम के अनुसार, उन्हें अलग-अलग स्थान पर रखा जाना चाहिए था, लेकिन रासायनिक समानता के कारण उन्हें एक ही स्थान पर रखना उचित था।
- परमाणु द्रव्यमान में अनियमितता: कभी-कभी, अधिक परमाणु द्रव्यमान वाले तत्वों को कम परमाणु द्रव्यमान वाले तत्वों से पहले रखा गया था ताकि रासायनिक गुणों की समानता बनी रहे।
उदाहरण: कोबाल्ट (परमाणु द्रव्यमान 58.9) को निकिल (परमाणु द्रव्यमान 58.7) से पहले रखा गया था। - कुछ तत्वों की गलत स्थिति: कुछ तत्व ऐसे थे जिनके गुणधर्म समूह के अन्य तत्वों से मेल नहीं खाते थे, लेकिन फिर भी उन्हें एक ही समूह में रखा गया था।
3. आधुनिक आवर्त सारणी (Modern Periodic Table)
1913 में, हेनरी मोसले (Henry Moseley) ने बताया कि तत्वों का अधिक मौलिक गुण परमाणु द्रव्यमान की बजाय परमाणु संख्या (Atomic Number) है।
- परमाणु संख्या (Atomic Number): यह नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों की संख्या के बराबर होती है और इसे ‘Z’ से दर्शाया जाता है।
- आधुनिक आवर्त नियम: “तत्वों के गुणधर्म उनकी परमाणु संख्याओं के आवर्ती फलन होते हैं।”
- आधुनिक आवर्त सारणी में तत्वों को परमाणु संख्या के आरोही क्रम में व्यवस्थित किया गया है।
3.1. आधुनिक आवर्त सारणी की संरचना और विशेषताएँ
आधुनिक आवर्त सारणी में मेंडलीफ की सारणी की लगभग सभी विसंगतियाँ दूर हो गईं।
- समूह (Groups): आधुनिक आवर्त सारणी में 18 उदग्र कॉलम (खड़े कॉलम) होते हैं, जिन्हें समूह कहा जाता है। एक ही समूह के सभी तत्वों के संयोजकता इलेक्ट्रॉनों की संख्या समान होती है। इसलिए, एक ही समूह के तत्वों के रासायनिक गुणधर्म समान होते हैं। जैसे-जैसे आप समूह में नीचे जाते हैं, कोशों की संख्या बढ़ती जाती है।
- आवर्त (Periods): आधुनिक आवर्त सारणी में 7 क्षैतिज पंक्तियाँ (आड़ी पंक्तियाँ) होती हैं, जिन्हें आवर्त कहा जाता है। एक ही आवर्त में सभी तत्वों में कोशों (shells) की संख्या समान होती है। जैसे-जैसे आप आवर्त में बाईं से दाईं ओर जाते हैं, परमाणु संख्या बढ़ती है, और संयोजकता इलेक्ट्रॉनों की संख्या एक से आठ तक बढ़ती जाती है (पहले आवर्त को छोड़कर)।
- धातु, अधातु और उपधातु: आधुनिक आवर्त सारणी में, बाईं ओर धातुएँ स्थित हैं। दाईं ओर अधातुएँ स्थित हैं। इन दोनों के बीच एक टेढ़ी-मेढ़ी रेखा (जिग-ज़ैग रेखा) होती है, जो उपधातुओं (metalloids) को अलग करती है। ये उपधातुएँ धातुओं और अधातुओं दोनों के गुणधर्म दर्शाती हैं (जैसे- बोरॉन, सिलिकॉन, जर्मेनियम, आर्सेनिक, एंटीमनी, टेल्यूरियम, पोलोनियम)।
3.2. आधुनिक आवर्त सारणी में प्रवृत्तियाँ (Trends in Modern Periodic Table)
विभिन्न भौतिक और रासायनिक गुणों में आवर्त सारणी में एक निश्चित प्रवृत्ति दिखाई देती है।
संयोजकता (Valency):
- समूह में: एक समूह में सभी तत्वों की संयोजकता समान रहती है। (उदाहरण: समूह 1 के सभी तत्वों की संयोजकता 1 होती है।)
- आवर्त में: बाईं से दाईं ओर जाने पर, संयोजकता पहले बढ़ती है (1 से 4 तक), और फिर घटती है (4 से 0 तक).
उदाहरण: Na (1), Mg (2), Al (3), Si (4), P (3), S (2), Cl (1), Ar (0).
परमाणु का आकार (Atomic Size / Radius):
- समूह में: समूह में ऊपर से नीचे जाने पर परमाणु का आकार बढ़ता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि नीचे जाने पर नए कोश जुड़ते जाते हैं, जिससे नाभिक और सबसे बाहरी इलेक्ट्रॉन के बीच की दूरी बढ़ जाती है।
- आवर्त में: आवर्त में बाईं से दाईं ओर जाने पर परमाणु का आकार घटता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि परमाणु संख्या बढ़ने के साथ नाभिक में प्रोटॉनों की संख्या बढ़ती है, जिससे नाभिकीय आवेश बढ़ता है। यह इलेक्ट्रॉनों को नाभिक की ओर अधिक मजबूती से खींचता है, जिससे परमाणु का आकार सिकुड़ जाता है, भले ही कोशों की संख्या समान रहे।
धात्विक गुणधर्म (Metallic Character):
- समूह में: समूह में ऊपर से नीचे जाने पर धात्विक गुणधर्म बढ़ता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि परमाणु का आकार बढ़ने से सबसे बाहरी इलेक्ट्रॉन पर नाभिक का आकर्षण कम हो जाता है, और इलेक्ट्रॉन को निकालना आसान हो जाता है (धातुएँ इलेक्ट्रॉन त्यागने की प्रवृत्ति रखती हैं)।
- आवर्त में: आवर्त में बाईं से दाईं ओर जाने पर धात्विक गुणधर्म घटता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि नाभिकीय आवेश बढ़ने से इलेक्ट्रॉनों को त्यागने की प्रवृत्ति कम हो जाती है।
अधात्विक गुणधर्म (Non-metallic Character):
- समूह में: समूह में ऊपर से नीचे जाने पर अधात्विक गुणधर्म घटता है। अधातुएँ इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की प्रवृत्ति रखती हैं।
- आवर्त में: आवर्त में बाईं से दाईं ओर जाने पर अधात्विक गुणधर्म बढ़ता है। नाभिकीय आवेश बढ़ने से इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है।
रासायनिक अभिक्रियाशीलता (Chemical Reactivity):
- धातुओं में (समूह में): धातुओं की अभिक्रियाशीलता समूह में नीचे जाने पर बढ़ती है, क्योंकि इलेक्ट्रॉन त्यागना आसान हो जाता है।
- अधातुओं में (समूह में): अधातुओं की अभिक्रियाशीलता समूह में नीचे जाने पर घटती है, क्योंकि इलेक्ट्रॉन ग्रहण करना मुश्किल हो जाता है।
- आवर्त में: आवर्त के मध्य में सबसे कम अभिक्रियाशील तत्व होते हैं, जबकि किनारे (सबसे बाईं और सबसे दाईं ओर, उत्कृष्ट गैसों को छोड़कर) अधिक अभिक्रियाशील होते हैं।
Science अध्याय 5 तत्वों का आवर्त वर्गीकरण Notes का pdf
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