BSEB 10th Science Ex-9 Ultimate Notes Free pdf | आनुवंशिकता एवं जैव विकास सम्पूर्ण नोट्स
इन नोट्स को विशेष रूप से बिहार बोर्ड कक्षा 10 के छात्रों की जरूरतों को ध्यान में रखकर और नवीनतम सिलेबस के आधार पर तैयार किया गया है। इसमें अध्याय के सभी महत्वपूर्ण टॉपिक्स — जैसे आनुवंशिकता के सिद्धांत (Principles of Heredity), जीन और क्रोमोसोम की भूमिका, मेंडल के प्रयोग, वंशागति के नियम, भिन्नताओं का कारण तथा जैव विकास (Evolution) की अवधारणा — को बेहद सरल और स्पष्ट भाषा में समझाया गया है, ताकि प्रत्येक छात्र इन्हें आसानी से समझ और याद कर सके। इन नोट्स की मदद से विद्यार्थी न केवल परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त कर सकेंगे बल्कि आनुवंशिकता और जैव विकास की प्रक्रियाओं की गहरी समझ भी विकसित कर पाएंगे।
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BSEB 10th Science Ex-9 Ultimate Notes : आनुवंशिकता एवं जैव विकास सम्पूर्ण नोट्स
1. परिचय (Introduction)
आप सभी ने देखा होगा कि बच्चे अपने माता-पिता के समान दिखते हैं, लेकिन पूरी तरह एक जैसे नहीं होते। उनमें कुछ समानताएँ होती हैं और कुछ भिन्नताएँ भी। इसी प्रकार, पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत से लेकर आज तक जीव-जंतुओं में लगातार बदलाव आते रहे हैं। यह अध्याय हमें इन्हीं दो मुख्य अवधारणाओं – आनुवंशिकता (Heredity), यानी लक्षणों का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाना, और जैव विकास (Evolution), यानी समय के साथ जीवों में क्रमिक परिवर्तन – के बारे में विस्तृत जानकारी देगा।
2. आनुवंशिकता (Heredity)
आनुवंशिकता जीव विज्ञान की वह शाखा है जो जनकों से संतति में लक्षणों के संचरण और उन लक्षणों में भिन्नताओं का अध्ययन करती है। यह वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा माता-पिता के लक्षण उनकी संतानों में जाते हैं।
2.1. वंशागति (Inheritance):
वंशागति वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा आनुवंशिक लक्षण (आनुवंशिक गुण) एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरित होते हैं।
2.2. विभिन्नताएँ (Variations):
किसी स्पीशीज़ के व्यष्टियों में, या जनकों और संतति के बीच पाए जाने वाले अंतर को विभिन्नताएँ कहते हैं। लैंगिक प्रजनन में विभिन्नताएँ अधिक होती हैं, जबकि अलैंगिक प्रजनन में कम।
2.3. आनुवंशिक लक्षण (Inherited Traits):
वे लक्षण जो माता-पिता से उनकी संतानों में वंशागत होते हैं, आनुवंशिक लक्षण कहलाते हैं। उदाहरण: आँखों का रंग, बालों का प्रकार, त्वचा का रंग, आदि।
2.4. मेंडल के आनुवंशिकता के नियम (Mendel’s Laws of Inheritance):
ग्रेगर जॉन मेंडल को “आनुवंशिकी का जनक” कहा जाता है। उन्होंने मटर के पौधों पर प्रयोग किए और आनुवंशिकता के नियमों को प्रतिपादित किया। उनके मुख्य नियम इस प्रकार हैं:
2.4.2. पृथक्करण का नियम या युग्मकों की शुद्धता का नियम (Law of Segregation or Law of Purity of Gametes): इस नियम के अनुसार, F1 पीढ़ी में जब विषमयुग्मजी पौधे युग्मक बनाते हैं, तो दोनों युग्मविकल्पी (जैसे T और t) एक-दूसरे से पृथक होकर अलग-अलग युग्मकों में चले जाते हैं। प्रत्येक युग्मक में किसी लक्षण के लिए केवल एक ही युग्मविकल्पी होता है।
2.4.3. स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम (Law of Independent Assortment): यह नियम द्विसंकर क्रॉस पर आधारित है। इसके अनुसार, जब दो या दो से अधिक अलग-अलग लक्षणों के लिए विषमयुग्मजी (heterozygous) जनकों के बीच संकरण कराया जाता है, तो एक लक्षण के युग्मविकल्पी का पृथक्करण दूसरे लक्षण के युग्मविकल्पी के पृथक्करण से स्वतंत्र रूप से होता है।
2.5. एकसंकर क्रॉस (Monohybrid Cross):
यह एक ऐसा संकरण है जिसमें केवल एक जोड़ी विपरीत लक्षणों की वंशागति का अध्ययन किया जाता है। जैसे, लंबे और बौने पौधे के बीच क्रॉस। फेनोटाइपिक अनुपात (Phenotypic Ratio) F2 पीढ़ी में: 3:1 (3 लंबे : 1 बौना) जीनोटाइपिक अनुपात (Genotypic Ratio) F2 पीढ़ी में: 1:2:1 (1 शुद्ध लंबा : 2 संकर लंबा : 1 शुद्ध बौना)
2.6. द्विसंकर क्रॉस (Dihybrid Cross):
यह एक ऐसा संकरण है जिसमें दो जोड़ी विपरीत लक्षणों की वंशागति का एक साथ अध्ययन किया जाता है। जैसे, गोल-पीले बीज और झुर्रीदार-हरे बीज वाले पौधों के बीच क्रॉस। फेनोटाइपिक अनुपात (Phenotypic Ratio) F2 पीढ़ी में: 9:3:3:1 (9 गोल-पीले : 3 गोल-हरे : 3 झुर्रीदार-पीले : 1 झुर्रीदार-हरा)
2.7. जीन (Gene):
जीन DNA के वे खंड हैं जो किसी प्रोटीन (या आरएनए) के संश्लेषण के लिए जानकारी रखते हैं। ये आनुवंशिकता की मूल इकाई हैं और लक्षणों को नियंत्रित करते हैं।
2.8. युग्मविकल्पी (Allele):
एक ही जीन के वैकल्पिक रूपों को युग्मविकल्पी कहते हैं। उदाहरण के लिए, मटर के पौधे की लंबाई के जीन के दो युग्मविकल्पी होते हैं – ‘T’ (लंबेपन के लिए) और ‘t’ (बौनेपन के लिए)।
2.9. जीनोटाइप (Genotype):
किसी जीव के आनुवंशिक संघटन या जीनों के समुच्चय को जीनोटाइप कहते हैं। यह किसी जीव के लक्षणों के लिए जिम्मेदार आनुवंशिक जानकारी होती है। उदाहरण: TT, Tt, tt।
2.10. फेनोटाइप (Phenotype):
किसी जीव के प्रेक्षणीय (दिखने वाले) लक्षणों को फेनोटाइप कहते हैं। यह जीनोटाइप की बाहरी अभिव्यक्ति होती है। उदाहरण: लंबा पौधा, बौना पौधा।
2.11. लिंग निर्धारण (Sex Determination):
वह प्रक्रिया जिसके द्वारा किसी जीव का लिंग निर्धारित होता है, लिंग निर्धारण कहलाती है। मानव में लिंग निर्धारण: मानव में 23 जोड़े गुणसूत्र होते हैं। 22 जोड़े अलिंगसूत्र (autosomes) और 1 जोड़ा लिंग गुणसूत्र (sex chromosomes) होते हैं। महिलाओं में XX लिंग गुणसूत्र होते हैं, जबकि पुरुषों में XY लिंग गुणसूत्र होते हैं। स्त्री (XX) केवल X युग्मक पैदा करती है। पुरुष (XY) X और Y दोनों युग्मक पैदा करता है। जब X शुक्राणु अंडे (X) को निषेचित करता है, तो लड़की (XX) पैदा होती है। जब Y शुक्राणु अंडे (X) को निषेचित करता है, तो लड़का (XY) पैदा होता है। इस प्रकार, मानव में बच्चे का लिंग पिता के शुक्राणु द्वारा निर्धारित होता है।
3. जैव विकास (Evolution)
जैव विकास वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा समय के साथ जीवित जीवों की आनुवंशिक संरचना में परिवर्तन होते हैं, जिसके परिणामस्वरूप नई प्रजातियों का विकास होता है। यह एक धीमी और सतत प्रक्रिया है।
3.1. उपार्जित लक्षण (Acquired Traits) और आनुवंशिक लक्षण (Inherited Traits):
आनुवंशिक लक्षण: वे लक्षण जो जनकों से संतति में वंशागत होते हैं क्योंकि वे जनन कोशिकाओं के DNA में होते हैं। उदाहरण: आँखों का रंग, बालों का रंग, आदि।
3.2. प्राकृतिक वरण (Natural Selection) – डार्विन का सिद्धांत:
चार्ल्स डार्विन ने प्राकृतिक वरण का सिद्धांत प्रतिपादित किया। इसके अनुसार, प्रकृति उन जीवों का चयन करती है जो अपने पर्यावरण के प्रति सबसे अच्छी तरह से अनुकूलित होते हैं। जीवों में विभिन्नताएँ होती हैं। संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा होती है। जो जीव पर्यावरण के अनुकूल होते हैं, वे जीवित रहते हैं और प्रजनन करते हैं (उत्तरजीविता)। अनुकूलित लक्षण अगली पीढ़ी में वंशागत होते हैं, जिससे धीरे-धीरे जनसंख्या की संरचना बदल जाती है।
3.3. विकास के प्रमाण (Evidences of Evolution):
3.3.2. समरूप अंग (Analogous Organs): वे अंग जिनकी संरचना और उत्पत्ति भिन्न होती है, लेकिन कार्य समान होते हैं। ये अभिसारी विकास (Convergent Evolution) को दर्शाते हैं। उदाहरण: कीट के पंख और पक्षी के पंख – दोनों उड़ने का कार्य करते हैं, लेकिन उनकी मूल संरचना और विकास भिन्न है।
3.3.3. जीवाश्म (Fossils): लाखों साल पहले पृथ्वी पर रहने वाले जीवों के परिरक्षित अवशेष या छापों को जीवाश्म कहते हैं। ये हमें अतीत के जीवों और उनके विकासवादी संबंधों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं। जीवाश्मों की आयु का निर्धारण: सापेक्ष विधि (Relative Method): पृथ्वी की गहरी परतों में पाए जाने वाले जीवाश्म पुराने होते हैं, जबकि ऊपरी परतों में पाए जाने वाले जीवाश्म नए होते हैं। कार्बन डेटिंग (Carbon Dating): रेडियोधर्मी समस्थानिकों (जैसे कार्बन-14) का उपयोग करके जीवाश्म की आयु का निर्धारण किया जाता है।
3.4. जाति उद्भव (Speciation):
वह प्रक्रिया जिसके द्वारा एक मौजूदा प्रजाति से नई प्रजातियों का विकास होता है, जाति उद्भव कहलाती है। जाति उद्भव के मुख्य कारण: प्रजनन अलगाव (Reproductive Isolation): दो जनसंख्याओं के बीच प्रजनन में बाधा आना। भौगोलिक अलगाव (Geographical Isolation): जनसंख्याओं का पहाड़ों, नदियों या समुद्र जैसी भौगोलिक बाधाओं से अलग हो जाना। आनुवंशिक विचलन (Genetic Drift): छोटी जनसंख्याओं में संयोग से होने वाले आनुवंशिक परिवर्तनों के कारण जीन आवृत्ति में बदलाव। प्राकृतिक वरण (Natural Selection): अनुकूलन के कारण नई प्रजातियों का विकास।
3.5. विकास और वर्गीकरण (Evolution and Classification):
जीवों का वर्गीकरण उनके विकासीय संबंधों पर आधारित होता है। जिन जीवों के बीच अधिक समानताएँ होती हैं, वे निकट संबंधी माने जाते हैं और उनका एक सामान्य पूर्वज होता है। यह हमें जीवन के वृक्ष की कल्पना करने में मदद करता है।
3.6. मानव विकास (Human Evolution):
मानव विकास अफ्रीका में शुरू हुआ माना जाता है। हमारे सबसे पुराने पूर्वज प्राइमेट्स थे। होमो सेपियंस (आधुनिक मानव) का उद्भव: विभिन्न चरणों से गुजरा, जिसमें होमो हैबिलिस, होमो इरेक्टस आदि शामिल हैं। प्रवास: आधुनिक मानव अफ्रीका से निकलकर धीरे-धीरे दुनिया के विभिन्न हिस्सों में फैले। मानव विकास किसी एक सीधी रेखा में नहीं हुआ, बल्कि इसमें कई शाखाएँ और विलुप्त हुई प्रजातियाँ शामिल हैं। मानव जाति में भी भौगोलिक क्षेत्रों के अनुसार विभिन्नताएँ देखी जाती हैं।
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Notes क्या होते हैं और क्यों आवश्यक होते हैं?
कई छात्रों के मन में यह सवाल आता है कि आखिर किसी विषय का Notes क्या होता है? चलिए इसे सरल शब्दों में समझते हैं।
Notes किसी भी विषय का संक्षिप्त और आसान सारांश होते हैं — यानी ऐसे पन्ने या कॉपी जिनमें किसी अध्याय की मुख्य बातें, महत्वपूर्ण परिभाषाएँ, सूत्र, उदाहरण और अवधारणाएँ छोटे-छोटे बिंदुओं में लिखी जाती हैं। Notes की आवश्यकता यह होती है कि छात्र कम समय में पूरे विषय को दोहरा सकें और कठिन टॉपिक को आसानी से समझ सकें।
अनेक शिक्षकों के अनुसार, Notes एक ऐसा संक्षिप्त लेखन होता है जो पढ़ाई और परीक्षा दोनों के लिए सहायक होता है। अच्छे Notes की मदद से छात्रों को बार-बार पूरी किताब पढ़ने की ज़रूरत नहीं पड़ती क्योंकि इनमें वही बातें शामिल होती हैं जो परीक्षा की दृष्टि से सबसे ज़्यादा जरूरी होती हैं।
जब छात्र स्वयं Notes तैयार करते हैं, तो वे केवल याद नहीं कर रहे होते बल्कि विषय को गहराई से समझ रहे होते हैं। इस प्रक्रिया से ज्ञान लंबे समय तक याद रहता है और आत्मविश्वास भी बढ़ता है।
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- प्रत्येक अध्याय के महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर (VVI Questions) और वस्तुनिष्ठ प्रश्न भी शामिल हैं।
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सारांश :
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